ED को राज्य सरकार के खिलाफ रिट याचिका दायर करने की अनुमति देना संघवाद के लिए खतरनाक: पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा
पश्चिम बंगाल राज्य ने बुधवार को संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर रिट याचिका की स्वीकार्यता का विरोध किया। राज्य ने तर्क दिया कि एजेंसी के पास किसी राज्य के खिलाफ मौलिक अधिकारों के क्षेत्राधिकार का उपयोग करने के लिए आवश्यक कानूनी व्यक्तित्व का अभाव है।
राज्य की ओर से सीनियर एडवोकेट श्याम दीवान ने तर्क दिया कि ED के पास कोई कानूनी व्यक्तित्व नहीं है, क्योंकि यह केवल एक सरकारी विभाग है। साथ ही किसी केंद्र सरकार के विभाग को राज्य सरकार के खिलाफ रिट याचिका दायर करने की अनुमति देना "संघीय ढांचे के लिए खतरनाक" होगा।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ ED की उस रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि कोयला घोटाले से जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग जांच के सिलसिले में 8 जनवरी को कोलकाता में राजनीतिक परामर्श फर्म I-PAC के कार्यालय की तलाशी के दौरान पश्चिम बंगाल के अधिकारियों ने बाधा डाली थी। ED ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य पुलिस अधिकारियों के खिलाफ CBI FIR दर्ज करने की मांग की थी, जिन पर कथित तौर पर ED की छापेमारी में बाधा डालने का आरोप है। इसके साथ ही ED अधिकारियों द्वारा दायर एक संबंधित रिट याचिका भी थी, जिसमें उन्होंने पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा उनके खिलाफ दर्ज की गई FIR को चुनौती दी थी।
ED कोई कानूनी इकाई नहीं है, वह राज्य के खिलाफ अनुच्छेद 32 का उपयोग नहीं कर सकती: श्याम दीवान
अपनी दलीलें शुरू करते हुए दीवान ने तर्क दिया कि ED केवल केंद्र सरकार का एक विभाग है, न कि कोई कानूनी या प्राकृतिक व्यक्ति जो अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर करने में सक्षम हो। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 32 की मूल नींव मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन पर टिकी है, जिनका दावा केवल व्यक्तियों द्वारा ही किया जा सकता है - चाहे वे प्राकृतिक व्यक्ति हों या कानूनी व्यक्ति। चूंकि ED के पास इन दोनों में से कोई भी दर्जा नहीं है, इसलिए वह मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप नहीं लगा सकती।
दीवान ने खंडपीठ से कहा,
"ED कोई कानूनी इकाई नहीं है... यह सरकार के एक विभाग से बढ़कर कुछ भी नहीं है। इसका अपने आप में कोई व्यक्तित्व नहीं है।"
उन्होंने आगे कहा कि यदि कोई प्रवर्तनीय मौलिक अधिकार ही नहीं है, तो "अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका स्वीकार्य नहीं है।"
उन्होंने आगे तर्क दिया कि यह याचिका संघीय ढांचे से जुड़ा महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दा उठाती है, जो संविधान की मूल संरचना का एक हिस्सा है। उनके अनुसार, केंद्र और राज्यों के बीच के विवाद एक अलग संवैधानिक तंत्र द्वारा नियंत्रित होते हैं—विशेष रूप से अनुच्छेद 131 के तहत, जिसे अनुच्छेद 300 के साथ पढ़ा जाना चाहिए—और किसी सरकारी विभाग द्वारा शुरू की गई अनुच्छेद 32 की कार्यवाही के माध्यम से इन्हें दरकिनार नहीं किया जा सकता।
दीवान ने आगाह किया कि ऐसी याचिकाओं की अनुमति देने से संवैधानिक व्यवस्था कमज़ोर होगी।
उन्होंने तर्क दिया,
"यदि हम इसकी अनुमति देते हैं तो ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जहां अनुच्छेद 32 का उपयोग एक विभाग द्वारा दूसरे विभाग के विरुद्ध, या केंद्र और राज्यों के बीच किया जा रहा हो। इससे संवैधानिक ढांचे में निहित 'चेक्स एंड बैलेंसेज़' (नियंत्रण और संतुलन) पूरी तरह से दरकिनार हो जाएंगे।"
वैधानिक ढांचे का ज़िक्र करते हुए दीवान ने तर्क दिया कि न तो 'धन शोधन निवारण अधिनियम' (PMLA) और न ही अन्य संबंधित कानून ED को "मुकदमा करने का अधिकार" प्रदान करते हैं। उन्होंने इसकी तुलना SEBI जैसे वैधानिक निकायों से की, जिन्हें मुकदमा करने का अधिकार प्रदान किया गया।
जस्टिस मिश्रा ने तब यह इंगित किया कि SEBI एक नियामक निकाय है, न कि एक जांच एजेंसी। दीवान ने कहा कि NHAI, UIDAI, TRAI और IRDAI जैसे अन्य निकायों को स्पष्ट रूप से 'बॉडी कॉर्पोरेट' (निगमित निकाय) के रूप में बनाया गया, जिनके पास मुकदमा करने और जिन पर मुकदमा किया जा सकने का अधिकार है।
उन्होंने कहा,
"मुकदमा करने का अधिकार संसद द्वारा विशेष रूप से प्रदान किया जाना चाहिए। ED के मामले में यह अधिकार मौजूद नहीं है।"
ED के इतिहास का हवाला देते हुए दीवान ने बताया कि इसकी शुरुआत 'आर्थिक मामलों के विभाग' के भीतर एक प्रवर्तन इकाई के रूप में हुई थी। यह अभी भी केंद्र सरकार के एक संगठनात्मक अंग के रूप में ही कार्य कर रहा है।
उन्होंने तर्क दिया,
"यह एक विभाग के भीतर ही एक विभाग था, और आज भी वैसा ही है।"
उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि CBI, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, राजस्व खुफिया निदेशालय और गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय जैसी जांच एजेंसियों के पास भी, इसी तरह 'बॉडी कॉर्पोरेट' के रूप में वैधानिक मान्यता का अभाव है, जिसके तहत उन्हें स्वतंत्र रूप से मुकदमा करने का अधिकार प्राप्त हो। अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि CID, सतर्कता आयोग और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो जैसी राज्य-स्तरीय एजेंसियों के पास भी ऐसे अधिकार नहीं हैं।
जस्टिस मिश्रा ने तब कहा कि ऐसी "असामान्य" स्थितियां भी उत्पन्न हो सकती हैं, जैसे कि कोई मुख्यमंत्री किसी केंद्रीय एजेंसी के काम में बाधा डाल रहा हो।
जस्टिस मिश्रा ने कहा,
"क्योंकि इस मामले में उनके अनुसार, मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार के नियंत्रण वाले किसी सरकारी दफ़्तर में ज़बरदस्ती प्रवेश किया... अगर अनुच्छेद 226 के तहत भी सुनवाई संभव नहीं है और अनुच्छेद 32 के तहत भी नहीं तो फ़ैसला कौन करेगा? हो सकता है कि किसी दिन कोई अन्य मुख्यमंत्री किसी दूसरे दफ़्तर में घुस जाए..."
बेंच द्वारा उठाए गए उन सवालों का जवाब देते हुए कि ऐसी स्थितियों में क्या उपाय उपलब्ध है, जहां कोई राज्य कथित तौर पर किसी केंद्रीय एजेंसी के काम में रुकावट डालता है, दीवान ने कहा कि संविधान में इसका उपाय मौजूद है, लेकिन उसका इस्तेमाल सही तरीके से किया जाना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि केंद्र सरकार खुद ही संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार उचित कार्रवाई शुरू कर सकती है, न कि कोई विभाग अपनी मर्ज़ी से काम करे।
उन्होंने कहा,
“केंद्र सरकार निश्चित रूप से आगे आ सकती है। लेकिन इसकी जांच संविधान द्वारा तय किए गए दायरे के भीतर ही की जानी चाहिए।”
उन्होंने आगे कहा कि यह मुद्दा संघीय संतुलन पर पड़ने वाले असर के कारण अनुच्छेद 145 के तहत एक संविधान पीठ द्वारा विचार किए जाने लायक है।
हालांकि, बेंच ने बार-बार यह सवाल उठाया कि असाधारण स्थितियों में—जैसे कि किसी मुख्यमंत्री द्वारा केंद्रीय एजेंसी के कामकाज में कथित दखलंदाज़ी—क्या उपाय उपलब्ध होगा, यदि अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226, दोनों ही उपलब्ध न हों। जस्टिस मिश्रा ने टिप्पणी की कि “कोई खालीपन नहीं होना चाहिए।”
दीवान ने जवाब दिया कि यह कथित खालीपन ही वह वजह है, जिसके चलते इस मुद्दे पर एक बड़ी बेंच द्वारा निर्णायक फैसला लिए जाने की ज़रूरत है। उन्होंने अपनी बात दोहराते हुए कहा कि अलग-अलग विभागों को रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने की अनुमति देना “संघीय ढांचे के लिए खतरा” बन सकता है। इससे सरकारों के बीच मुकदमों की एक ऐसी शृंखला शुरू हो सकती है जिस पर कोई रोक न हो।
दीवान ने कहा,
"ED अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर नहीं कर सकती, अनुच्छेद 226 के तहत नहीं कर सकती, अनुच्छेद 227 के तहत नहीं कर सकती, और न ही कोई मुकदमा दायर कर सकती है। ऐसा नहीं है कि इस स्थिति में कोई उपाय ही नहीं है। भारत संघ मुकदमा दायर कर सकता है। यह अधिकार अनुच्छेद 300 से मिलता है।"
उन्होंने दलील दी कि ED अनुच्छेद 14 और 21 के तहत अपने किसी भी मौलिक अधिकार के उल्लंघन का दावा नहीं कर सकती, क्योंकि ये अधिकार "व्यक्तियों" को दिए गए। उन्होंने ED के इस दावे के आधार पर भी सवाल उठाया कि उसके पास "पेरेंस पैट्रिया" (नागरिकों के अभिभावक के तौर पर काम करने की) की शक्ति है, जिसके तहत वह उन नागरिकों की ओर से याचिका दायर कर सकती है जिनके अधिकारों का कथित तौर पर राज्य द्वारा डाली गई रुकावट के कारण उल्लंघन हुआ है।
ED, CBI से FIR दर्ज करवाने की माँग वाली रिट याचिका दायर नहीं कर सकती: सिब्बल
दीवान के बाद सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने ममता बनर्जी की ओर से संक्षेप में अपनी दलीलें पेश कीं। उन्होंने तर्क दिया कि ED ऐसी कोई रिट याचिका दायर नहीं कर सकती, जिसमें CBI को कथित रुकावट के संबंध में FIR दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की गई हो।
तब जस्टिस मिश्रा ने यह बात सामने रखी कि याचिका के अनुसार, ED अधिकारियों की सुरक्षा खतरे में थी।
सिब्बल ने कहा,
"यह मानते हुए कि उन्हें धमकी दी गई, यहां मूल अधिकार क्या है? आइए BNS की धारा 221 देखें - किसी ऐसे लोक सेवक के काम में बाधा डालना जो अपने सार्वजनिक कर्तव्यों का निर्वहन कर रहा हो। यही इसका जवाब है।"
सिब्बल ने आगे कहा,
"ED, CBI से जांच करने के लिए नहीं कह सकती। जब तक कोई 'प्रेडिकेट ऑफ़ेंस' (मूल अपराध) न हो, ED इस मामले में दखल नहीं दे सकती; वह इस मूल अधिकार के लिए रिट याचिका भी दायर नहीं कर सकती कि CBI FIR दर्ज करे।"
सिब्बल ने दीवान की उस दलील का भी समर्थन किया, जिसमें उन्होंने मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेजने की बात कही थी। उन्होंने इस ओर इशारा किया कि केरल और तमिलनाडु राज्यों द्वारा दायर याचिकाओं में एक दूसरी बेंच भी इसी मुद्दे पर विचार कर रही है।
अदालत अगले हफ़्ते, 24 मार्च 2026 को इस मामले पर दलीलें सुनना जारी रखेगी।
Case Title – Directorate of Enforcement and Anr. v. State of West Bengal and Ors.