इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट, 1890' के तहत कार्यवाही लंबित होने का मतलब यह नहीं है कि किसी नाबालिग बच्चे की कस्टडी के लिए दायर 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका खारिज कर दी जाए।

कोर्ट ने कहा कि ऐसे हर मामले का फैसला रिट कोर्ट के सामने रखे गए तथ्यों पर निर्भर करता है, जहां भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत कोर्ट का विवेक (Discretion) एक अहम भूमिका निभाता है।

चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की बेंच ने कहा,

"हालांकि यह सच है कि 'गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट' (G&W Act) के तहत मिलने वाला उपाय 'हेबियस कॉर्पस' याचिका के जरिए मांगी गई कस्टडी के दावे के लिए प्रासंगिक हो सकता है, लेकिन ऐसा कोई सख्त नियम नहीं है कि अगर 'गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट' के तहत कार्यवाही लंबित है, तो कोर्ट को 'हेबियस कॉर्पस' याचिका को खारिज ही करना पड़े। हर मामला रिट कोर्ट के सामने आने वाले तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। कानून की स्थिति यह है कि ऐसे मामलों में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट कोर्ट का विवेक एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।"

बच्चे का जन्म 12.10.2020 को हुआ था। 2022 के मध्य में उसकी माँ को किडनी की बीमारी का पता चला। रिट याचिका में बताया गया कि माँ के माता-पिता, माँ और बच्चे को इस भरोसे के साथ गाजियाबाद ले गए कि वे दोनों की देखभाल करेंगे। 31.05.2023 को किडनी फेल होने से माँ की मौत हो गई, उस समय बच्चा लगभग 2.5 साल का था।

नवंबर 2025 में पिता ने एक 'हेबियस कॉर्पस' याचिका दायर की। उन्होंने आरोप लगाया कि जुलाई 2023 से बच्चा अपीलकर्ताओं (बच्चे की मौसी और मौसा) की अवैध कस्टडी में है। उन्होंने यह भी कहा कि 'गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट, 1890' की धारा 25 और धारा 10 के तहत उनकी (मौसी-मौसा की) जो याचिका गाजियाबाद की फैमिली कोर्ट में लंबित है, वह कानूनी रूप से मान्य (Maintainable) नहीं है। 30.09.2026 के आदेश के जरिए, सिंगल जज ने बच्चे की कस्टडी पिता को सौंप दी और अपीलकर्ताओं को बच्चे से मिलने का अधिकार (विजिटेशन राइट्स) दिया। इसके खिलाफ उन्होंने एक विशेष अपील दायर की।

अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह याचिका तब दायर की गई, जब बच्चा उनके साथ रहते हुए दो साल से अधिक समय बिता चुका था। याचिका में यह नहीं बताया गया कि उनकी कस्टडी किस तरह से गैर-कानूनी थी। उन्होंने यह भी कहा कि वे आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति में हैं। साथ ही उन्होंने बताया कि पिता ने खुद को HR मैनेजर बताया, जबकि उनकी अपनी पे-स्लिप में उन्हें 'सीनियर एग्जीक्यूटिव-हेल्प डेस्क' के रूप में दिखाया गया। इसके अलावा, कस्टडी लेने के बाद पिता ने बच्चे को धनबाद में अपने भाई के पास छोड़ दिया था। पिता की ओर से यह तर्क दिया गया कि कानूनी कार्यवाही लंबित होने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें राहत न दी जाए।

अदालत ने माना कि रिट याचिका दायर करने में हुई देरी पिता के दावे को खारिज करने का आधार नहीं बन सकती, क्योंकि वह शुरू से ही इस कानून के तहत कानूनी कार्यवाही में अपना पक्ष रख रहे थे। अदालत ने गौर किया कि पिता ही बच्चे के स्वाभाविक संरक्षक (नेचुरल गार्जियन) हैं, उनके पास रोजगार है, और अपनी पत्नी की मौत के मामले में उन पर कोई आपराधिक मुकदमा नहीं चल रहा है। अदालत ने यह भी माना कि तीन साल से अधिक समय तक साथ रहने के कारण बच्चे और अपीलकर्ताओं के बीच जो लगाव (बॉन्डिंग) बना, वह स्वाभाविक ही था।

अपीलकर्ताओं के बचाव को काफी कमजोर मानते हुए, और यह देखते हुए कि जब तक फैमिली कोर्ट सबूतों के आधार पर किसी निश्चित नतीजे पर नहीं पहुंच जाता, तब तक पिता को कस्टडी सौंपने के फैसले को 'गलती' नहीं कहा जा सकता; अदालत ने सिंगल जज के फैसले में दखल देने से इनकार किया।

कोर्ट ने कहा,

"मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए हम इस अपील में चुनौती दिए गए आदेश में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहते। ऐसा करने से बच्चे की कस्टडी पिता के पास से हटकर उसकी मौसी और मौसा के पास चली जाएगी, जिससे बच्चा एक जगह से दूसरी जगह ले जाए जाने वाली किसी 'वस्तु' जैसा हो जाएगा, जो उसे कई तरह से परेशान कर सकता है।"

इस विशेष अपील को खारिज कर दिया गया। साथ ही यह स्पष्ट किया गया कि इस फैसले से फैमिली कोर्ट के समक्ष दोनों पक्षों के अधिकारों या तर्कों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। फैमिली कोर्ट अपने सामने मौजूद सबूतों और कानून के अनुसार लंबित कार्यवाही पर अपना फैसला सुनाएगा।

Case Title : A v. State of U.P. and 2 others

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