तारीख पर तारीख आपराधिक न्याय व्यवस्था की पहचान नहीं बन सकती: 24 साल से लंबित अपहरण मुकदमे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 24 वर्षों से लंबित एक अपहरण के मुकदमे पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि तारीख पर तारीख आपराधिक न्याय व्यवस्था की पहचान नहीं बन सकती। अदालत ने कहा कि वर्षों तक बिना किसी सार्थक प्रगति के मुकदमा लंबित रहना न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है और यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष एवं शीघ्र सुनवाई के अधिकार के विपरीत है।
जस्टिस राजीव भारती की पीठ ने वर्ष 2001 के अपहरण के एक मामले में दो आरोपियों को अग्रिम जमानत देते हुए यह टिप्पणी की।
अदालत ने कहा,
"वर्षों तक कार्यवाही बिना किसी सार्थक प्रगति के ठप पड़ी रहीवजिससे आपराधिक मुकदमा महज औपचारिकता बनकर रह गया। अंतहीन स्थगन और संस्थागत निष्क्रियता के कारण न्याय की बलि नहीं चढ़ने दी जा सकती।"
पीठ ने कहा कि दो दशक से अधिक पुराने मुकदमे का अब तक तार्किक निष्कर्ष तक नहीं पहुंचना बेहद चिंताजनक है। इतना लंबा विलंब किसी भी तरह संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित शीघ्र और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
मामले के अनुसार 12 दिसंबर 2001 को दर्ज FIR में आरोप लगाया गया कि 15 वर्षीय किशोरी अपने अभिभावक के काम पर जाने के दौरान घर से लापता हो गई। शिकायत में कहा गया कि मुख्य आरोपी ने सह-आरोपी की मदद से युवती को बहला-फुसलाकर विवाह के उद्देश्य से उसका अपहरण कर लिया। यह भी आरोप था कि युवती घर से सोने-चांदी के आभूषण और एक हजार रुपये नकद भी साथ ले गई।
जांच के बाद अप्रैल 2002 में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 363 और 366 के तहत आरोपपत्र दाखिल किया गया, जिसके बाद मजिस्ट्रेट ने आरोपियों को तलब कर मुकदमे का संज्ञान लिया।
आरोपियों ने वर्ष 2007 में समन आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहां उन्हें अंतरिम संरक्षण मिला। बाद में उनकी याचिका पैरवी न होने के कारण खारिज कर दी गई और अंतरिम राहत समाप्त हो गई। इसके बावजूद लंबे समय तक मुकदमे में कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने दोबारा कार्यवाही शुरू करते हुए 26 मई 2026 को आरोपियों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए जमानती वारंट जारी किए, जिसके बाद उन्होंने अग्रिम जमानत के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
आरोपियों की ओर से दलील दी गई कि वर्ष 2001 में युवती अपनी इच्छा से उनके साथ गई। दोनों के बीच सहमति से संबंध था और अब वे पति-पत्नी के रूप में तीन बच्चों के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
राज्य सरकार ने अग्रिम जमानत का विरोध किया लेकिन इस तथ्य का खंडन नहीं कर सकी कि दोनों अब विधिवत विवाहित हैं और शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन जी रहे हैं।
हाईकोर्ट ने मामले में 24 वर्षों की असाधारण देरी, आरोपियों के विरुद्ध किसी आपराधिक इतिहास का अभाव, आरोपपत्र दाखिल हो जाने तथा मुकदमे में सहयोग करने के उनके आश्वासन को ध्यान में रखते हुए अग्रिम जमानत मंजूर की।
अदालत ने आरोपियों को निर्देश दिया कि वे दो सप्ताह के भीतर विचारण अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करें। इसके बाद उन्हें निर्धारित शर्तों के साथ जमानत पर रिहा किया जाएगा।