आपराधिक मामलों में जांच से जुड़े मेडिकल और फोरेंसिक रिकॉर्ड तक अदालतों की सीधी पहुंच सुनिश्चित करने की दिशा में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम निर्देश जारी किए।

कोर्ट ने राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र को ऐसी व्यवस्था तैयार करने को कहा, जिससे संबंधित अदालत या मजिस्ट्रेट मेडिकल और फोरेंसिक रिकॉर्ड को सीधे डिजिटल माध्यम से देख सकें।

जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने 19 अगस्त को यह निर्देश जारी किया। पीठ दहेज हत्या के आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

कोर्ट ने आरोपी को जमानत तो दे दी लेकिन आपराधिक न्याय व्यवस्था में डिजिटल रिकॉर्ड के एकीकरण की प्रगति की निगरानी के लिए मामले की सुनवाई जारी रखने का फैसला किया।

कोर्ट ने आपराधिक जांच के दौरान इस्तेमाल होने वाले विभिन्न डिजिटल मंचों को आपस में जोड़ने की दिशा में हुई प्रगति पर गौर किया। इनमें मेडलीपर, अपराध एवं आपराधिक ट्रैकिंग नेटवर्क एवं प्रणाली, अंतर-संचालनीय आपराधिक न्याय प्रणाली और ई-फोरेंसिक प्रयोगशाला प्रणाली शामिल हैं।

मेडलीपर के माध्यम से अस्पतालों से मेडिकल और मेडिकल-कानूनी रिकॉर्ड, जिनमें पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य मेडिकल रिपोर्ट शामिल हैं, डिजिटल रूप से उपलब्ध कराए जाते हैं। इसे अपराध एवं आपराधिक ट्रैकिंग नेटवर्क एवं प्रणाली से जोड़ा जा चुका है, जिसके बाद पुलिस जांच अधिकारी अस्पतालों द्वारा अपलोड की गई पोस्टमार्टम और अन्य मेडिकल रिपोर्ट सीधे देख सकते हैं।

अंतर-संचालनीय आपराधिक न्याय प्रणाली आपराधिक न्याय व्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान की सुविधा उपलब्ध कराती है। कोर्ट को बताया गया कि राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र ने मेडलीपर और फोरेंसिक विभाग के आंकड़ों को संबंधित अदालत तक पहुंचाने के लिए इस प्रणाली का एकीकरण पहले ही कर दिया।

हाईकोर्ट ने अब राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र को निर्देश दिया कि संबंधित अदालत या मजिस्ट्रेट मेडलीपर और ई-फोरेंसिक लैब में उपलब्ध आंकड़ों को सीधे देख सकें।

कोर्ट ने कहा,

"राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र को ऐसी व्यवस्था करने का निर्देश दिया जाता है, जिससे संबंधित अदालत या मजिस्ट्रेट मेडलीपर और ई-फोरेंसिक लैब में उपलब्ध आंकड़ों तक सीधे पहुंच बना सकें।"

कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव और पुलिस महानिदेशक को राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र के साथ सहयोग करने का निर्देश दिया ताकि अंतर-संचालनीय आपराधिक न्याय प्रणाली को प्रभावी तरीके से लागू किया जा सके और मेडिकल तथा फोरेंसिक रिकॉर्ड संबंधित अदालत को सीधे उपलब्ध हो सकें।

सुनवाई के दौरान कोर्ट को यह भी बताया गया कि संबंधित मजिस्ट्रेट के लिए पूरी केस डायरी और अंतिम पुलिस रिपोर्ट अब न्यायालय सूचना प्रणाली पर उपलब्ध है। इसके लिए न्यायालय सूचना प्रणाली के साथ एक विशेष डिजिटल माध्यम जोड़ा गया है जिसके जरिए मजिस्ट्रेट केस डायरी और अंतिम पुलिस रिपोर्ट देख सकते हैं।

कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि अगली सुनवाई तक क्षेत्राधिकारी स्तर पर आरोपपत्र के सत्यापन की सुविधा जोड़ने का प्रयास किया जाएगा।

हाईकोर्ट ने आपराधिक न्याय प्रक्रिया को और अधिक डिजिटल बनाने से जुड़े अन्य पहलुओं पर भी विचार किया। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में न्यायालय सूचना प्रणाली के माध्यम से हिंदी में समन और वारंट तैयार करने की संभावना तलाशने का निर्देश दिया।

इसके अलावा राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र को जमानतदारों के इलेक्ट्रॉनिक सत्यापन से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देश को लागू करने के लिए भी आवश्यक कदम उठाने को कहा गया।

कोर्ट ने कहा कि जांच के दौरान तैयार होने वाली मेडिकल, फोरेंसिक और अन्य महत्वपूर्ण सूचनाएं अलग-अलग डिजिटल प्रणालियों में सीमित नहीं रहनी चाहिए। संबंधित अदालत को जरूरत के समय इन रिकॉर्ड तक सीधे पहुंच मिलना आपराधिक मुकदमों की प्रक्रिया को अधिक सुगम और प्रभावी बना सकता है।

यह निर्देश दहेज हत्या के एक आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। कोर्ट ने आरोपी को जमानत दे दी, लेकिन आपराधिक मामलों से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड को एकीकृत करने की प्रक्रिया में हुई प्रगति को देखते हुए मामले को जारी रखने का फैसला किया, ताकि इन व्यवस्थाओं के क्रियान्वयन की निगरानी की जा सके।

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