न्यायिक रिमांड से इनकार होने पर भी जांच और संज्ञान लेने की कार्रवाई नहीं रुकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी मामले में न्यायिक रिमांड से इनकार कर दिए जाने मात्र से विवेचना अधिकारी आगे की जांच करने से नहीं रुकता और न ही अदालत पुलिस रिपोर्ट पर स्वतंत्र रूप से विचार कर संज्ञान लेने से वंचित होती है। अदालत ने कहा कि न्यायिक रिमांड और संज्ञान, आपराधिक कार्यवाही के दो अलग-अलग चरण हैं और दोनों का उद्देश्य भी अलग है।
जस्टिस जफीर अहमद ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की विशेष अदालत, लखीमपुर खीरी द्वारा संज्ञान लेकर आरोपी को तलब करने के आदेश को चुनौती देने वाली आपराधिक अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
मामले में आरोपी अदीम अली के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (SC/ST Act) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जब संबंधित अदालत पहले ही न्यायिक रिमांड देने से इनकार कर चुकी थी, तब विवेचना अधिकारी को नए अपराध जोड़ने का अधिकार नहीं था। यह भी कहा गया कि केवल दो गवाहों के बयान दर्ज कर विवेचना अधिकारी ने न्यायिक रिमांड से इनकार के आदेश को निष्प्रभावी करने का प्रयास किया। साथ ही संज्ञान लेने का आदेश संक्षिप्त, तर्कहीन और बिना न्यायिक विचार के पारित बताया गया।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि न्यायिक रिमांड से इनकार का आदेश न तो जांच की वैधता पर अंतिम निर्णय होता है और न ही इससे यह माना जा सकता है कि संबंधित अपराध बनता ही नहीं है।
अदालत ने कहा,
"न्यायिक रिमांड से इनकार का आदेश आपराधिक कार्यवाही के एक अलग चरण में पारित होता है और उसका उद्देश्य संज्ञान लेने के आदेश से पूरी तरह अलग होता है। इससे विवेचना अधिकारी की आगे जांच करने और अतिरिक्त साक्ष्य एकत्र करने की वैधानिक शक्ति समाप्त नहीं होती।"
पीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायिक रिमांड से इनकार होने के बावजूद विवेचना अधिकारी आगे की जांच कर सकता है और उसके आधार पर पुलिस रिपोर्ट प्रस्तुत कर सकता है। इसके बाद विचारण अदालत संज्ञान के चरण में उस रिपोर्ट का स्वतंत्र रूप से परीक्षण करने के लिए पूरी तरह सक्षम है।
हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत संज्ञान लेने और समन जारी करने की प्रक्रिया के बीच अंतर भी स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि संज्ञान लेने का अर्थ उपलब्ध सामग्री के आधार पर अपराध का न्यायिक संज्ञान लेना है, जबकि समन जारी करना उसके बाद आरोपी की उपस्थिति सुनिश्चित करने की अलग प्रक्रिया है। यद्यपि व्यवहार में दोनों आदेश अक्सर एक साथ पारित होते हैं, लेकिन कानून की दृष्टि से दोनों अलग-अलग चरण हैं।
अदालत ने कहा कि संज्ञान के स्तर पर अदालत को साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन करने या आरोपी के संभावित बचाव पर विचार करने की आवश्यकता नहीं होती। इस चरण में केवल यह देखा जाता है कि उपलब्ध सामग्री प्रथमदृष्टया अपराध का संकेत देती है या नहीं।
रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि विशेष अदालत ने पुलिस रिपोर्ट और विवेचना के दौरान दर्ज बयानों पर विचार करने के बाद ही आरोपी के खिलाफ पर्याप्त आधार मौजूद होने का निष्कर्ष निकाला था। केवल आदेश के संक्षिप्त होने से यह नहीं माना जा सकता कि उसे बिना न्यायिक विचार के पारित किया गया।
इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने विशेष अदालत के आदेश में कोई अवैधता न पाते हुए आपराधिक अपील प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दी। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियों को मामले के गुण-दोष पर अंतिम राय नहीं माना जाएगा और ट्रायल कोर्ट स्वतंत्र रूप से सुनवाई करेगी।