यूपी MLC चुनाव की मतदाता सूची को चुनौती देने वाली याचिका खारिज, हाईकोर्ट ने कहा- चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद अधिसूचना को चुनौती नहीं
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश विधान परिषद (MLA) की पांच स्नातक निर्वाचन सीटों और छह शिक्षक निर्वाचन सीटों की मतदाता सूचियों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका बुधवार को खारिज की। हाईकोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया में कोई त्रुटि नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 329 के तहत चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद चुनाव अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार नहीं किया जा सकता।
चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने कहा कि याचिका मतदाता सूची में संशोधन को लेकर गलत आशंका पर आधारित है। याचिकाकर्ता ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 और धारा 23 के बीच अंतर को ठीक से नहीं समझा।
यह जनहित याचिका अक्षय उपाध्याय ने दाखिल की। उन्होंने खुद को विधान परिषद की इलाहाबाद-झांसी स्नातक निर्वाचन सीट का निवासी बताया। याचिका में 29 सितंबर 2026 की उस अधिसूचना रद्द करने की मांग की गई, जिसके तहत स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव कराए जाने थे। याचिकाकर्ता ने इन चुनावों के लिए 30 सितंबर 2025 की अधिसूचना के आधार पर तैयार मतदाता सूचियों को भी चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता का कहना था कि मौजूदा मतदाता सूचियों के कारण पात्र स्नातक मतदाता अपने मताधिकार से वंचित हो सकते हैं। उन्होंने पांच स्नातक और छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए नई मतदाता सूचियां तैयार करने और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 तथा निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के अनुसार चुनाव कराने का निर्देश देने की मांग की थी।
याचिका में दलील दी गई कि अधिकारी आगामी चुनावों से पहले नई मतदाता सूचियां तैयार किए बिना ही चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ा रहे हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार, वर्ष 2025 में मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण किया गया। इसके लिए एक नवंबर 2025 को अर्हता तिथि निर्धारित की गई, जबकि चुनाव 23 अक्टूबर 2026 को होने थे। उन्होंने कहा कि पुरानी मतदाता सूचियों पर निर्भर रहने से वर्ष 2023 में पात्रता हासिल करने वाले स्नातकों को मतदाता सूची में नाम शामिल कराने का अवसर नहीं मिलेगा।
याचिकाकर्ता ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 और निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के नियम 31 का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि अधिकारियों ने 26 सितंबर से 29 सितंबर 2026 के बीच मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया अपनाई, जो कानूनी प्रावधानों के अनुरूप नहीं थी। उन्होंने यह भी कहा कि नियम 31 के उपनियम (4) के तहत समाचार पत्र में अधिसूचना प्रकाशित नहीं की गई, जिससे कई युवा मतदाताओं को सूची में अपना नाम दर्ज कराने का अवसर नहीं मिला।
निर्वाचन आयोग ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि मतदाता सूचियों को अंतिम रूप जनवरी 2026 में दिया गया। आयोग के मुताबिक, मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया 21 नवंबर 2025 की अधिसूचना से शुरू हुई और अंतिम सूची 6 जनवरी 2026 को प्रकाशित कर दी गई।
आयोग ने दलील दी कि इसके बाद की गई कार्रवाई जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 23(3) के अनुरूप थी। यह प्रावधान मतदाता सूची में नाम शामिल करने से संबंधित है। आयोग ने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया के लिए समाचार पत्र में अलग से अधिसूचना प्रकाशित करना आवश्यक होने की याचिकाकर्ता की दलील सही नहीं है।
आयोग ने अदालत को यह भी बताया कि याचिकाकर्ता ने इससे पहले भी स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण को चुनौती देते हुए जनहित याचिका दाखिल की थी, जिसे अक्टूबर 2025 में खारिज कर दिया गया।
मामले में पेश दलीलों और अभिलेखों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 मतदाता सूचियों की तैयारी और पुनरीक्षण, धारा 22 प्रविष्टियों में सुधार तथा धारा 23 मतदाता सूची में नाम शामिल करने से संबंधित है।
खंडपीठ ने कहा कि मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण 6 जनवरी 2026 को पूरा हो चुका था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने जिस प्रक्रिया को चुनौती दी, वह अधिनियम की धारा 23 के दायरे में आती है।
अदालत ने धारा 23(3) का उल्लेख करते हुए कहा,
“निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख तक किसी भी प्रविष्टि में संशोधन, स्थानांतरण या उसे हटाने की अनुमति है। इसलिए प्रतिवादियों की ओर से 26 सितंबर 2026 से 29 सितंबर 2026 के बीच की गई कार्रवाई में प्रथम दृष्टया कोई त्रुटि नहीं पाई जाती।”
हाईकोर्ट ने आगे कहा कि याचिका गलत आशंका और अधिनियम की धारा 21 तथा धारा 23 के बीच अंतर नहीं समझने के कारण दाखिल की गई प्रतीत होती है। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 का नियम 31 धारा 21 के तहत मतदाता सूची तैयार करने से संबंधित है। यह नियम धारा 23, विशेष रूप से उसकी उपधारा (3), पर लागू नहीं होता।
चुनाव अधिसूचना को चुनौती देने के संबंध में अदालत ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, इसलिए इस स्तर पर ऐसी चुनौती पर विचार नहीं किया जा सकता। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 329 के तहत लागू प्रतिबंध भी इस मामले में प्रभावी होगा।
इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका में कोई ठोस आधार नहीं पाया और उसे खारिज किया।