ट्रस्ट पदाधिकारियों का आपसी विवाद SC छात्रों के स्कूल की 11 साल की अनुदान राशि रोकने का आधार नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि किसी रजिस्टर्ड ट्रस्ट के दो पदाधिकारियों के बीच आपसी विवाद को अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए स्कूल चलाने हेतु दी जाने वाली सरकारी अनुदान राशि रोकने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि बालाजी युवक मंडल को 11 वर्षों की बकाया अनुदान राशि जारी की जाए।
जस्टिस किशोर सी. संत और जस्टिस अजित बी. कदेतकर की खंडपीठ ने कहा कि पदाधिकारियों के बीच कथित विवाद के कारण अनुदान रोकना उचित नहीं है। ऐसा करने से योजना का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।
कोर्ट ने कहा,
“दो पदाधिकारियों के बीच तथाकथित विवाद अनुदान जारी करने से रोकने का उचित आधार नहीं है। यदि ऐसा होने दिया गया तो योजना का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।”
अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया कि अब कोई विवाद लंबित नहीं है।
इसके अलावा योजना का वास्तविक लाभार्थी वह स्कूल है, जिसके खर्च की भरपाई अनुदान से की जानी है जबकि संस्था या ट्रस्ट इस प्रक्रिया में केवल माध्यम है।
मामला बालाजी युवक मंडल द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था। ट्रस्ट को 1997 में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की ओर से अनुसूचित जाति के लिए आश्रमशाला चलाने वाली स्वैच्छिक संस्थाओं को सहायता देने वाली योजना के तहत अनुदान मंजूर किया गया।
इसके तहत एक आवासीय स्कूल स्थापित कर चलाया जाना था। स्कूल शुरुआत में धाराशिव में स्थापित किया गया था और बाद में नांदेड के लोहा में स्थानांतरित किया गया।
ट्रस्ट को वर्ष 1999-2000 तक अनुदान मिलता रहा। इसके बाद वर्ष 2000-2001 से 2002-2003 और वर्ष 2007-2008 से 2012-2013 तक की अनुदान राशि रोक दी गई। खास बात यह रही कि ट्रस्ट को अनुदान रोकने के संबंध में कोई प्रतिकूल टिप्पणी या कमी नहीं बताई गई।
इसके बाद ट्रस्ट ने 2018 में बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए बकाया अनुदान जारी करने की मांग की।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपने जवाब में कहा कि ट्रस्ट के दो पदाधिकारियों के बीच विवाद के कारण अनुदान जारी नहीं किया जा सका। हालांकि अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि जिला समाज कल्याण अधिकारी ने 2006 से 2013 के बीच लगभग हर वर्ष स्कूल का निरीक्षण किया था और अनुदान जारी करने की सिफारिश की थी। इन सिफारिशों का सत्यापन किया गया और राज्य सरकार के समाज कल्याण विभाग ने उन्हें केंद्र सरकार के पास भेजा था।
केंद्र सरकार ने यह दलील भी दी कि सरकारी वित्तीय नियम, 2017 के तहत दावा समय-सीमा से बाहर हो चुका था, क्योंकि राज्य सरकार की ओर से जरूरी पत्राचार देर से किया गया।
इस दलील को भी खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जब भी निर्देश दिया गया, विशेष जांच कराई गई और स्पष्टीकरण भी दिया गया।
राज्य अधिकारियों की ओर से केंद्र को जानकारी भेजने में हुई देरी के लिए याचिकाकर्ता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
कोर्ट ने कहा,
“यदि राज्य अधिकारियों की ओर से केंद्र को सूचना देने में देरी हुई है तो उसके लिए याचिकाकर्ता को दंडित नहीं किया जा सकता।”
संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को ट्रस्ट को वर्ष 2000-2001, 2001-2002, 2002-2003 और वर्ष 2005-2006 से 2012-2013 तक की अनुदान राशि जारी करने का निर्देश दिया।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि सरकारी योजना का उद्देश्य अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए स्कूल की व्यवस्था और उसके खर्चों में सहायता करना है। इसलिए संस्था के पदाधिकारियों के बीच विवाद जैसे आंतरिक कारणों से उस स्कूल के लिए स्वीकृत अनुदान को रोकना योजना के उद्देश्य के विपरीत होगा।