हाल ही में, एक कॉमेडियन द्वारा इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया गया एक वीडियो, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेशी नेताओं के बीच बातचीत का मज़ाक उड़ाया गया, कई सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर तेज़ी से वायरल हो गया। वीडियो को कुछ ही समय में लाखों व्यूज़ मिलने के बाद मेटा ने भारत सरकार की "कानूनी माँग के जवाब में" इसे हटा दिया।
लगभग उसी समय X (पहले ट्विटर) पर कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं और गुमनाम व्यंग्यकारों के अकाउंट, जो सरकार और सत्ताधारी पार्टी की आलोचना करने वाला कंटेंट पोस्ट करते uwx, बिना किसी स्पष्टीकरण के पूरी तरह से ब्लॉक कर दिए गए। हाल ही में, X पर भारत के चुनाव आयोग (ECI) के केरल कार्यालय से पत्र साझा करने वाली पोस्ट को, जिसमें कथित तौर पर BJP का पार्टी चिह्न था, केरल पुलिस की माँग के बाद सार्वजनिक रूप से देखने से रोक दिया गया।
इनमें से किसी भी मामले में कंटेंट को ब्लॉक करने का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया, न ही सोशल मीडिया यूज़र को, कंटेंट हटाए जाने से पहले या बाद में अपनी बात रखने का कोई अवसर दिया गया। इन पोस्ट में कुछ भी गैर-कानूनी नहीं था, सिवाय इसके कि कोई सरकार की आलोचना को, या सत्ता में बैठे लोगों का मज़ाक उड़ाने को, गैर-कानूनी माने। ऐसे ही एक अकाउंट को ब्लॉक करने का निर्देश इसलिए दिया गया, क्योंकि प्रधानमंत्री को "बुरे ढंग से" दिखाया गया। इंटरनेट फ़्रीडम फ़ेडरेशन ने इन फ़ैसलों को "सोशल मीडिया सेंसरशिप में चिंताजनक बढ़ोतरी "बताया, जो ऐसे भाषणों को प्रभावित करती है जो राजनीतिक, व्यंग्यात्मक या आलोचनात्मक लगते हैं।
IT Act ऑनलाइन कंटेंट को मनमाने ढंग से हटाने की अनुमति कैसे देता है?
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) और उसके नियम सरकार को यह निर्देश देने की अनुमति देते हैं कि वे बिचौलियों (Intermediaries) से बिना यूज़र को पहले से सूचना दिए और बिना उन्हें अपनी बात रखने का अवसर दिए कंटेंट को हटा दें या उस तक पहुंच को रोक दें।
IT Act की धारा 69A के तहत मूल ब्लॉकिंग तंत्र ने कम से कम प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों की आवश्यकता को तो स्वीकार किया ही था। धारा 69A में बताए गए ब्लॉकिंग के आधार भी अनुच्छेद 19(2) में बताए गए प्रतिबंधों से ही लिए गए, जैसे कि भारत की संप्रभुता और अखंडता, भारत की रक्षा, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था, या किसी भी संज्ञेय अपराध को करने के लिए उकसाने से रोकना। धारा 69A के तहत बनाए गए 2009 के ब्लॉकिंग नियमों में सरकार के लिए कारणों को लिखित रूप में दर्ज करना ज़रूरी था। इसमें एक नामित समिति के माध्यम से निर्णय लेने की प्रक्रिया का प्रावधान था। सामान्य परिस्थितियों में अगर कंटेंट बनाने वाले की पहचान हो जाती है, तो उसे कम से कम 48 घंटे पहले सूचना दी जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने श्रेया सिंघल मामले में धारा 69A को मुख्य रूप से इसलिए सही ठहराया, क्योंकि ये सुरक्षा उपाय मौजूद थे। यह तथ्य कि इस ढांचे में एक तर्कसंगत आदेश पारित करना और कंटेंट बनाने वाले की सुनवाई करना अनिवार्य है, उन्होंने कोर्ट को इसे सही ठहराने के लिए राज़ी कर लिया।
हालांकि, अब उस न्यूनतम प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय को एक दूसरे रास्ते से कमज़ोर किया जा रहा है।
धारा 79(3)(b) और सहयोग पोर्टल: कंटेंट ब्लॉक करने का एक परोक्ष तरीका
सरकार ने कंटेंट हटाने के लिए बिचौलियों (Intermediaries) पर दबाव डालने के लिए IT Act की धारा 79(3)(b) पर, जिसे 2021 के IT नियमों के नियम 3(1)(d) के साथ पढ़ा जाता है, अपनी निर्भरता बढ़ा दी है।
धारा 79 को मूल रूप से यह तय करने के लिए बनाया गया कि सोशल मीडिया मीडिएटर्स, यूजर्स द्वारा पोस्ट किए गए कंटेंट के लिए अपनी "सेफ हार्बर" (सुरक्षित आश्रय) छूट कब खो देते हैं। धारा 79(3)(b) के अनुसार, यदि कोई बिचौलिया, "वास्तविक जानकारी" (Actual Knowledge) प्राप्त होने पर, या उचित सरकार या उसकी एजेंसी द्वारा सूचित किए जाने पर कि बिचौलिये द्वारा होस्ट की गई कोई भी जानकारी "गैर-कानूनी कार्य" करने के लिए उपयोग की जा रही है। साथ ही वह ऐसे कंटेंट को हटाने में विफल रहता है तो बिचौलिया ऐसे कंटेंट के लिए अपनी कानूनी छूट खो देगा। श्रेया सिंघल मामले में कोर्ट ने धारा 79(3)(b) की व्याख्या करते हुए यह माना कि बिचौलिये की 'वास्तविक जानकारी' का अर्थ कोर्ट का निर्देश है और "गैर-कानूनी कार्य" का संदर्भ अनुच्छेद 19(2) में उल्लिखित आधारों से होना चाहिए।
इसे एक स्वतंत्र सेंसरशिप तंत्र के रूप में नहीं सोचा गया। फिर भी व्यवहार में अब इसका उपयोग इसी रूप में किया जा रहा है।
धारा 69A के तहत प्रक्रिया का पालन करने के बजाय, सरकारी अधिकारियों को सीधे बिचौलियों को नोटिस देना यह दावा करते हुए अधिक सुविधाजनक लगा कि कोई विशेष कंटेंट 'गैर-कानूनी' है। बिचौलिया, सेफ हार्बर सुरक्षा खोने के डर से अधिकारियों द्वारा सूचित किए गए कंटेंट को तुरंत रोक देता है। कंटेंट बनाने वाले को कोई नोटिस नहीं दिया जाता है। कोई तर्कसंगत आदेश पारित नहीं किया जाता है। जहां धारा 69A के तहत केवल नामित अधिकारी - MeITY के संयुक्त सचिव - ही ब्लॉकिंग आदेश जारी कर सकते थे, वहीं धारा 79(3)(b) के तहत शक्तियों का प्रयोग विभिन्न प्रकार के अधिकारी कर सकते हैं, जिनमें राज्य पुलिस, रेलवे और विभिन्न अन्य मंत्रालय शामिल हैं।
2024 में केंद्र सरकार ने 'सहयोग पोर्टल' नाम से एक केंद्रीकृत पोर्टल बनाया, जिसके तहत उन सभी अधिकारियों को, जो S.79(3)(b) के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं। सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज़ को एक ही दायरे में ले आया गया। इस तरह धारा 69A द्वारा तय की गई प्रक्रियागत पाबंदियों को दरकिनार करते हुए कंटेंट को ब्लॉक करने का एक समानांतर रास्ता औपचारिक और केंद्रीकृत कर दिया गया।
मशहूर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' (Twitter) ने 'सहयोग' पोर्टल से जुड़ने से इनकार किया और कंटेंट को ब्लॉक करने के लिए धारा 79(3)(b) के इस्तेमाल को चुनौती दी। पिछले साल कर्नाटक हाईकोर्ट ने X की इस चुनौती को खारिज किया; पहला आधार यह है कि X संविधान द्वारा गारंटीकृत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का दावा नहीं कर सकता, क्योंकि वह एक अमेरिकी कंपनी है। दूसरा, हाईकोर्ट इस बात से सहमत नहीं था कि 'सहयोग' पोर्टल एक 'सेंसरशिप पोर्टल' है।
साथ ही कोर्ट ने टिप्पणी की,
"यह नागरिक और इंटरमीडियरी के बीच सहयोग के एक प्रतीक के रूप में खड़ा है—एक ऐसा तंत्र जिसके ज़रिए सरकार साइबर अपराध के बढ़ते खतरे से निपटने की कोशिश कर रही है।"
हालांकि, हाईकोर्ट द्वारा अपनाई गई यह आदर्शवादी सोच ज़मीनी हकीकत में बदलती हुई नहीं दिख रही है। अनुभव से पता चलता है कि 'सहयोग पोर्टल' ने कंटेंट को ब्लॉक करने का एक समानांतर रास्ता आसान बना दिया, जो प्रक्रियागत सुरक्षा उपायों को दरकिनार करता है। साथ ही अधिकारी इसका इस्तेमाल बिना सोचे-समझे करने के लिए बहुत ज़्यादा तत्पर दिखते हैं, जिससे यह असल में एक 'सेंसरशिप पोर्टल' बन गया। अधिकारियों को नापसंद आने वाले कंटेंट के बजाय, पूरा का पूरा अकाउंट ही ब्लॉक कर दिया जाता है। पिछले साल तमिल समाचार आउटलेट 'आनंद विकटन' की पूरी वेबसाइट ब्लॉक कर दी गई थी, जब उन्होंने पीएम मोदी पर एक कार्टून प्रकाशित किया था। हालांकि, बाद में मद्रास हाईकोर्ट के दखल के बाद ही उसे बहाल किया गया।
IT Rules में हाल ही में किए गए संशोधनों के साथ नियामक माहौल और भी ज़्यादा प्रतिबंधात्मक हो गया, क्योंकि इन संशोधनों ने इंटरमीडियरीज़ के लिए गैर-कानूनी कंटेंट को हटाने के लिए उपलब्ध समय को कम कर दिया। अब प्लेटफॉर्म्स को सरकार से कुछ निर्देश मिलने के तीन घंटे के भीतर कार्रवाई करना ज़रूरी है, जबकि पहले इसके लिए 36 घंटे का समय मिलता था। यहां कार्यपालिका ही जज, जूरी और जल्लाद की भूमिका निभाती है। साथ ही गैर-कानूनी कंटेंट की स्वतंत्र रूप से जाँच करने के लिए कोई मंच उपलब्ध नहीं है।
निश्चित रूप से, हानिकारक, मानहानिकारक या भड़काऊ कंटेंट से निपटा जाना चाहिए। ऑनलाइन गलत जानकारी, हेट स्पीच, AI द्वारा बनाए गए नकली वीडियो और बाल अश्लीलता (Child Pornography) एक गंभीर खतरा हैं और इंटरनेट को ऐसे हानिकारक कंटेंट से मुक्त करने के लिए एक तंत्र का होना बेहद ज़रूरी है। इसके साथ ही, ऐसे सुरक्षा उपाय भी होने चाहिए जिनसे यह सुनिश्चित हो सके कि नागरिकों की आलोचनात्मक आवाज़ों को दबाया न जाए।
चूंकि ज़्यादातर मुख्यधारा के मीडिया ने कार्यपालिका के प्रति चाटुकारिता वाला रवैया अपना लिया है, इसलिए विरोध की आवाज़ें केवल सीमित ऑनलाइन दायरे में ही बची हैं। अगर IT Act की शक्तियों का ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल किया गया तो यह हलचल भरा ऑनलाइन दायरा जल्द ही किसी कब्रिस्तान जैसा खामोश हो जाएगा - यह बात शायद सत्ता में बैठे लोगों को खुश कर दे, लेकिन अंततः यह हमारे लोकतंत्र की भी कब्र खोद देगी।
लेखक- मनु सेबेस्टियन LiveLaw के मैनेजिंग एडिटर हैं। उनसे manu@livelaw.in पर संपर्क किया जा सकता है।