पीड़िता के अश्लील वीडियो के आरोप के बावजूद मोबाइल जब्त नहीं किया: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी के खिलाफ जांच के दिए आदेश

Update: 2026-07-25 09:38 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने POCSO मामले की जांच में गंभीर लापरवाही पाए जाने पर जौनपुर के पुलिस अधीक्षक को संबंधित जांच अधिकारी (IO) के खिलाफ विभागीय जांच कराने का निर्देश दिया।

अदालत ने कहा कि पीड़िता के अश्लील वीडियो और तस्वीरें बनाने के आरोप होने के बावजूद आरोपी और सह-आरोपी के मोबाइल फोन जब्त नहीं करना गंभीर लापरवाही है।

जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने यह आदेश उस समय पारित किया, जब वह भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं तथा POCSO Act की धारा 5/6 के तहत दर्ज मामले में आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहे थे।

अदालत ने कहा,

"मामले के तथ्यों से स्पष्ट है कि पुलिस ने आरोपी और सह-आरोपी के मोबाइल फोन जब्त नहीं किए, जबकि उन्हीं के माध्यम से पीड़िता के अश्लील वीडियो और तस्वीरें बनाए जाने का आरोप था। यह गंभीर लापरवाही है।"

हाईकोर्ट ने याद दिलाया कि वर्ष 2026 में दिए गए अपने एक फैसले में वह उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दे चुका है कि यदि किसी मामले में आरोपी पर मोबाइल फोन से अश्लील वीडियो बनाने, तस्वीरें खींचने या उन्हें शेयर करने का आरोप हो तो जांच अधिकारी संबंधित मोबाइल फोन तत्काल जब्त करे और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें फोरेंसिक साइंस लैब भेजकर जांच कराए।

अदालत ने कहा कि वर्तमान मामले में भी उसी प्रकार की चूक हुई, जिससे जांच अधिकारी की लापरवाही स्पष्ट होती है।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने जौनपुर के पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया कि संबंधित जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच कर यह पता लगाया जाए कि उसने आरोपी और सह-आरोपी के मोबाइल फोन जब्त क्यों नहीं किए।

मामले के गुण-दोष पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी को जमानत भी दी।

अदालत ने कहा कि प्रथम सूचना रिपोर्ट और पीड़िता के बयानों में अश्लील वीडियो और तस्वीरों के जरिए ब्लैकमेल करने का आरोप लगाया गया, लेकिन जांच के दौरान ऐसा कोई वीडियो या तस्वीर बरामद नहीं हुई।

जमानत देते समय अदालत ने पीड़िता की मेडिकल जांच रिपोर्ट, उपलब्ध साक्ष्यों, आरोपी की कथित भूमिका तथा इस तथ्य को भी ध्यान में रखा कि इसी मामले में एक अन्य सह-आरोपी को पहले ही जमानत मिल चुकी है।

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