जस्टिस अजय भनोट के कथित आचरण को लेकर वकीलों के विरोध-प्रदर्शन के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को वकीलों के एक समूह द्वारा कोर्टरूम के प्रवेश द्वारों को रोकने और कोर्ट स्टाफ को मुख्य गेट से अंदर जाने से रोकने पर कड़ी आपत्ति जताई।

कोर्ट ने कहा कि वकीलों द्वारा जानबूझकर अपने कर्तव्यों से दूर रहने के कारण न्यायिक कार्यवाही को 'ठप' नहीं होने दिया जा सकता।

दिलचस्प बात यह है कि यह आदेश जस्टिस भनोट की अध्यक्षता वाली एक डिवीजन बेंच ने दिया, जो 28 अक्टूबर से वकीलों के विरोध-प्रदर्शन के केंद्र में हैं। पिछले हफ्ते यह विरोध और तेज हो गया, जिसमें वकीलों द्वारा कथित तौर पर तोड़फोड़ भी की गई।

बता दें, जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत के साथ वाली इस बेंच ने दर्ज किया कि बड़ी संख्या में वकील कोर्टरूम के बाहर जमा हो गए और इतना शोर मचाया कि कोर्ट की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न हुई।

बेंच ने गौर किया कि वकीलों ने कोर्ट स्टाफ को मुख्य गेट से कोर्टरूम में प्रवेश करने से रोक दिया। इस स्थिति को देखते हुए कोर्ट ने स्टाफ से कहा कि वे जजों के लिए बने दरवाजे से कोर्टरूम में प्रवेश करें।

बेंच ने कहा,

"उन वकीलों की वजह से कोर्ट की कार्यवाही ठप नहीं हो सकती, जो जानबूझकर अपने कर्तव्यों से दूर रह रहे हैं।"

यह टिप्पणी तब की गई, जब बेंच एक क्रिमिनल रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में आवेदकों के खिलाफ दर्ज FIR को चुनौती दी गई। आवेदकों पर शादी का झूठा वादा करके यौन संबंध बनाने, आपराधिक धमकी देने और दंगा करने जैसे आरोप लगाए गए। इस मामले को 'रिवाइज्ड कॉल' (दोबारा पुकारने) के दौरान लिया गया।

कोर्ट ने देखा कि याचिकाकर्ताओं की ओर से रिट याचिका के समर्थन में कोई भी पेश नहीं हुआ, जबकि कॉज लिस्ट में उनके वकीलों के नाम मौजूद थे। असिस्टेंट गवर्नमेंट एडवोकेट (सहायक सरकारी वकील) भी वहां मौजूद नहीं थे।

असिस्टेंट गवर्नमेंट एडवोकेट की अनुपस्थिति पर संज्ञान लेते हुए बेंच ने सरकारी वकील (गवर्नमेंट एडवोकेट) को निर्देश दिया कि वे कोर्ट में उनकी अनुपस्थिति का कारण बताते हुए एक रिपोर्ट पेश करें।

मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए कोर्ट ने पाया कि FIR में दर्ज है कि याचिकाकर्ता नंबर 1 और शिकायतकर्ता (पहली सूचना देने वाली महिला) आपसी सहमति से रिश्ते में थे और उनके बीच शारीरिक संबंध थे। कोर्ट ने यह भी पाया कि दोनों पक्षों के बीच संपत्ति को लेकर विवाद चल रहा है। इसलिए अगली सुनवाई की तारीख तक या CrPC की धारा 173 / BNSS की धारा 193 के तहत पुलिस रिपोर्ट दाखिल होने तक—इनमें से जो भी पहले हो—अदालत ने याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी पर रोक लगाई।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में विरोध-प्रदर्शन के बारे में

यह घटनाक्रम 27 अक्टूबर को कोर्ट नंबर 49 में हुई एक घटना के बाद सामने आया है, जहां जस्टिस अजय भनोट सुनवाई कर रहे थे।

इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने 28 अक्टूबर को चीफ जस्टिस अरुण भंसाली को पत्र लिखकर जस्टिस भनोट की अदालत का बहिष्कार करने की चेतावनी दी। एसोसिएशन ने आरोप लगाया कि उन्होंने अदालती कार्यवाही के दौरान एक वकील को अपमानित किया और एक सीनियर वकील का मजाक उड़ाया।

एसोसिएशन के पत्र के अनुसार, एक वकील ने इस बात पर आपत्ति जताई कि एक पुलिस अधिकारी कोर्ट रूम में एक विशेष सीट पर बैठा हुआ था।

एसोसिएशन ने आरोप लगाया कि इसके बाद जस्टिस भनोट ने वकील को जेल भेजने का आदेश दिया और उन्हें अधिकारी से माफी मांगने के लिए मजबूर किया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जज ने वरिष्ठ वकील वीपी श्रीवास्तव का मजाक उड़ाया।

पत्र में चेतावनी दी गई कि अगर कोई उचित कार्रवाई नहीं की गई तो इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन जस्टिस भनोट की अदालत का बहिष्कार करेगा।

इस पृष्ठभूमि में, बुधवार को वकीलों ने विरोध प्रदर्शन किया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कुछ वकीलों ने जस्टिस भनोट के कोर्ट रूम के अंदर फर्नीचर भी फेंका।

इस विरोध-प्रदर्शन के हंगामे के कारण जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल के बगल वाले कोर्ट रूम की कार्यवाही भी बाधित हुई।

उन्होंने इस घटना पर कड़ा संज्ञान लेते हुए कहा:

"इस तरह की घटना अदालत की कार्यवाही में दखल देने के बराबर है। आम लोग अपनी समस्याओं के समाधान के लिए हाईकोर्ट आते हैं। सिर्फ इसलिए कि कुछ वकीलों को किसी खास अदालत से दिक्कत है, उन्हें नारे लगाने, चिल्लाने, दूसरी अदालतों की कार्यवाही में बाधा डालने या ऐसी भाषा का इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं दी जा सकती, जिससे अदालत को डराया-धमकाया जा सके। यह पूरी तरह से अनुचित है।"

इस व्यवहार को "अदालत की अवमानना" करार देते हुए कोर्ट ने रजिस्ट्रार (प्रोटोकॉल) को निर्देश दिया कि वे कोर्ट रूम नंबर 66 के बाहर लगे कैमरे से सीसीटीवी फुटेज हासिल करें, इसमें शामिल वकीलों की पहचान करें और अगली तारीख पर रिपोर्ट पेश करें।

इसके बाद जस्टिस भनोट और जस्टिस सामंत की बेंच ने आदेश पारित किया। इसमें कहा गया कि 28 अक्टूबर को वकीलों द्वारा सरकारी कानून अधिकारियों, कोर्ट स्टाफ और सुरक्षा कर्मियों के साथ मारपीट करना तथा कोर्ट रूम में तोड़फोड़ करना, प्रथम दृष्टया अदालत की आपराधिक अवमानना ​​(क्रिमिनल कंटेंप्ट) है।

कोर्ट ने चीफ जस्टिस से यह भी अनुरोध किया कि वे इस घटना में कथित तौर पर शामिल वकीलों और सोशल मीडिया पर इस घटना के बारे में झूठी पोस्ट फैलाने वाले लोगों के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश देने पर विचार करें।

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