नाबालिग को नौकरानी की तरह रखने वाली महिला 'वैध अभिभावक' नहीं: कलकत्ता हाईकोर्ट ने अपहरण का दोष निरस्त किया
कलकत्ता हाईकोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि किसी नाबालिग को अपने घर में नौकरानी के रूप में रखने वाली महिला को उसका “वैध अभिभावक” नहीं माना जा सकता। अदालत ने इसी आधार पर वर्ष 2007 के अपहरण के मामले में दोषसिद्धि रद्द की।
जस्टिस चैताली चटर्जी दास की पीठ ने अपील स्वीकार करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि लड़की को किसी “वैध अभिभावक” की अभिरक्षा से ले जाया गया, जो धारा 363 के तहत अपराध का आवश्यक तत्व है।
मामले में नाबालिग लड़की चंदा बीबी के घर रह रही थी। अभियोजन का दावा था कि आरोपी ने उसे वहां से बहला-फुसलाकर ले जाकर अपहरण किया। हालांकि, अदालत ने पाया कि यह स्पष्ट ही नहीं है कि चंदा बीबी को कानूनी रूप से अभिभावक माना जा सकता है या नहीं।
अदालत ने कहा कि स्वयं अभियोजन के साक्ष्यों से यह साबित नहीं होता कि चंदा बीबी ने लड़की की अभिभावक के रूप में जिम्मेदारी ली थी। गवाहों के बयानों में भी भारी विरोधाभास पाए गए—कहीं लड़की को दोस्त बताया गया तो कहीं घरेलू काम करने वाली।
अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे विरोधाभास “साक्ष्य की विश्वसनीयता को समाप्त कर देते हैं और वैध अभिभावक होने का निष्कर्ष निकालना असंभव बना देते हैं।”
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह रहा कि पीड़िता ने स्वयं स्वीकार किया कि वह आरोपी को पहले से जानती थी और उसके साथ अपनी इच्छा से गई। उसने यह भी नहीं कहा कि उसे बलपूर्वक ले जाया गया।
अदालत ने कहा,
“यह स्पष्ट रूप से सिद्ध है कि पीड़िता आरोपी के साथ स्वेच्छा से गई और उसने कहीं भी बल प्रयोग का आरोप नहीं लगाया।”
हाईकोर्ट ने कथित पुलिस छापेमारी और बरामदगी की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने पाया कि पुलिस की कार्यवाही में कई खामियां थीं—डायरी एंट्री का अभाव, महिला कांस्टेबलों के बयान दर्ज न होना और स्वतंत्र गवाहों का समर्थन न मिलना।
अदालत ने कहा कि पूरी जांच और अभियोजन “कमजोर आधार” पर टिकी हुई है और संदेह से परे अपराध साबित नहीं किया जा सका।
अंततः हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन यह साबित करने में असफल रहा कि लड़की का अपहरण हुआ था या उसे किसी वैध अभिभावक की अभिरक्षा से हटाया गया। इसके साथ ही आरोपी की सजा और दोषसिद्धि रद्द की।