इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सात साल तक की अधिकतम सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी और न्यायिक हिरासत के मामलों में पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को लापरवाही से बचने की कड़ी चेतावनी दी है। एक नाबालिग को ऐसे मामले में बार-बार न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पुलिस को पूरी तरह पालन करना होगा और रिमांड देते समय न्यायिक अधिकारियों को भी अपने विवेक का इस्तेमाल करना होगा।

जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत की पीठ ने मामले का अंतिम निस्तारण करते हुए कहा कि पुलिस या न्यायिक अधिकारियों की ओर से गिरफ्तारी और रिमांड के मामले में किसी भी तरह का लापरवाह या असंवेदनशील रवैया हल्के में नहीं लिया जाएगा।

मामले में चार लोगों के खिलाफ FIR दर्ज हुई और याचिकाकर्ता को आरोपी नंबर एक बनाया गया। शुरुआत में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 303(2) लगाई गई, जिसमें अधिकतम तीन साल की सजा का प्रावधान है। याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी के बाद धारा 317(2) भी जोड़ दी गई, जिसके तहत अधिकतम पांच साल की सजा हो सकती है। इसके बाद अलग-अलग क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेटों ने उसे बार-बार न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

हाईकोर्ट ने 4 जून को सुनवाई के दौरान नाबालिग की हिरासत को प्रथमदृष्टया अवैध माना था और उसे तत्काल जेल से रिहा करने का आदेश दिया था।

पीठ ने इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के सतेंद्र कुमार अंतिल मामले में दिए दिशा-निर्देशों का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सात साल से कम सजा वाले अपराधों में आरोपी को सीधे गिरफ्तार करने के बजाय भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 35(3) के तहत नोटिस दिया जाना चाहिए, जब तक गिरफ्तारी के लिए कानून में निर्धारित परिस्थितियां मौजूद न हों। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में गिरफ्तारी अपवाद होनी चाहिए, सामान्य नियम नहीं।

हाईकोर्ट ने 17 जुलाई को कहा था कि मौजूदा मामले में नाबालिग को पुलिस अधिकारियों को गिरफ्तार नहीं करना चाहिए था और न ही उसके रिमांड के लिए मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन पेश किया जाना चाहिए था।

पीठ ने यह भी कहा कि यदि ऐसी परिस्थितियों में पुलिस किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करती है तो रिमांड देने वाले मजिस्ट्रेट को यह सावधानी से देखना होगा कि गिरफ्तारी कानून के मुताबिक हुई है या नहीं और सभी वैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन किया गया है या नहीं।

अदालत ने कहा कि यदि अपराध में अधिकतम सात साल तक की सजा का प्रावधान है तो मजिस्ट्रेट को रिमांड देने से बचना चाहिए। यदि किसी असाधारण परिस्थिति में रिमांड देना जरूरी हो तो उसके विशेष कारण आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज होने चाहिए। मौजूदा मामले के रिमांड आदेशों को हाईकोर्ट ने प्रथमदृष्टया यांत्रिक माना और कहा कि उनमें न्यायिक विवेक के इस्तेमाल का पर्याप्त संकेत नहीं मिलता।

मामले में एक और गंभीर चूक सामने आई। याचिकाकर्ता के स्थानांतरण प्रमाणपत्र में उसकी जन्मतिथि 18 अप्रैल 2009 दर्ज थी। FIR 27 अप्रैल 2026 को दर्ज हुई, यानी घटना के समय उसकी उम्र 17 साल से कम थी। इसके बावजूद गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी और रिमांड देने वाले मजिस्ट्रेट ने उसकी उम्र की पुष्टि नहीं की।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि मजिस्ट्रेट ने उसकी उम्र की जांच की होती तो रिमांड आवेदन मंजूर कर उसे न्यायिक हिरासत में भेजा ही नहीं जा सकता था।

अदालत ने यह भी गौर किया कि इसी मामले में एक अन्य आरोपी की उम्र कम होने के कारण उसकी किशोरावस्था पहले ही सामने आ चुकी थी। ऐसे में पुलिस ने याचिकाकर्ता की उम्र की जांच क्यों नहीं की, यह भी अदालत के लिए सवाल बना।

पीठ ने यह भी पाया कि गिरफ्तारी का आधार याचिकाकर्ता को नहीं बताया गया। राज्य की ओर से भी इस तथ्य का खंडन नहीं किया गया।

बाद की सुनवाई में अदालत ने पुलिस अधिकारियों से पूछा कि जब सुप्रीम कोर्ट के 'अर्नेश कुमार' और 'सतेंद्र कुमार अंतिल' के फैसलों में सात साल तक की सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी से पहले जरूरी सुरक्षा उपायों का पालन करने के निर्देश हैं, तो याचिकाकर्ता को गिरफ्तार क्यों किया गया। पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी का उचित कारण नहीं बता सके। वे यह भी नहीं दिखा सके कि जांच में सहयोग के लिए याचिकाकर्ता या उसके परिवार से बंधपत्र लेने का कोई प्रयास किया गया।

हाईकोर्ट ने प्रथमदृष्टया माना कि पुलिस अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35 का उल्लंघन किया।

17 अगस्त की सुनवाई में अदालत को बताया गया कि जांच अधिकारी के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और मामूली दंड के तौर पर निंदा प्रविष्टि किए जाने का प्रस्ताव है। पुलिस ने यह भी बताया कि बाद में याचिकाकर्ता को विधि के अनुसार किशोर मान लिया गया और उसे किशोर आरोपी को मिलने वाला संरक्षण दिया जाएगा।

अदालत ने संबंधित न्यायिक अधिकारियों की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण और बिना शर्त माफी को भी स्वीकार किया। पीठ ने माना कि उनसे हुई गलती सद्भावना से और अनजाने में हुई। हालांकि, अदालत ने उन्हें भविष्य में ऐसे मामलों में सावधानी बरतने की चेतावनी दी और कहा कि उनके आदेशों में न्यायिक विवेक का स्पष्ट इस्तेमाल दिखाई देना चाहिए। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस चेतावनी को उनकी सेवा पुस्तिका में प्रतिकूल टिप्पणी नहीं माना जाएगा।

मामले का निस्तारण करते हुए हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि 'सतेंद्र कुमार अंतिल' और 'अर्नेश कुमार' मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का अक्षरशः पालन किया जाए। यदि रिमांड के लिए आवेदन दिया जाता है तो संबंधित न्यायिक अधिकारी जांच अधिकारी द्वारा बताए गए रिमांड के कारणों की सावधानीपूर्वक जांच करें।

पीठ ने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि पुलिस या न्यायिक अधिकारियों की ओर से किसी भी तरह की लापरवाही या असंवेदनशीलता को हल्के में नहीं लिया जाएगा। यदि किसी आरोपी की किशोर होने की दलील सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों को कानून के अनुसार उस पर विचार करना होगा।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी मामले में अवैध हिरासत साबित होती है तो इसे गंभीरता से लिया जाएगा और दोषी अधिकारियों को बख्शा नहीं जाएगा। हाईकोर्ट ने उम्मीद जताई कि याचिकाकर्ता के संबंध में जांच कानून के अनुसार पूरी की जाएगी और पुलिस की अंतिम रिपोर्ट भी विधि के अनुरूप दाखिल की जाएगी।

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