48 साल पुरानी अपील खारिज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- बिना महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न के साक्ष्य दोबारा नहीं परखे जा सकते
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 48 वर्ष पुरानी दूसरी अपील खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यदि किसी मामले में कोई महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न नहीं उठता तो अदालत साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकती।
जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने अपने फैसले में कहा कि दूसरी अपील केवल उन्हीं मामलों में स्वीकार की जा सकती है जहां कोई ठोस विधिक प्रश्न मौजूद हो।
अदालत ने कहा,
“जब इस न्यायालय को यह स्पष्ट हो गया कि इस अपील में कोई महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न नहीं है तब साक्ष्यों का दोबारा परीक्षण करने का कोई औचित्य नहीं बनता।”
यह अपील वर्ष 1979 में दो आधारों पर स्वीकार की गई थी पहला, दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 41 नियम 31 का पालन नहीं हुआ। दूसरा, ट्रायल कोर्ट के पास इस मामले की आर्थिक अधिकारिता नहीं थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 100 के तहत दूसरी अपील तभी सुनी जा सकती है, जब उसमें स्पष्ट रूप से महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न उठाया गया हो। अदालत ने पाया कि अपील के ज्ञापन में ऐसे किसी प्रश्न का उल्लेख ही नहीं किया गया, केवल सामान्य आधार बताए गए। इसलिए उस समय अपील को स्वीकार करना ही उचित नहीं है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कोर्ट फीस से जुड़ा मुद्दा ट्रायल कोर्ट में ही सुलझा लिया गया और इसकी कमी पूरी कर दी गई। साथ ही यह मुद्दा पहली अपील में भी नहीं उठाया गया। इसलिए इसे महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न नहीं माना जा सकता।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में कोई ऐसा विधिक प्रश्न नहीं है, जिसके आधार पर साक्ष्यों की दोबारा जांच की जाए। इसी कारण 48 वर्ष पुरानी यह दूसरी अपील खारिज की गई।