गौवध 'जीवन की सामान्य गति' को बाधित करता है, स्वतः ही हिंसक प्रतिक्रियाएं भड़काती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने NSA के तहत हिरासत को सही ठहराया
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA), 1980 के तहत व्यक्ति की हिरासत को सही ठहराया। इस व्यक्ति पर 2025 में होली के समय के आसपास जंगल में एक गाय और दो बछड़ों की हत्या करने का आरोप है।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस संजीव कुमार की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि गाय की हत्या स्वतः ही तीव्र भावनाएं और हिंसक प्रतिक्रियाएं भड़काती है, क्योंकि इससे समाज के एक बड़े वर्ग की धार्मिक भावनाओं को स्पष्ट रूप से ठेस पहुंचती है।
कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे कृत्य के समाज में तत्काल और व्यापक परिणाम होते हैं, जिससे लगभग हमेशा बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क उठती है। यह हिंसा एक शांत समाज को नुकसान पहुंचाती है और जीवन की सामान्य गति को पूरी तरह से बाधित कर देती है।
खंडपीठ ने अपने आदेश में टिप्पणी की,
"कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिनके प्रति समुदाय इतना संवेदनशील होता है कि यदि वे सामने आते हैं तो उनमें समाज में व्यापक उथल-पुथल मचाने की अंतर्निहित क्षमता होती है, जो जीवन की सामान्य गति को प्रभावित करती है। इनमें से एक मुद्दा गाय की हत्या है।"
यह देखते हुए कि इस कृत्य में जीवन की सामान्य गति को बाधित करने की क्षमता है और यह सार्वजनिक व्यवस्था का उल्लंघन करता है, खंडपीठ ने हिरासत आदेश पारित करने में 'हिरासत प्राधिकारी' (Detaining Authority) को पूरी तरह से उचित पाया। प्राधिकारी ने यह सोचकर आदेश दिया कि जेल से रिहा होने पर याचिकाकर्ता सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए हानिकारक गतिविधियों में शामिल हो सकता है।
इस प्रकार, खंडपीठ ने याचिकाकर्ता-समीर द्वारा अपनी हिरासत को चुनौती देने वाली 'बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका' (habeas corpus petition) खारिज की। समीर की हिरासत का आदेश शामली के ज़िला मजिस्ट्रेट ने NSA की धारा 3(3) के तहत दिया था, जिसे बाद में राज्य सरकार ने भी सही ठहराया था।
संक्षेप में मामला
अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार, 15 मार्च 2025 को पुलिस दल को शामली ज़िले के एक गांव के खेत में गाय के बछड़ों के अवशेष मिले। चूंकि उस समय होली का त्योहार चल रहा था, इसलिए इस घटना से हिंदू आबादी के बीच अशांति फैल गई, जिसके चलते शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए वहाँ अतिरिक्त बल तैनात करना पड़ा।
पुलिस ने दावा किया कि स्थानीय ग्रामीणों और विभिन्न हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं की आक्रोशित भीड़ घटनास्थल पर जमा हो गई। उन्होंने इस कृत्य के लिए ज़िम्मेदार अपराधियों की तत्काल गिरफ़्तारी की माँग करते हुए ज़ोरदार नारे लगाए।
ज़ाहिर तौर पर उन्होंने एक सड़क को भी पूरी तरह से अवरुद्ध कर दिया, जिसके कारण नाकेबंदी के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं। वहां से गुज़रने वाले राहगीरों और यात्रियों को इससे काफ़ी परेशानी का सामना करना पड़ा। नाकाबंदी की वजह से सड़क पर लगा यह जाम कई घंटों तक बना रहा, जिसके परिणामस्वरूप इलाके में सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हुई।
बेंच को बताया गया कि पुलिस को कई गांवों में डेरा डालना पड़ा ताकि इस घटना से बिगड़ी सार्वजनिक व्यवस्था को बहाल किया जा सके।
पुलिस जांच के बाद याचिकाकर्ता और उसके साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्होंने जंगल में एक गाय और दो बछड़ों की हत्या करने की बात कबूल कर ली।
अब, जब आरोपी जेल में बंद है तो कथित तौर पर पुलिस को यह खुफिया जानकारी मिली कि याचिकाकर्ता अपनी जमानत कराने के लिए सक्रिय रूप से कोशिश कर रहा है। उसने जेल से संदेश भिजवाए हैं कि रिहा होने पर वह फिर से गोहत्या करेगा और पुलिस उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती।
इसे देखते हुए इस आशंका से कि वह हाईकोर्ट से जमानत हासिल कर सकता है (जबकि उसे जिला अदालत से कोई राहत नहीं मिली थी), उसके खिलाफ विवादित हिरासत आदेश पारित किया गया।
हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ता ने दलील दी कि उस पर लगाया गया अपराध एक छोटा-मोटा अपराध है, जिसकी सुनवाई मजिस्ट्रेट कर सकता है; और अगर यह साबित भी हो जाता है कि यह अपराध उसी ने किया तो भी यह "कानून-व्यवस्था के उल्लंघन से ज़्यादा कुछ नहीं" माना जाएगा। इसलिए यह तर्क दिया गया कि NSA के तहत हिरासत में रखना अनुचित था।
दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील ने इस विवादित आदेश का बचाव किया।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
इन दलीलों की पृष्ठभूमि में डिवीज़न बेंच ने गौर किया कि गोहत्या एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर समुदाय बहुत ज़्यादा संवेदनशील है। इसके समाज पर तत्काल और व्यापक असर होते हैं, जिससे लगभग हमेशा बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क उठती है।
इस संबंध में बेंच ने ज़ोर देकर कहा कि गोहत्या का यह कृत्य उस इलाके में, या शायद उससे भी आगे, बड़े क्षेत्रों में जीवन की सामान्य गति को बाधित करता है और सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाता है।
इस संबंध में बेंच ने शौकत अली बनाम भारत संघ और अन्य के मामले में हाईकोर्ट के 2002 के एक आदेश का हवाला दिया, जिसमें यह कहा गया कि गोहत्या सांप्रदायिक तनाव भड़काती है, वैमनस्य पैदा करती है और ऐसी स्थिति उत्पन्न करती है जिससे सार्वजनिक व्यवस्था भंग हो जाती है।
बेंच ने टिप्पणी की,
"...ऐसा नहीं है कि ये केवल ऐतिहासिक रिकॉर्ड की बातें हैं, जिन्हें किताबों में पढ़ा जाए या आज के ज़माने में सिर्फ़ कल्पना की जाए। गोहत्या होने पर हिंसक प्रतिक्रियाएं इतनी आम और जानी-पहचानी हैं कि कोई भी इस तथ्य से अनजान होने का दिखावा नहीं कर सकता, फिर चाहे कानून का उल्लंघन हुआ हो या नहीं। आख़िरकार, सार्वजनिक व्यवस्था का संबंध इस बात से नहीं है कि किसी व्यक्ति का इरादा क्या था, या उसने किस कानून का उल्लंघन किया। इसका संबंध उस असर से है, जो उसके कृत्य से पैदा होता है।"
बेंच ने इस तर्क पर भी विचार किया कि क्या जेल में बंद किसी व्यक्ति को निवारक हिरासत में रखा जा सकता है। इसने कमरुननिसा बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला देते हुए कहा कि अधिकारी ऐसे व्यक्ति के ख़िलाफ़ हिरासत का आदेश वैध रूप से पारित कर सकता है, यदि इस बात की वास्तविक संभावना हो कि उसे ज़मानत पर रिहा कर दिया जाएगा और ऐसे विश्वसनीय साक्ष्य मौजूद हों जिनसे यह पता चलता हो कि रिहा होने पर वह सार्वजनिक व्यवस्था के लिए हानिकारक गतिविधियों में शामिल हो सकता है।
बेंच ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को भी ख़ारिज किया कि राज्य सरकार और सलाहकार बोर्ड ने उसकी हिरासत के ख़िलाफ़ उसके अभ्यावेदन पर निर्णय लेने में अत्यधिक विलंब किया।
परिणामस्वरूप, यह पाते हुए कि यह निश्चित रूप से एक ऐसा मामला है, जहां याचिकाकर्ता द्वारा किए गए अपराध के परिणामस्वरूप सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचा है। यह केवल कानून-व्यवस्था के उल्लंघन का मामला नहीं था, बेंच ने बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका ख़ारिज की।
Case Title - Sameer and another vs. State of U.P. and 7 others 2026 LiveLaw (AB) 233