FSL रिपोर्ट में केवल निष्कर्ष नहीं, वैज्ञानिक आधार और कारण भी बताना अनिवार्य: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के दो आरोपियों को बरी किया
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) की रिपोर्ट में केवल निष्कर्ष लिख देना पर्याप्त नहीं है। रिपोर्ट में यह स्पष्ट होना चाहिए कि कौन-कौन से वैज्ञानिक परीक्षण किए गए किन वैज्ञानिक मानकों को अपनाया गया और किन आधारों पर विशेषज्ञ अपने निष्कर्ष पर पहुंचे। ऐसी जानकारी के बिना केवल निष्कर्ष दर्ज करने वाली एफएसएल रिपोर्ट साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं की जा सकती।
जस्टिस अजय भनोट और जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत की खंडपीठ ने ये टिप्पणियां वर्ष 2013 के एक कथित विष देकर हत्या के मामले में सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आजीवन कारावास की सजा पाए एक महिला और उसके सह-आरोपी को सम्मानपूर्वक बरी करते हुए आपराधिक जांच प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए।
अभियोजन का आरोप था कि महिला ने अपने कथित प्रेमी के साथ मिलकर पति के भोजन में एल्यूमिनियम फॉस्फाइड मिलाकर उसकी हत्या कर दी थी। ट्रायल कोर्ट ने दोनों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
अपील में आरोपियों की ओर से कहा गया कि विष देने का आरोप साबित नहीं हुआ। साथ ही, विसरा नमूने की जांच में अत्यधिक देरी हुई और अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि जांच तक नमूना सुरक्षित और परीक्षण योग्य स्थिति में रखा गया। यह भी तर्क दिया गया कि एफएसएल रिपोर्ट में केवल विष मिलने का निष्कर्ष दर्ज है, लेकिन उसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण या परीक्षण का विवरण नहीं दिया गया।
हाईकोर्ट ने FSL रिपोर्ट का परीक्षण करते हुए पाया कि उसमें केवल यह लिखा गया कि विसरा में एल्यूमिनियम फॉस्फाइड पाया गया लेकिन यह नहीं बताया गया कि कौन से परीक्षण किए गए कौन-सी वैज्ञानिक पद्धति अपनाई गई और विशेषज्ञ इस निष्कर्ष तक कैसे पहुंचे।
कोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 45 के तहत विशेषज्ञ की राय तभी स्वीकार्य होती है, जब वह ठोस वैज्ञानिक कारणों और परीक्षणों पर आधारित हो।
कोर्ट ने कहा,
"जो विशेषज्ञ राय कारणों से रहित हो या यह न बताए कि निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए कौन-से वैज्ञानिक मानकों का पालन किया गया वह किसी काम की नहीं है।"
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि विसरा सैंपल जुलाई 2013 में सुरक्षित किया गया, अगस्त 2013 में FSL पहुंचा लेकिन उसकी जांच सितंबर 2014 में यानी एक वर्ष से अधिक समय बाद की गई। अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि इस दौरान नमूना सुरक्षित परिस्थितियों में रखा गया था या जांच के समय वह परीक्षण योग्य स्थिति में था। FSL रिपोर्ट में भी सैंपल की स्थिति या लैब में उसके संरक्षण का कोई उल्लेख नहीं था।
कोर्ट ने कहा कि इतनी लंबी अवधि में सैंपल के खराब होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
मामले में अदालत ने एक विष विज्ञान विशेषज्ञ की भी सहायता ली और मेडिकल लिटरेचर का अध्ययन किया। कोर्ट ने पाया कि एल्यूमिनियम फॉस्फाइड में अत्यधिक तीखी गंध होती है। मृतक के शरीर पर जबरन विष पिलाने के कोई निशान भी नहीं थे। ऐसे में भोजन में यह विष मिलाकर बिना किसी प्रतिरोध के उसे खिलाए जाने की अभियोजन की कहानी अत्यंत अविश्वसनीय प्रतीत होती है।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को साक्ष्यों के विपरीत और विकृत बताते हुए दोनों आरोपियों की दोषसिद्धि और सजा रद्द कर उन्हें तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।
भविष्य में ऐसी जांच संबंधी कमियों और न्यायिक त्रुटियों से बचने के लिए हाईकोर्ट ने कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए। अदालत ने कहा कि FSL रिपोर्ट में निष्कर्ष के साथ वैज्ञानिक आधार, लैब टेस्ट, अपनाई गई वैज्ञानिक प्रक्रिया और अन्य संबंधित सामग्री का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए। रिपोर्ट तैयार करने वाले विशेषज्ञ की योग्यता और अनुभव का विवरण भी उसमें दर्ज किया जाए।
इसके अलावा रिपोर्ट में सैंपल के सुरक्षित संरक्षण, जांच के समय उनकी उपयुक्तता तथा सैंपल की प्राप्ति और स्थानांतरण की पूरी प्रक्रिया का उल्लेख किया जाए। इसके लिए सख्त मानक संचालन प्रक्रिया लागू की जाए, ताकि सैंपल्स से किसी प्रकार की छेड़छाड़ या उनके खराब होने की आशंका समाप्त हो सके। अदालत ने यह भी कहा कि पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों के समक्ष FSL रिपोर्ट के निष्कर्ष भी रखे जाने चाहिए।
हाईकोर्ट ने पुलिस महानिदेशक और फॉरेंसिक साइंस लैब के निदेशकों सहित संबंधित अधिकारियों को इन सुरक्षा उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए अधिकारियों और विशेषज्ञों को उचित प्रशिक्षण सुनिश्चित करने की भी सलाह दी।