इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बताया कि ज़रूरी सामान से जुड़े मामलों में नेशनल सिक्योरिटी एक्ट, 1980 (NSA) कब लागू किया जा सकता है। कोर्ट ने साफ़ किया कि जहाँ ज़रूरी सामान की सप्लाई में शारीरिक रुकावट डालने पर NSA लग सकता है, वहीं कालाबाज़ारी के मामलों से आम तौर पर 'प्रिवेंशन ऑफ़ ब्लैक-मार्केटिंग एंड मेंटेनेंस ऑफ़ सप्लाईज़ ऑफ़ एसेंशियल कमोडिटीज़ एक्ट, 1980' (PBMSEC Act) के तहत निपटा जाना चाहिए।

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने कहा कि कालाबाज़ारी के मामले में किसी व्यक्ति को एक साल के लिए हिरासत में रखने के लिए NSA लागू करना - सिर्फ़ इसलिए कि स्पेशल कानून में हिरासत की अधिकतम अवधि 6 महीने ही तय है - "कानून का गलत इस्तेमाल" होगा।

कोर्ट ने दोनों कानूनों के लागू होने की परिस्थितियों में अंतर बताते हुए कहा,

"जनरल लॉ और स्पेशल लॉ के बीच अंतर यह है कि PBMSEC Act केवल उन मामलों में हिरासत के लिए लागू होगा जहाँ 'एसेंशियल कमोडिटीज़ एक्ट' के तहत ज़रूरी सामान की कालाबाज़ारी की गई हो।"

बेंच का मानना ​​था कि NSA और PBMSEC Act के लागू होने के बीच का अंतर "बारीक लेकिन वास्तविक" है।

कोर्ट ने कहा,

"इसके अलावा, बाकी सभी स्थितियों में जहाँ मुख्य मुद्दा कालाबाज़ारी का है, स्पेशल एक्ट ही प्रभावी होगा।"

कोर्ट ने ये टिप्पणियां उत्तर प्रदेश में खाद की कथित कालाबाज़ारी के मामले में NSA के तहत हिरासत में लिए गए लोगों द्वारा दायर 4 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिकाओं को मंज़ूरी देते हुए कीं।

इसने बुलंदशहर के ज़िला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी हिरासत के आदेशों को रद्द किया और निर्देश दिया कि अगर याचिकाकर्ताओं की किसी अन्य मामले में ज़रूरत न हो तो उन्हें तुरंत रिहा कर दिया जाए।

मामले का संक्षिप्त विवरण

अभियोजन पक्ष के अनुसार, पुलिस की एक टीम ने 3 ट्रकों को रोका, जिनमें से प्रत्येक में IFFCO यूरिया के 525 बोरे लदे थे। कथित तौर पर ड्राइवरों के पास खाद के परिवहन को सही ठहराने वाले बिल या वाउचर नहीं थे।

खबरों के मुताबिक, ट्रक ड्राइवरों ने पुलिस को बताया कि खाद मोहम्मद हारून की है, जो याचिकाकर्ताओं में से एक है। याचिकाकर्ता तीसरे ट्रक के साथ कार में यात्रा कर रहा था और उसे हिरासत में ले लिया गया।

पुलिस केस के अनुसार, हारून ने बताया कि खाद की कीमत लगभग ₹5.50 लाख थी। उसने कथित तौर पर एक व्यक्ति को ₹4.50 लाख नकद और दूसरे आरोपी को डिजिटल पेमेंट के ज़रिए ₹1 लाख दिए।

उसने यह भी बताया कि जब PCF गोदाम में खाद लोड की जा रही थी, तब कुछ अधिकारी वहाँ मौजूद थे।

पुलिस का आरोप है कि खाद को खुले बाज़ार में ज़्यादा कीमत पर बेचने के लिए गैर-कानूनी तरीके से ले जाया जा रहा था, ताकि प्राइवेट पार्टियों को गैर-कानूनी फ़ायदा पहुँचाया जा सके और राज्य को नुकसान हो।

आपराधिक मामला दर्ज होने के बाद NSA के तहत चारों याचिकाकर्ताओं के ख़िलाफ़ हिरासत के आदेश जारी किए गए। एडवाइज़री बोर्ड ने उनकी आपत्तियों को खारिज कर दिया।

अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

कोर्ट ने साफ़ किया कि ज़रूरी चीज़ों के गैर-कानूनी व्यापार या ट्रांसपोर्ट से जुड़े हर मामले में NSA लागू नहीं होता, सिर्फ़ इसलिए कि उसमें ज़रूरी चीज़ें शामिल हैं।

फ़र्क समझाते हुए बेंच ने कहा कि NSA की धारा 3(2) के तहत हिरासत को तब सही ठहराया जा सकता है, जब ज़रूरी चीज़ों के ट्रांसपोर्ट में "फिज़िकल रुकावट" हो, उन सड़कों को नष्ट कर दिया जाए, जिनसे सप्लाई उचित मूल्य की दुकानों तक पहुँचती है, या कोई और ऐसी हरकत हो जिससे ऐसी चीज़ों की सप्लाई रुक जाए।

हालांकि, बेंच ने कहा कि जहां मुख्य आरोप ज़रूरी चीज़ों की कालाबाज़ारी से जुड़ा हो, वहाँ स्पेशल कानून ही लागू होना चाहिए।

कोर्ट ने कहा,

"कालाबाज़ारी के मामले में NSA का इस्तेमाल करना और हिरासत में लिए गए व्यक्ति को एक साल के लिए हिरासत में रखना - सिर्फ़ इसलिए कि स्पेशल एक्ट में ज़्यादा से ज़्यादा छह महीने की हिरासत का प्रावधान है - कानून का गलत इस्तेमाल और स्पेशल एक्ट से बचने के लिए किया गया टेढ़ा-मेढ़ा काम होगा।"

बेंच ने आगे कहा कि ऐसी कार्रवाई को रद्द किया जा सकता है।

याचिकाकर्ताओं ने अपनी हिरासत को इस आधार पर चुनौती दी थी कि जब ज़रूरी चीज़ों की कालाबाज़ारी के मामलों में प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) से निपटने के लिए एक स्पेशल कानून मौजूद है, तो अधिकारी NSA लागू नहीं कर सकते।

राज्य ने ज़रूरी चीज़ों से जुड़े मामले में NSA के तहत हिरासत को सही ठहराने के लिए सुप्रीम कोर्ट के 'सूरज पाल साहू बनाम महाराष्ट्र राज्य (1986)' के फ़ैसले का हवाला दिया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने उस मामले के तथ्यों को अलग बताया।

कोर्ट ने गौर किया कि सूरज पाल साहू मामले में आरोप रेलवे के सामान - जिसमें ट्रैक और स्लीपर शामिल थे, जिन्हें रखरखाव के लिए रेलवे लाइनों के किनारे रखा गया - को हटाने और चोरी करने से जुड़े थे। कोर्ट ने माना कि उन सामानों को हटाने से रेलवे सेवाओं को बनाए रखने के लिए ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर की उपलब्धता पर असर पड़ सकता था।

बेंच ने पाया कि वह मामला कालाबाज़ारी का नहीं, बल्कि रेलवे की संपत्ति की चोरी और बिक्री का था, जिससे ज़रूरी सार्वजनिक सेवा में रुकावट आ सकती थी।

इसके विपरीत, बेंच ने पाया कि मौजूदा मामले में आरोप अधिकारियों की मिलीभगत से ज़्यादा कीमत पर बेचने के लिए खाद के ट्रांसपोर्ट से जुड़े थे।

कोर्ट ने NSA के तहत हिरासत सही थी या नहीं, यह तय करने के लिए इस अंतर पर विचार किया। NSA के तहत हिरासत को अनुचित मानते हुए कोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिकाओं को मंज़ूरी दी।

बुलंदशहर के ज़िला मजिस्ट्रेट द्वारा 23 मई, 29 मई और 12 जुलाई, 2026 को जारी हिरासत के आदेशों को रद्द करते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को रिहा किया जाए, बशर्ते वे किसी अन्य मामले में वांछित न हों।

Case Title : Mohammad Haroon vs. Union Of India And 5 Others 2026 LiveLaw (AB) 831

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