ICC ने यौन तत्व न होने के आधार पर शिकायत खारिज की तो महिला औद्योगिक अदालत में कर सकती है अपील: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायत पर आंतरिक शिकायत समिति (ICC) यदि बिना जांच किए ही यह कहते हुए शिकायत खारिज कर देती है कि उसमें कोई यौन तत्व नहीं है, तो भी उसका ऐसा निर्णय यौन उत्पीड़न अधिनियम के तहत सिफारिश माना जाएगा। ऐसी सिफारिश के खिलाफ पीड़ित महिला औद्योगिक अदालत में अपील कर सकती है।
जस्टिस संदीप मारणे ने कहा कि यदि जांच किए बिना ICC के फैसले को सिफारिश नहीं माना गया तो संबंधित महिला के पास उसके खिलाफ कोई कानूनी उपाय नहीं बचेगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि कानून का उद्देश्य आंतरिक शिकायत समिति द्वारा जांच की अनिवार्यता का उल्लंघन करने पर पीड़ित महिला को ही उपचार से वंचित करना नहीं हो सकता।
मामला मेपल इन्फ्रा से जुड़े कुछ कर्मचारियों की याचिकाओं से सामने आया। याचिकाकर्ताओं ने मई 2026 में औद्योगिक अदालत द्वारा दिए गए आदेश को चुनौती दी। विवाद महिला कर्मचारी की ओर से कंपनी के एक वरिष्ठ कर्मचारी के खिलाफ की गई शिकायत से जुड़ा था।
महिला की शिकायत मिलने के बाद नियोक्ता ने उसे आईसीसी के पास भेजा था। ICC के एक सदस्य से जुड़े हितों के टकराव के कारण शिकायत की सुनवाई बाहरी सदस्य की अध्यक्षता वाली समिति ने की। समिति ने अक्टूबर 2025 में ई-मेल के जरिए शिकायत पर अपना निर्णय दिया और माना कि शिकायत में यौन उत्पीड़न का कोई तत्व नहीं है।
इसके खिलाफ महिला ने औद्योगिक अदालत में अपील की। कंपनी के कर्मचारियों की ओर से दलील दी गई कि ICC ने शिकायत को शुरुआती स्तर पर सही तरीके से खारिज किया, क्योंकि उसमें कोई यौन तत्व नहीं था। उनका कहना था कि चूंकि ICC ने कोई जांच ही नहीं की, इसलिए उसका फैसला यौन उत्पीड़न अधिनियम के तहत सिफारिश नहीं माना जा सकता और उसके खिलाफ अपील भी नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया।
जस्टिस संदीप मारणे ने कहा कि यौन उत्पीड़न अधिनियम की धारा 11 के तहत जांच की प्रक्रिया का पालन नहीं करना ICC के फैसले को प्रभावित कर सकता है, लेकिन केवल जांच न करने के आधार पर उसके निर्णय को धारा 13 के तहत 'सिफारिश' के दायरे से बाहर नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि शिकायत मिलने के बाद ICC बिना जांच किए नियोक्ता को आरोपी कर्मचारी की सेवा समाप्त करने की बात कहती है तो उसका ऐसा निर्णय सिफारिश की प्रकृति रखेगा। इसी तरह यदि आईसीसी यह तय करती है कि शिकायत में यौन उत्पीड़न का कोई तत्व नहीं है और उसके बाद नियोक्ता मामले में आगे कोई कार्रवाई नहीं करता तो ऐसा निर्णय भी कानून के तहत सिफारिश माना जाएगा।
अदालत ने कहा कि कानून की ऐसी व्याख्या नहीं की जा सकती, जिससे धारा 11 के तहत जांच करने के दायित्व का पालन न करने वाली आईसीसी को अपने फैसले को चुनौती से बचने का लाभ मिल जाए।
जस्टिस मारणे ने कहा कि यौन उत्पीड़न से महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून की व्याख्या उदार तरीके से होनी चाहिए। यदि धारा 13 और 18 की कठोर व्याख्या की जाए तो ऐसी स्थिति बन सकती है, जिसमें ICC की ओर से जांच नहीं किए जाने के कारण शिकायतकर्ता महिला के पास उसके फैसले को चुनौती देने का कोई उपाय ही न बचे।
हाईकोर्ट ने कहा,
“कानून के प्रावधानों की ऐसी उदार व्याख्या की जानी चाहिए, जिससे उस वर्ग के हितों की रक्षा हो सके जिसके लाभ के लिए यह कानून बनाया गया।”
मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने माना कि ICC ने महिला की शिकायत पर फैसला दिया था और नियोक्ता ने भी उस फैसले को संज्ञान में लिया। इसलिए ICC का निष्कर्ष कानून के तहत सिफारिश की श्रेणी में आता है और उसके खिलाफ अपील की जा सकती है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि औद्योगिक अदालत को अपील की स्वीकार्यता पर विचार करते समय यह तय करने की जरूरत नहीं थी कि शिकायत में वास्तव में यौन उत्पीड़न का तत्व मौजूद था या नहीं। यह अपील के गुण-दोष से जुड़ा सवाल था।
औद्योगिक अदालत ने मई 2026 में महिला की अपील को सुनवाई योग्य मानते हुए कहा था कि वह कार्यस्थल पर असहज माहौल में काम कर रही थी और ICC को शिकायत पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया।
हाईकोर्ट ने 64 पन्नों के फैसले में औद्योगिक अदालत के इस आदेश को पूरी तरह बरकरार नहीं रखा। कोर्ट ने निर्देश दिया कि महिला की ICC के फैसले के खिलाफ अपील पर औद्योगिक अदालत नए सिरे से विचार करे और अपील की स्वीकार्यता तय करते समय उसके गुण-दोष में जाने से बचे।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने संबंधित याचिकाओं का निपटारा किया।