इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि डेवलपमेंट अथॉरिटी 'इम्पैक्ट फ़ीस' या 'ओपन एरिया पेनल्टी' नहीं लगा सकती। कोर्ट ने माना कि उत्तर प्रदेश शहरी योजना और विकास अधिनियम, 1973 की धारा 15(2-A) के तहत अथॉरिटी केवल डेवलपमेंट फ़ीस, म्यूटेशन चार्ज, स्टैकिंग फ़ीस और पानी की फ़ीस ही वसूल सकती है।

इन दो तरह के शुल्क (लेवी) को लगाने के अधिकार पर नहीं, बल्कि उनकी गणना (कैलकुलेशन) की दर पर सवाल उठाया गया। कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक अदालत द्वारा कानून की व्याख्या शुरुआत से ही लागू मानी जाती है। याचिकाकर्ता को इसके लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।

मथुरा-वृंदावन डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम राजेश शर्मा और अन्य मामले का हवाला देते हुए, जिसमें डेवलपमेंट चार्ज को तो सही ठहराया गया लेकिन धारा 15(2-A) के दायरे से बाहर के शुल्कों (जिनमें इम्पैक्ट फ़ीस भी शामिल थी) को संविधान के अनुच्छेद 265 का उल्लंघन माना गया, जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की बेंच ने कहा:

"1973 के अधिनियम की धारा 15(2-A) और राजेश शर्मा मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को पढ़ने से यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि डेवलपमेंट अथॉरिटी न तो इम्पैक्ट फ़ीस लगा सकती है और न ही ओपन एरिया पेनल्टी।"

याचिकाकर्ता इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन का रिटेल आउटलेट चलाने वाली एक सोल प्रोप्राइटरशिप फर्म है। उसने 27.09.2004 को प्रयागराज के थॉर्नहिल रोड पर स्थानांतरित (री-साइटेड) किए जा रहे पेट्रोल पंप के साइट-प्लान की मंज़ूरी के लिए आवेदन किया। मंज़ूरी लगभग तीन साल बाद मिली। 22.05.2007 के एक मेमो के ज़रिए प्रयागराज डेवलपमेंट अथॉरिटी ने कई मदों (हेड्स) के तहत 25,05,635 रुपये की मांग की, जिसमें से 15,04,238 रुपये इम्पैक्ट चार्ज और 6,01,695 रुपये ओपन एरिया पेनल्टी के तौर पर थे। रिट याचिका में 2004 में लागू ₹5800 प्रति वर्ग मीटर की सर्कल रेट पर दो लेवी (शुल्क) में कमी की मांग की गई, न कि 24.06.2006 से लागू ₹9000 की दर पर; क्योंकि मंज़ूरी में देरी डीलर की गलती नहीं थी।

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि ये लेवी पूरी तरह से गैर-कानूनी थीं। उन्होंने 'श्रीमती रेखा रानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य' और सुप्रीम कोर्ट के 'मथुरा वृंदावन विकास प्राधिकरण व अन्य बनाम राजेश शर्मा व अन्य' के फैसले का हवाला दिया। प्राधिकरण ने 2007 से 2026 के बीच किसी भी चरण में कोई जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं किया।

आगे कहा गया,

"यह सर्वविदित है कि संवैधानिक अदालत का फैसला घोषणात्मक होता है और कानून को वैसा ही बताता है जैसा वह हमेशा से रहा है। इसलिए फैसले भविष्य-प्रभावी (Prospective) नहीं होते, जब तक कि संवैधानिक अदालत उसमें कानून की घोषणा न करे और उसे किसी खास तारीख से भविष्य-प्रभावी न बनाए।"

यह मानते हुए कि विकास प्राधिकरण 'इम्पैक्ट फीस' या 'ओपन एरिया पेनल्टी' नहीं लगा सकता, अदालत ने उसी नोटिस में शामिल अन्य लेवी (जैसे सब-डिविजन फीस) पर कोई टिप्पणी नहीं की; क्योंकि याचिकाकर्ता ने कभी उन्हें चुनौती नहीं दी थी और याचिका में संशोधन करके आसानी से ऐसा कर सकता था।

इसके अनुसार, दो लेवी के संबंध में डिमांड नोटिस रद्द कर दिया गया। साथ ही नोटिस में शामिल अन्य शुल्कों को घटाने के बाद, जमा की गई राशि में से ₹21,05,933 वापस करने का निर्देश दिया गया। यह भुगतान PDA के वाइस-चेयरमैन को आदेश मिलने के एक महीने के भीतर किया जाना था, जिसमें 12.06.2007 से वास्तविक रिफंड तक 6% प्रति वर्ष की दर से साधारण ब्याज भी शामिल था।

Case Title : Kapil Dev Vyas Filling Station Allahabad and another v. State of U.P. and others

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