इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य मानवाधिकार आयोग मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामले में अतिरिक्त मुआवजे की सिफारिश कर सकता है भले ही पीड़ित को उसी विषय से जुड़े अन्य कानूनी प्रावधानों के तहत पहले ही मुआवजा मिल चुका हो।

कोर्ट ने उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड को 2011 में बिजली का करंट लगने से घायल हुए एक व्यक्ति को अतिरिक्त 10 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि पीड़ित को पहले किया गया भुगतान आयोग की अतिरिक्त मुआवजे की सिफारिश करने की शक्ति को सीमित नहीं करता।

जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने मुख्य अभियंता (विद्युत) और मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड की ओर से दायर रिट याचिका खारिज की थी। याचिका में 27 जुलाई 2026 को मानवाधिकार आयोग द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी गई थी।

मामले के अनुसार, पीड़ित को वर्ष 2011 में बिजली का करंट लगा था और उसी साल मुआवजे के लिए आवेदन भी किया गया था। पावर कॉरपोरेशन ने 2017 में पीड़ित के पिता को 65 हजार रुपये दिए थे। इसके बाद 13 फरवरी 2025 को पीड़ित को सीधे एक लाख रुपये का भुगतान किया गया।

हालांकि, पीड़ित ने वर्ष 2024 में ही मानवाधिकार आयोग के समक्ष शिकायत दाखिल कर दी थी, यानी एक लाख रुपये का भुगतान शिकायत दाखिल होने के बाद किया गया। जुलाई 2026 में आयोग ने पावर कॉरपोरेशन को पीड़ित को अतिरिक्त 10 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया।

इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में दलील दी कि मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 36(2) के तहत शिकायत समय-सीमा से बाधित थी। उनका कहना था कि कथित मानवाधिकार उल्लंघन 2011 में हुआ था, जबकि शिकायत 2024 में दाखिल की गई।

हाईकोर्ट ने समय-सीमा से जुड़ी इस आपत्ति को खारिज किया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने कानून के तहत आवश्यक मुआवजे का भुगतान नहीं किया था, इसलिए मानवाधिकारों का उल्लंघन लगातार जारी था।

कोर्ट ने यह भी कहा कि आयोग में शिकायत दाखिल होने के बाद एक लाख रुपये का भुगतान किया जाना परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 20 के तहत देनदारी की स्वीकृति माना जा सकता है। खंडपीठ ने परिसीमा अधिनियम की धारा 22 का भी उल्लेख किया, जो लगातार जारी रहने वाले उल्लंघनों और अपकृत्यों से संबंधित है।

खंडपीठ ने कहा कि पावर कॉरपोरेशन का वैधानिक दायित्व है कि वह बिजली की ट्रांसमिशन लाइनों का रखरखाव इस तरह करे कि लोगों का जीवन किसी खतरे या जोखिम में न पड़े।

कोर्ट ने कहा,

“जहां पावर कॉरपोरेशन के अधिकारी लापरवाही से काम करते हैं, वहां नागरिकों के मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है। इसलिए दूसरी रिट याचिका भी मानवाधिकार उल्लंघन का मामला है और आयोग द्वारा 1993 के अधिनियम के तहत कार्यवाही करने में कोई त्रुटि नहीं की गई।”

हाईकोर्ट ने मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 18(ए) के तहत आयोग की शक्तियों की भी जांच की। इस प्रावधान के तहत यदि जांच में मानवाधिकारों का उल्लंघन या किसी लोक सेवक की ओर से ऐसे उल्लंघन को रोकने में लापरवाही सामने आती है तो आयोग संबंधित सरकार या प्राधिकरण को शिकायतकर्ता, पीड़ित या उसके परिवार के सदस्यों को मुआवजा अथवा हर्जाना देने की सिफारिश कर सकता है।

कोर्ट ने कहा कि अधिनियम की धारा 18 के तहत आयोग की शक्ति किसी अन्य प्रावधान, राज्य विधानमंडल के कानून या अधीनस्थ कानून से सीमित नहीं होती। यह प्रावधान दूसरे कानूनी उपायों के अतिरिक्त काम करता है, न कि उनकी जगह लेकर या उन्हें निष्प्रभावी बनाकर।

खंडपीठ ने कहा,

“संबंधित वैधानिक प्रावधानों के तहत मुआवजा पाने का किसी व्यक्ति का अधिकार आयोग की उस शक्ति को किसी भी तरह सीमित नहीं करता, जिसके तहत वह मानवाधिकार उल्लंघन की गंभीरता का आकलन कर मुआवजे की सिफारिश कर सकता है।”

इसी आधार पर कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की इस दलील को खारिज किया कि पीड़ित को पहले ही मुआवजा दिया जा चुका है। कोर्ट ने कहा कि पहले दिए गए कुल 1.65 लाख रुपये आयोग के अधिकार में बाधा नहीं बनते। आयोग मानवाधिकार उल्लंघन की गंभीरता का स्वतंत्र रूप से आकलन कर अतिरिक्त मुआवजे की सिफारिश कर सकता है।

हाईकोर्ट ने माना कि पीड़ित को अतिरिक्त 10 लाख रुपये देने के आयोग के निर्देश में कोई खामी नहीं है। रिट याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि अतिरिक्त 10 लाख रुपये का मुआवजा तो तुरंत ही दे दिया जाना चाहिए था।


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