SHO की रिपोर्ट पर भी जारी हो सकता है गुण्डा एक्ट का नोटिस, यदि वह SP के माध्यम से भेजी गई हो: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-07-23 11:06 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश गुण्डा नियंत्रण एक्ट 1970 की धारा 3(1) के तहत कार्यवाही शुरू करने के लिए यदि थानाध्यक्ष (SHO) की रिपोर्ट पुलिस अधीक्षक (SP) के माध्यम से जिला मजिस्ट्रेट को भेजी गई है तो उसके आधार पर कारण बताओ नोटिस जारी करना पूरी तरह वैध है। अदालत ने कहा कि यह प्रक्रिया उत्तर प्रदेश गुण्डा नियंत्रण नियमावली, 1970 के नियम 3(1) की भावना और प्रावधानों के अनुरूप है।

जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्र की खंडपीठ ने उन्नाव के जिला मजिस्ट्रेट (न्यायिक) की ओर से जारी कारण बताओ नोटिस को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि नियम 3(1) के अनुसार कार्यवाही की शुरुआत पुलिस अधीक्षक, उपजिला मजिस्ट्रेट या क्षेत्र के दो सम्मानित व्यक्तियों से प्राप्त सूचना के आधार पर होनी चाहिए। जबकि उसके मामले में सूचना सीधे सफीपुर थाने के SHO ने दी, इसलिए नोटिस अवैध है। इस दलील के समर्थन में रामजी पांडे बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के पूर्ण पीठ के फैसले का भी हवाला दिया गया।

हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि मामले में SHO ने याचिकाकर्ता के आपराधिक इतिहास से संबंधित रिपोर्ट पुलिस अधीक्षक, उन्नाव के माध्यम से जिला मजिस्ट्रेट को भेजी थी। इसलिए नियम 3(1) का पूरा पालन किया गया।

अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की आपराधिक गतिविधियों की शिकायत मिलती है तो जिला मजिस्ट्रेट स्वाभाविक रूप से उसकी पुष्टि के लिए संबंधित थाने से पुलिस अधीक्षक के माध्यम से रिपोर्ट मंगाएंगे। इसलिए SHO की रिपोर्ट का एसपी के जरिए जिला मजिस्ट्रेट तक पहुंचना कानून के अनुरूप है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता का रामजी पांडे मामले पर भरोसा करना उचित नहीं है। उस फैसले के तथ्य अलग थे, जबकि वर्तमान मामले में कारण बताओ नोटिस में याचिकाकर्ता के आपराधिक इतिहास, लोक व्यवस्था के लिए कथित रूप से हानिकारक गतिविधियों और उसके खिलाफ दर्ज चार आपराधिक मामलों का स्पष्ट उल्लेख किया गया। इसलिए नोटिस पूर्ण पीठ द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप है।

अदालत ने यह भी गौर किया कि याचिकाकर्ता नोटिस जारी होने के 100 दिन से अधिक समय बाद हाईकोर्ट पहुंचा और उसने यह तक नहीं बताया कि उसे नोटिस कब प्राप्त हुआ था। पीठ ने कहा कि इस तरह की देरी याचिकाकर्ता की गंभीरता की कमी को दर्शाती है और प्रथमदृष्टया यह संकेत देती है कि वह वास्तव में नोटिस से प्रभावित भी नहीं था।

इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि नियम 3(1) का विधिवत पालन किया गया और पूर्ण पीठ के फैसले में दिए गए निर्देशों का भी उल्लंघन नहीं हुआ। इसी आधार पर अदालत ने याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।

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