विशेष परिस्थितियों के बिना पिता 'हेबियस कॉर्पस' याचिका के जरिए बच्चे की कस्टडी नहीं मांग सकते: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक पिता की वह याचिका खारिज की, जिसमें उसने 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका के जरिए अपनी पत्नी से अपने चार साल के बेटे की कस्टडी मांगी थी।
कोर्ट ने कहा कि बच्चे का अपनी सगी माँ के पास रहना गैर-कानूनी नहीं माना जा सकता। साथ ही कोर्ट को ऐसी कोई विशेष परिस्थिति नहीं मिली, जिसके आधार पर बच्चे की कस्टडी बदली जाए।
जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस सुभेन्दु सामंत की खंडपीठ ने कहा,
"इस मामले में ऐसी कोई असाधारण या विशेष परिस्थिति सामने नहीं आई है, जो 'हेबियस कॉर्पस' याचिका के जरिए कोर्ट के विशेष अधिकार क्षेत्र (Writ Jurisdiction) का इस्तेमाल करने को सही ठहरा सके। याचिकाकर्ता अपने लगभग चार साल के बेटे की कस्टडी बदलना चाहता है, जो अभी अपनी माँ के पास है। याचिकाकर्ता के पास बच्चे की कस्टडी पाने के लिए कानून में मौजूद अन्य विकल्प खुले हैं।"
यह विवाद तब शुरू हुआ जब पिता ने आरोप लगाया कि उसकी पत्नी उनकी सहमति या जानकारी के बिना उनके बेटे (जिसका जन्म 14 फरवरी, 2022 को हुआ था) को लेकर घर से चली गई है। पिता ने यह भी आरोप लगाया कि उनकी शारीरिक विकलांगता (उन्हें 40% लोकोमोटर विकलांगता है) के कारण उनकी पत्नी का व्यवहार बदल गया।
इसके बाद पिता ने अपनी पत्नी को एक कानूनी नोटिस भेजा, जिसमें उनसे बच्चे के साथ घर वापस आने के लिए कहा गया। जब पत्नी ने न तो नोटिस का कोई जवाब दिया और न ही उसका पालन किया, तो पिता ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने कोर्ट से मांग की कि संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया जाए कि वे बच्चे को पेश करें और पिता तथा प्राकृतिक संरक्षक (Natural Guardian) होने के नाते बच्चे की कस्टडी उन्हें सौंप दें।
खंडपीठ ने पाया कि बच्चा अपनी माँ की कस्टडी में है और कहा कि ऐसी कस्टडी को गैर-कानूनी नहीं कहा जा सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका एक असाधारण और विवेकाधीन (Discretionary) उपाय है। नाबालिग बच्चे की कस्टडी से जुड़े मामलों में, हाई कोर्ट को यह देखना होता है कि बच्चा कानूनी कस्टडी में है या गैर-कानूनी कस्टडी में। अगर बच्चा अपनी सगी माँ के पास है, तो माना जा सकता है कि यह कस्टडी कानूनी है। ऐसी स्थिति में, कोर्ट के विशेष अधिकार क्षेत्र (Writ Jurisdiction) का इस्तेमाल करके कस्टडी तभी बदली जा सकती है, जब कोई बहुत ही विशेष परिस्थिति मौजूद हो।
खंडपीठ ने आगे कहा कि बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामलों में फैसला हर मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर होना चाहिए, जिसमें बच्चे का कल्याण सबसे महत्वपूर्ण है। माता-पिता के अधिकार बच्चे के कल्याण से ऊपर नहीं हो सकते।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए अदालत ने माना कि पिता ऐसी कोई विशेष परिस्थिति साबित नहीं कर पाए, जिसके आधार पर 'हेबियस कॉर्पस' (Habeas Corpus) याचिका के जरिए कस्टडी बदली जा सके। हालांकि, वे कानून के तहत उपलब्ध अन्य विकल्पों का सहारा ले सकते हैं।
पिता के इस आरोप पर कि माँ उन्हें बच्चे से मिलने नहीं दे रही है, खंडपीठ ने कहा कि वह कानून के तहत उचित राहत की मांग कर सकते हैं।
इसके अनुसार, हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज की और पिता के लिए कानून के तहत उपलब्ध अन्य विकल्पों का रास्ता खुला रखा।
Case Title : X v. State of Andhra Pradesh & Others