MTP नियमों के तहत सिर्फ़ वैवाहिक अलगाव गर्भपात का आधार नहीं हो सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महिला की याचिका खारिज की
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी रूल्स, 2003' (2021 में संशोधित) के तहत सिर्फ़ वैवाहिक अलगाव को गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने (गर्भपात) का आधार नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि सामान्य वैवाहिक मतभेदों की तुलना वैवाहिक स्थिति में बदलाव, जैसे 'तलाक' या 'विधवापन' से नहीं की जा सकती; नियम 3B(c) में गर्भावस्था के दौरान वैवाहिक स्थिति में बदलाव के संदर्भ में विशेष रूप से इनका उल्लेख किया गया।
बता दें, नियम 3B(c) गर्भावस्था के दौरान वैवाहिक स्थिति में बदलाव (जिसमें विधवापन और तलाक शामिल हैं) के मामलों में 24 सप्ताह तक की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति देता है।
जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की बेंच ने कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन संबंधी स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) सुरक्षित है और महिला को गर्भपात की अनुमति दी जा सकती है "यदि गर्भावस्था शुरू से ही अनचाही हो और ऐसी गर्भावस्था का गर्भवती महिला के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल मानसिक और शारीरिक प्रभाव पड़े"।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि लगातार और गंभीर क्रूरता का उचित मामले में गर्भवती महिला के मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है।
हालांकि, बेंच ने यह भी कहा कि ऐसे मामले में क्रूरता और मानसिक स्वास्थ्य पर उसके परिणामी प्रभाव को साबित करने के लिए "ठोस सबूत" और "मजबूत, विश्वसनीय और निष्पक्ष रूप से आंकी जा सकने वाली सामग्री" की आवश्यकता होगी।
बेंच ने ये टिप्पणियां एक 24 वर्षीय विवाहित महिला की याचिका खारिज करते हुए कीं, जिसमें भदोही के मुख्य चिकित्सा अधिकारी को उसकी गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने का निर्देश देने की मांग की गई।
मामले का संक्षिप्त विवरण
याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि उसने 3 मई, 2026 को तीसरे प्रतिवादी (जो एक पुलिस कांस्टेबल है) से शादी की थी। उसने आरोप लगाया कि उसका पति उसके चरित्र पर शक करता था, उसने कई बार उसके साथ मारपीट की और उसे मानसिक व शारीरिक क्रूरता का शिकार बनाया। उन्होंने आगे आरोप लगाया कि 27 जुलाई को उन्हें ज़बरदस्ती फिनाइल पिलाया गया, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, और 28 अगस्त को उन पर एक और "बर्बर हमला" किया गया।
उन्होंने दावा किया कि उन्होंने पति के ख़िलाफ़ FIR दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन उनकी कोशिशें नाकाम रहीं। उन्होंने यह भी दावा किया कि अगर उन्होंने प्रेग्नेंसी खत्म करवाई तो उनके पति ने उन्हें FIR की धमकी दी।
उनकी याचिका के अनुसार, शुरुआत में तो वे प्रेग्नेंट होना चाहती थीं, लेकिन बाद में पति और उनके परिवार के कथित बर्ताव की वजह से वे ऐसा नहीं चाहती थीं। उन्होंने आर्थिक तंगी का भी ज़िक्र किया और बताया कि वे बेरोज़गार हैं और अपने माता-पिता पर निर्भर हैं।
दूसरी ओर, पति ने आरोपों से इनकार किया और कहा कि यह विवाद गलतफहमी का नतीजा था। उन्होंने याचिकाकर्ता और बच्चे की मदद करने की इच्छा जताई।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
कोर्ट ने MTP नियमों के नियम 3B(c) की जाँच की। इस नियम में उन श्रेणियों को शामिल किया गया, जिनके तहत 24 हफ़्ते तक गर्भावस्था को खत्म करने की अनुमति दी जा सकती है। इसमें गर्भावस्था के दौरान वैवाहिक स्थिति में बदलाव (जैसे विधवा होना और तलाक) का खास तौर पर ज़िक्र है।
बेंच ने कहा कि हालांकि नियम 3B(c) के तहत दी गई श्रेणियाँ केवल उदाहरण हैं, लेकिन इस प्रावधान का दायरा इतना नहीं बढ़ाया जा सकता कि इसमें "वैवाहिक रिश्ते टूटने की हर स्थिति" शामिल हो जाए।
कोर्ट ने कहा,
"व्याख्या के नाम पर कोई नई या अलग श्रेणी नहीं जोड़ी जा सकती, क्योंकि ऐसा करने का मतलब होगा नियम में कुछ जोड़ना या उसे फिर से लिखना।"
कोर्ट ने पति-पत्नी के बीच "अलग हो चुके रिश्ते" (Estranged Relationship) की तीसरी श्रेणी बनाने के प्रस्ताव को खास तौर पर खारिज किया। कोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के बीच सिर्फ़ मतभेद होने से वैवाहिक स्थिति नहीं बदलती।
साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि एक और श्रेणी पर विचार किया जा सकता है, अगर हालात तलाक या विधवा होने जैसी स्थिति के बराबर हों। जैसे कि हमेशा के लिए छोड़ दिया जाना या क्रूरता जैसी स्थितियां, जिनसे दोबारा साथ रहने की संभावना "लगभग खत्म" हो गई हो।
बेंच ने इस बात पर भी विचार किया कि क्या कथित घरेलू हिंसा और मानसिक स्वास्थ्य का बिगड़ना MTP Act की धारा 3 के तहत गर्भावस्था खत्म करने का आधार बन सकता है।
कोर्ट ने कहा कि "मानसिक स्वास्थ्य" का दायरा मेडिकल रूप से पहचानी गई मानसिक बीमारी से कहीं ज़्यादा बड़ा है। साथ ही, यह तय करते समय कि क्या गर्भावस्था जारी रखने से महिला के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुँचेगा, उसके असल या संभावित माहौल (जिसमें सामाजिक और आर्थिक हालात भी शामिल हैं) पर विचार करना ज़रूरी हो सकता है।
कोर्ट ने कहा कि मकसद को ध्यान में रखकर की गई व्याख्या (Purposive Interpretation) के तहत बार-बार होने वाली घरेलू हिंसा के मामलों में गर्भावस्था खत्म करने की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन ऐसा तभी हो सकता है जब क्रूरता और उससे मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने की बात साबित करने के लिए "ठोस सबूत" हों।
हालांकि, इस मामले में कोर्ट को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह पता चले कि याचिकाकर्ता का मानसिक स्वास्थ्य खास तौर पर इसलिए बिगड़ा क्योंकि वह गर्भवती थी।
कोर्ट ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने की वाजिब आशंका मायने रख सकती है, लेकिन यह सिर्फ़ गर्भावस्था खत्म करने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति की "अपनी इच्छा और मनमर्जी" पर आधारित नहीं हो सकती।
बेंच ने यह भी गौर किया कि याचिकाकर्ता ने घरेलू हिंसा कानून के तहत कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई। कोर्ट ने साफ़ किया कि उसकी यह टिप्पणी कि "यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि वह घरेलू हिंसा की शिकार थी" कोई अंतिम राय नहीं थी और इससे अधिकार-क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट के सामने होने वाली किसी भी भविष्य की कार्यवाही पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
कोर्ट ने महिला के इस बयान पर भी ध्यान दिया कि शुरू में तो वह गर्भवती होना चाहती थी, लेकिन बाद में ससुराल वालों के कथित बुरे बर्ताव के कारण वह गर्भावस्था नहीं चाहती।
कोर्ट ने कहा:
"कानून, सख्ती से देखें तो, सिर्फ़ शुरुआती दौर में ही अनचाही प्रेग्नेंसी को खत्म करने की इजाज़त देता है। इस मामले में न तो शादी का स्टेटस बदला है और न ही क्रूरता का कोई ऐसा ठोस सबूत पेश किया गया, जो हमें उस ज़िंदगी को खत्म करने का इतना बड़ा और कठोर फ़ैसला लेने के लिए मना सके, जो अभी दुनिया में आई भी नहीं है।"
बेंच ने कहा कि 1971 के एक्ट और उसके तहत बने नियमों का कोई भी प्रावधान ऐसा नहीं है, जिससे इस मामले में प्रेग्नेंसी खत्म करने के पक्ष में कोई बात निकलती हो।
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि प्रेग्नेंसी शादी के दौरान ही हुई और ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि महिला को छोड़ दिया गया या ऐसे हालात थे जो कानूनी ढांचे के तहत प्रेग्नेंसी खत्म करने को सही ठहराते हों।
कोर्ट ने यह भी देखा कि याचिकाकर्ता अपने माता-पिता के साथ रह रही थी और ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे यह पता चले कि उसके मौजूदा माहौल से उसकी मानसिक सेहत को कोई तुरंत या असली खतरा है।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि मेडिकल रिपोर्ट में लगभग 17 हफ़्ते और दो दिन का ज़िंदा भ्रूण (Fetus) दिखा, जिसमें कोई असामान्यता या खराबी नहीं थी। कोर्ट ने मेडिकल एक्सपर्ट्स की राय को बदलने से इनकार किया, खासकर तब जब तथ्यों और हालात से यह साबित नहीं होता था कि MTP एक्ट और नियमों के कानूनी दायरे में प्रेग्नेंसी खत्म करना ज़रूरी था।
दूसरी ओर, पति ने कोर्ट को बताया कि वह एक पुलिस कॉन्स्टेबल है और महीने में लगभग ₹40,000 कमाता है। वह मेडिकल खर्च उठाने और याचिकाकर्ता व बच्चे की देखभाल करने के लिए तैयार था।
इसके बाद कोर्ट ने आदेश दिया कि उसकी सैलरी से हर महीने ₹12,000 काटकर याचिकाकर्ता को दिए जाएं, ताकि मेडिकल बिल और बच्चे की देखभाल व परवरिश हो सके।
बेंच ने कहा कि शादीशुदा ज़िंदगी में अनबन से होने वाली मानसिक परेशानी के लिए प्रेग्नेंसी खत्म करना ही "एकमात्र समाधान" नहीं है और आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को मुफ़्त में मैरिटल काउंसलिंग दी जाए।
कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि कानून बनाने वालों ने यह नहीं माना कि घरेलू झगड़ा अपने आप में किसी शादीशुदा गर्भवती महिला की मानसिक सेहत को इतना गंभीर नुकसान पहुंचाता है कि प्रेग्नेंसी खत्म करना ज़रूरी हो जाए।
इसलिए बेंच ने मांगी गई रिट (Mandamus) जारी करने से इनकार कर दिया और रिट याचिका खारिज की।
Case Title : X vs. State of U.P. and 2 others 2026 LiveLaw (AB) 803