इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा/ग्रेटर नोएडा इलाके में यमुना एक्सप्रेसवे पर स्लीपर बस में आग लगने से 9 यात्रियों की मौत का स्वतः संज्ञान लिया। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से राज्य में चलने वाली स्लीपर बसों के परमिट, सुरक्षा मानकों और निरीक्षण के बारे में विस्तृत जानकारी मांगी।

जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी की बेंच ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे अन्य बातों के अलावा, पिछले 2 वर्षों में जारी स्लीपर-बस परमिट का विवरण, ऐसे परमिट देने से पहले जांचे गए मानक, यूपी में किए गए निरीक्षण और इसी तरह की दुर्घटनाओं में की गई आपराधिक कार्रवाई की जानकारी दें।

इस मामले को "इन री: यमुना एक्सप्रेसवे पर बस में आग लगने से नौ लोगों की मौत" के रूप में दर्ज किया गया।

बेंच ने गौर किया कि राज्य में पहले भी ऐसी दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें जुलाई 2023 में रायबरेली-प्रयागराज-लखनऊ हाईवे पर, नवंबर 2024 में कन्नौज-लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे पर और दिसंबर 2025 में मथुरा-ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में यमुना एक्सप्रेसवे पर हुई घटनाएं शामिल हैं।

कोर्ट ने पाया कि ऐसा लगता है कि एसी स्लीपर बसें "बिना उचित जांच और बिना उचित सुरक्षा उपायों, जैसे अग्निशमन यंत्र आदि के" चल रही थीं।

यह भी देखा गया कि बस ड्राइवर और कंडक्टर ऐसी दुर्घटनाओं में जिम्मेदारी से काम करने के लिए पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित नहीं लग रहे थे।

इसके अनुसार, कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और अतिरिक्त मुख्य सचिव (परिवहन) को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने और कोर्ट की सहायता करने का निर्देश दिया।

परिवहन विभाग ने कोर्ट को उत्तर प्रदेश में चलने वाली स्लीपर बसों की जांच के लिए उठाए गए कदमों के बारे में जानकारी दी।

हालांकि, कोर्ट ने पाया कि अभी भी "सुधार की गुंजाइश" है और निर्देश दिया कि ऐसी बसों की नियमित जांच तेज की जाए।

बेंच को यह भी बताया गया कि निरीक्षण विशेष रूप से रात में किए जाएंगे, क्योंकि स्लीपर बसें आमतौर पर रात में ही चलती हैं।

अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया गया कि वे जांच करें कि क्या ऐसी बसें तय या निर्धारित स्थानों पर रुक रही हैं। हाई कोर्ट ने बसों पर लागू होने वाले ऑटोमोटिव इंडस्ट्री स्टैंडर्ड (AIS) के बारे में एमिकस क्यूरी और रिसर्च एसोसिएट्स द्वारा दी गई जानकारी पर भी विचार किया।

कोर्ट ने देखा कि AIS-052 "जनरल बस बॉडी डिज़ाइन" से AIS-119 "स्लीपर कोच स्पेसिफिकेशन्स" से और AIS-135 "आग का पता लगाने और उसे बुझाने" से संबंधित है।

बेंच ने इन स्टैंडर्ड्स में शामिल कई ज़रूरतों को नोट किया, जिनमें इमरजेंसी एग्जिट, गैंगवे के डाइमेंशन और स्लीपर कोच के डिज़ाइन से जुड़ी ज़रूरतें शामिल हैं।

यह नोट किया गया कि गाड़ी की लंबाई के आधार पर स्लीपर कोच में 4 या 5 इमरजेंसी एग्जिट होने ज़रूरी हैं।

कोर्ट ने आग का पता लगाने और उसे बुझाने से जुड़ी ज़रूरतों का भी ज़िक्र किया, जिनमें इंजन बे में ऑटोमेटेड एरोसोल/फोम सिस्टम और पैसेंजर केबिन में लो-प्रेशर वॉटर मिस्ट सिस्टम शामिल हैं। इन स्टैंडर्ड्स में ड्राइवर ड्राउज़िनेस अलर्ट सिस्टम (ADAS) लगाने का भी प्रावधान है।

अहम बात यह है कि कोर्ट ने कहा कि उसे यह नहीं बताया गया कि हादसे में शामिल बस ने ज़रूरी नियमों का पालन किया या नहीं।

बेंच ने निर्देश दिया कि अगर बस ने तय नियमों का पालन नहीं किया था, तो न सिर्फ़ ड्राइवर और कंडक्टर के ख़िलाफ़, बल्कि लाइसेंस होल्डर के ख़िलाफ़ भी उचित कार्रवाई की जानी चाहिए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि हालात को देखते हुए अधिकारी ऐसे लाइसेंस होल्डर की बसों पर रोक लगाने पर भी विचार कर सकते हैं।

चीफ़ सेक्रेटरी ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि वह खुद इस मामले को देखेंगे और संयुक्त कार्रवाई की जाएगी।

कोर्ट ने संबंधित विभाग को स्लीपर बसों के संचालन और नियमन से जुड़े कई पहलुओं पर एक संयुक्त या अलग हलफ़नामा दाखिल करने का निर्देश दिया।

राज्य से ये जानकारी देने को कहा गया:

• पिछले तीन सालों में यूपी में स्लीपर बसों के लिए जारी किए गए परमिट की संख्या।

• क्या ऐसे परमिट जारी करने से पहले तय मानकों की जाँच की गई थी, साथ ही सहायक दस्तावेज़।

• क्या सुरक्षा से समझौता करते हुए अतिरिक्त जगह बनाने के लिए स्लीपर बसों के डिज़ाइन में बदलाव किया गया।

• क्या स्लीपर बसों का इस्तेमाल कमर्शियल कामों के लिए किया जा रहा था, जिसमें पार्सल ले जाना भी शामिल है।

• राज्य की सीमाओं पर चेकिंग पॉइंट और अचानक निरीक्षण के लिए उठाए गए कदम।

• यूपी के अंदर किए गए निरीक्षणों का विवरण।

कोर्ट ने खास तौर पर इस बारे में जानकारी मांगी कि निरीक्षण के दौरान क्या-क्या जांच की गई।

अधिकारियों से यह बताने को कहा गया कि क्या यात्रियों के बयान दर्ज किए गए, क्या आग बुझाने वाले यंत्र मौजूद थे, क्या यात्रियों को इमरजेंसी गेट के बारे में बताया गया और क्या ड्राइवर और कंडक्टर को दुर्घटना की स्थिति में बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में पता था।

राज्य को पिछले तीन सालों में ऐसी ही दुर्घटनाओं में की गई आपराधिक कार्रवाई और उन कार्यवाही के नतीजों का विवरण देने का भी निर्देश दिया गया।

कोर्ट ने साफ़ किया कि हलफ़नामा सिर्फ़ इन्हीं मुद्दों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें प्रस्तावित कार्रवाई और ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए ज़रूरी अन्य सामूहिक उपाय भी बताए जाने चाहिए।

मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को होगी।

Case title - In Re Nine Dead As Bus Erupts In Flames On Yamuna E-Way

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