जानबूझकर महत्वपूर्ण तथ्य छिपाना न्याय प्रशासन में दखल, वकील की जिम्मेदारी केवल मुवक्किल तक सीमित नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई वकील अपनी जानकारी में मौजूद महत्वपूर्ण तथ्यों को जानबूझकर छिपाकर अदालत के समक्ष उसके विपरीत स्थिति रखता है तो यह सक्रिय रूप से तथ्य छिपाना है और ऐसा आचरण न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करता है। हालांकि, वास्तविक स्थिति की जानकारी न होने के कारण गलत तथ्य सामने रखना या तथ्यों की गलत व्याख्या करना अलग स्थिति है।
जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने यह टिप्पणी एक कॉलेज की प्रबंध समिति के चुनाव से जुड़े मामले में दो वकीलों के आचरण की जांच करते हुए की। कोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाता है तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वह मामले से जुड़े सभी प्रासंगिक तथ्यों और दस्तावेजों का खुलासा करे।
अदालत ने कहा,
"सक्रिय रूप से तथ्य छिपाने और केवल अनजाने में गलत तथ्य रखने के बीच अंतर है। सक्रिय रूप से तथ्य छिपाने का अर्थ है अदालत को गुमराह करने के लिए सच्चाई को जानबूझकर छिपाना, जबकि जानकारी के अभाव में गलत जानकारी देना अलग स्थिति है।"
मामला नेहरू विद्यापीठ इंटरमीडिएट कॉलेज, रेवतीपुर, गाजीपुर की प्रबंध समिति के चुनाव से जुड़ा है। 5 मई 2026 को हाईकोर्ट ने एक रिट याचिका का निपटारा करते हुए जिला विद्यालय निरीक्षक को दो महीने के भीतर चुनाव कराने का निर्देश दिया। उस समय दोनों पक्षों के वकीलों ने अदालत को बताया कि 2009 में हुए चुनाव में इस्तेमाल मतदाता सूची निर्विवाद है। इसी आधार पर कोर्ट ने उसी सूची को चुनाव के लिए इस्तेमाल करने का निर्देश दिया।
इसके बाद याचिका में प्रतिवादी नंबर छह के रूप में शामिल शिव शंकर सिंह ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की। उन्होंने खुद को निर्वाचित प्रबंधक बताते हुए कहा कि मूल याचिका गलत उद्देश्य से दाखिल की गई। उन्होंने शपथपत्र देकर यह भी कहा कि उन्होंने किसी अधिवक्ता को अपनी ओर से पेश होने के लिए वकालतनामा नहीं दिया और न ही अपनी ओर से कैविएट दाखिल करने का निर्देश दिया।
कैविएट वकील आरसी द्विवेदी ने दाखिल की थी। उनका कहना था कि वकालतनामे पर मौजूद हस्ताक्षर की पुष्टि उन्होंने स्वयं नहीं, बल्कि उनके क्लर्क ने की थी। उनके अनुसार, आवेदक और उसका भतीजा भोला यादव उनके कार्यालय आए, हस्ताक्षर किया हुआ वकालतनामा सौंपा और 2,500 रुपये फीस दी। भोला यादव ने भी शपथपत्र के जरिए इस दावे का समर्थन किया, जबकि आवेदक ने ऐसा नहीं किया।
चूंकि आवेदक वर्ष 2015 से आरसी द्विवेदी को अपना अधिवक्ता नियुक्त करता रहा था इसलिए हाईकोर्ट ने विवादित हस्ताक्षरों को विशेषज्ञ जांच के लिए भेज दिया। 27 जुलाई 2026 की फोरेंसिक साइंस लैबोरेटरी की रिपोर्ट में पाया गया कि कैविएट के साथ दाखिल वकालतनामे पर मौजूद हस्ताक्षर न तो नमूना हस्ताक्षरों से मेल खाते हैं और न ही दो अन्य मामलों में मौजूद वकालतनामों या आवेदक के बैंक रिकॉर्ड में मौजूद हस्ताक्षरों से। रिपोर्ट पर कोई आपत्ति दाखिल नहीं की गई और वह अंतिम हो गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि आवेदक यह साबित करने में असफल रहा कि उसके हस्ताक्षर जाली थे। कोर्ट ने माना कि पुनर्विचार याचिका ऐसे आदेश को वापस लेने के लिए दाखिल की गई, जो आवेदक के अनुकूल नहीं था। इस प्रक्रिया में एक ऐसे वकील को भी कठघरे में खड़ा कर दिया गया, जो एक दशक से अधिक समय से उसका प्रतिनिधित्व कर रहा था।
2009 के चुनाव को निर्विवाद बताने के दावे की भी अदालत ने जांच की। रिकॉर्ड से सामने आया कि संयुक्त शिक्षा निदेशक ने 16 अप्रैल 2016 के आदेश में 2009 के चुनाव को संदिग्ध माना था और नए चुनाव कराने का निर्देश दिया था। उस आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका बाद में सहमति से निष्प्रभावी मानकर खारिज कर दी गई।
इसके अलावा, तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षक मालती राय, जिनके बारे में कहा गया कि उन्होंने 2009 में चुनाव कराया, ने 23 जुलाई 2016 को संयुक्त शिक्षा निदेशक को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि उन्होंने ऐसा कोई चुनाव नहीं कराया।
अदालत ने कहा कि लंबे समय से याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील एससी द्विवेदी इन दस्तावेजों और तथ्यों से अनजान होने का दावा नहीं कर सकते। कोर्ट ने वकील और उनके मुवक्किल को 25 अक्टूबर 2009 को हुए चुनाव को अंतिम निर्विवाद चुनाव बताने के लिए समान रूप से जिम्मेदार माना।
अदालत ने कहा,
"इस अदालत को यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि मिस्टर एससी द्विवेदी, वकील और उनके मुवक्किल की ओर से तथ्य को सक्रिय रूप से छिपाया गया, जिसके कारण न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप हुआ।"
हाईकोर्ट ने कानूनी पेशे में वकील की भूमिका पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि अधिवक्ताओं को केवल मुवक्किल का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि मुख्य रूप से अदालत का अधिकारी माना जाता है। उन पर पेशेवर जिम्मेदारी के साथ-साथ अदालत के प्रति भी बड़ी जिम्मेदारी होती है। इस जिम्मेदारी का उल्लंघन न्याय प्रशासन की बुनियाद को प्रभावित करता है और कानूनी व्यवस्था में जनता के भरोसे को नुकसान पहुंचा सकता है।
वहीं, आरसी द्विवेदी के आचरण को अदालत ने अलग माना। कोर्ट के अनुसार, उन्होंने केवल याचिकाकर्ता की ओर से रखे गए दावे को स्वीकार किया और 2009 के चुनाव को संदिग्ध बताने वाले दस्तावेज उनके सामने रिकॉर्ड पर पेश नहीं किए गए। इसलिए अदालत ने उनके आचरण को न तो सक्रिय रूप से तथ्य छिपाना माना और न ही जानबूझकर झूठ बोलना। कार्यालय में हुई प्रक्रियात्मक कमियों के लिए उनकी बिना शर्त माफी को कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
वकालतनामे के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत में किसी अधिवक्ता की पेशी की मान्यता पूरी तरह वैध और प्रभावी वकालतनामे के अस्तित्व पर आधारित होती है। जिस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करने का दावा किया जा रहा है उसकी जानकारी या सहमति के बिना वकालतनामा दाखिल करना अदालत के समक्ष गलत प्रस्तुति है।
हाईकोर्ट ने मामले को बार काउंसिल के पास भेजने या अवमानना अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने से इनकार किया। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता और प्रतिवादी नंबर छह पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। दोनों को यह राशि एक महीने के भीतर हाईकोर्ट विधिक सेवा समिति में जमा करनी होगी। राशि जमा नहीं करने पर रजिस्ट्रार जनरल को अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया गया।
अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट नियम, 1952 के अध्याय 22 नियम 5 का भी संज्ञान लिया, जिसके तहत केवल आवेदन देकर बिना सहायक शपथपत्र के कैविएट दाखिल की जा सकती है। कोर्ट ने माना कि इस प्रक्रिया का दुरुपयोग संभव है। इसलिए आदेश की प्रति प्रशासनिक स्तर पर चीफ जस्टिस के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया, ताकि कैविएट आवेदन के साथ आवेदक का शपथपत्र अनिवार्य करने के लिए नियम में संशोधन पर विचार किया जा सके।
अंततः हाईकोर्ट ने माना कि 2009 का चुनाव निर्विवाद नहीं था। इस आधार पर कोर्ट ने अपने 5 मई 2026 के आदेश की समीक्षा करते हुए उसे वापस ले लिया और मामले को आगे की सुनवाई के लिए सक्षम क्षेत्राधिकार वाली अदालत के समक्ष रखने का निर्देश दिया।