बॉम्बे हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार निरोधक कानून के एक मामले में बरी किए जाने के खिलाफ अपील दाखिल करने में हुई 650 दिन की देरी को माफ करने से इनकार करते हुए राज्य सरकार की याचिका खारिज की।

हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य का कानून एवं न्याय विभाग किसी दूसरे विभाग के दबाव में आकर फैसला न बदले बल्कि कानून के अनुसार स्वतंत्र और निष्पक्ष राय दे।

नागपुर पीठ के जस्टिस महेंद्र नर्लिकर ने मामले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, यवतमाल पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। अदालत ने कहा कि विभागों के बीच होने वाला आंतरिक पत्राचार इतनी लंबी देरी को माफ करने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।

मामले में कानून एवं न्याय विभाग ने जनवरी 2024 में अपील दाखिल करने के प्रस्ताव को यह कहते हुए खारिज किया कि मामला अपील के लिए उपयुक्त नहीं है। इसके बावजूद भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से लगातार विभाग से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने और अपील की अनुमति देने का आग्रह किया जाता रहा।

अंततः जुलाई 2025 में कानून एवं न्याय विभाग ने अपील दाखिल करने की अनुमति तो दी लेकिन साथ ही स्पष्ट कर दिया कि अपील दाखिल करने के निर्देश भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, यवतमाल के जोखिम, खर्च और परिणाम की जिम्मेदारी पर जारी किए जा रहे हैं।

जस्टिस नर्लिकर ने इस पर गंभीर आपत्ति जताते हुए कहा कि कानून एवं न्याय विभाग पर दूसरे विभागों की तुलना में अधिक जिम्मेदारी है। इसी विभाग को विभिन्न मामलों में उच्च अदालतों के समक्ष कार्यवाही शुरू करने के प्रस्तावों की कानूनी जांच और उचित राय देने का दायित्व सौंपा गया।

अदालत ने कहा कि जुलाई 2025 के पत्र से ऐसा प्रतीत होता है कि प्रस्ताव पर वास्तविक रूप से विचार नहीं किया गया। विभाग ने पहले जिस प्रस्ताव को अपील के लिए अनुपयुक्त माना था उस पर बाद में ठोस कानूनी आधार के बिना पुनर्विचार किया गया।

जस्टिस नर्लिकर ने कहा कि कानून एवं न्याय विभाग को अपनी पहले की ठोस राय पर कायम रहना चाहिए। अदालत के मुताबिक रिकॉर्ड से ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो कि अपील के प्रस्ताव पर दोबारा गुण-दोष के आधार पर विचार किया गया। इसके विपरीत, पत्र में अपील दाखिल करने की जिम्मेदारी भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो पर डाल दी गई।

हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य भी एक मुकदमेबाज के रूप में कानून के सामने उसी तरह खड़ा होता है लेकिन राज्य पर उससे भी अधिक जिम्मेदारी होती है। अदालत ने कहा कि बिना पर्याप्त आधार के अपील दाखिल करने से न्यायालयों पर मुकदमों का बोझ बढ़ता है और न्याय देने की प्रक्रिया धीमी होती है।

अदालत ने टिप्पणी की,

"कानून एवं न्याय विभाग से अपेक्षा है कि वह अपनी राय पर दृढ़ रहे और किसी अन्य विभाग के दबाव में न आए।"

जस्टिस नर्लिकर ने कहा कि बाहरी प्रभाव में आकर ऐसी अपील दाखिल करने का निर्देश देना जो प्रथम दृष्टया निरर्थक हो अदालत में लंबित मामलों की संख्या बढ़ाता है और न्याय वितरण में देरी के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार है। ऐसी कार्यप्रणाली को हतोत्साहित किया जाना जरूरी है।

अदालत ने राज्य की ओर से देरी के लिए दिए गए कारणों को सतही और सद्भावनापूर्ण नहीं माना। अगस्त 2023 से जुलाई 2025 तक अपील दाखिल करने के निर्णय में हुई लंबी देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण भी राज्य नहीं दे सका।

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने अपील दाखिल करने में हुई 650 दिन की देरी को माफ करने से इनकार किया और राज्य की याचिका खारिज की। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, यवतमाल पर 50 हजार रुपये का खर्च भी लगाया गया।

अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: