निजी विवाद को सेवा संबंधी कदाचार नहीं माना जा सकता, जब तक नौकरी से सीधा संबंध न हो: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी कर्मचारी के निजी विवाद से जुड़ी कार्रवाई को केवल इस आधार पर सेवा संबंधी कदाचार नहीं माना जा सकता कि घटना कार्यालय परिसर में हुई। इसके लिए कर्मचारी के आचरण और उसके रोजगार के बीच स्पष्ट और वास्तविक संबंध होना जरूरी है।
जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने भारतीय रिजर्व बैंक के एक कर्मचारी की बर्खास्तगी से जुड़े मामले में यह फैसला सुनाया।
अदालत ने कहा कि सेवा कानून में कदाचार की प्रकृति कर्मचारी पर लागू सेवा नियमों और उसके कथित आचरण के संदर्भ में देखी जानी चाहिए। कर्मचारी की प्रत्येक निजी कार्रवाई को कदाचार नहीं माना जा सकता, जब तक उसका रोजगार से संबंध न हो या उससे नियोक्ता के अनुशासन, कार्यप्रणाली अथवा प्रतिष्ठा पर प्रभाव न पड़ता हो।
मामला कानपुर में भारतीय रिजर्व बैंक में कक्षा-3 कर्मचारी के रूप में सहायक वर्ड प्रोसेसर के पद पर कार्यरत एक कर्मचारी से जुड़ा था। वह राजभाषा कक्ष में तैनात था। एक महिला उसके कार्यालय में पहुंची, जिसके साथ कर्मचारी द्वारा कथित तौर पर मारपीट की गई और उसे वहां से बाहर निकाल दिया गया। इसके बाद कर्मचारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति के बिना कार्यालय से चला गया।
महिला की पहचान मुन्नी राय उर्फ मीनू के रूप में हुई, जिसने स्वयं को कर्मचारी की पत्नी बताते हुए आगंतुक पास लिया था। इस घटना को लेकर कर्मचारी के खिलाफ आरोप-पत्र जारी किया गया। आरोप लगाया गया कि उसके आचरण से कार्यालय की गरिमा और भारतीय रिजर्व बैंक के अनुशासन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
इसके बाद महिला ने आरोप लगाया कि कर्मचारी ने उसके घर पर भी उसके साथ मारपीट की। कर्मचारी ने कारण बताओ नोटिस के जवाब में उसके नाम से एक नोटरीकृत हलफनामा प्रस्तुत किया, जिसमें शिकायतों को गलत बताया गया था और दोनों के बीच विवाद सुलझने की बात कही गई थी। महिला ने हलफनामा देने से इनकार किया।
इसके बाद कर्मचारी पर दूसरा आरोप लगाया गया कि उसने विभागीय कार्यवाही को गुमराह करने के लिए फर्जी हलफनामा पेश किया।
दोनों आरोपों की संयुक्त विभागीय जांच हुई और जांच अधिकारी ने आरोपों को सिद्ध माना। इसके बाद भारतीय रिजर्व बैंक ने संबंधित कर्मचारी को स्टाफ विनियम, 1948 के विनियम 47(1)(ई) के तहत बर्खास्त कर दिया। अपीलीय प्राधिकारी ने भी बर्खास्तगी बरकरार रखी।
कर्मचारी ने हाईकोर्ट की सिंगल बेंच का दरवाजा खटखटाया। सिंगल बेंच ने बर्खास्तगी और अपीलीय आदेश दोनों रद्द करते हुए कर्मचारी की बहाली तथा परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया। इसके खिलाफ भारतीय रिजर्व बैंक ने विशेष अपील दायर की।
खंडपीठ ने पाया कि मुन्नी राय न तो बैंक की कर्मचारी थी और न ही किसी आधिकारिक कार्य से बैंक आई थी। अदालत ने कहा कि दोनों प्राधिकारियों ने आरोपों को सिद्ध तो माना, लेकिन यह नहीं बताया कि कथित आचरण भारतीय रिजर्व बैंक स्टाफ विनियम, 1948 के विनियम 32, 34 या 47 के तहत कदाचार कैसे बनता है।
सुप्रीम कोर्ट के ग्लैक्सो लेबोरेटरीज बनाम पीठासीन अधिकारी मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि कदाचार और रोजगार के बीच संबंध वास्तविक, महत्वपूर्ण, प्रत्यक्ष और निकट होना चाहिए, न कि दूर का या कमजोर।
अदालत ने कहा,
"इस दृष्टि से कार्यालय परिसर में किसी महिला आगंतुक को थप्पड़ मारने और उसे बाहर जाने के लिए मजबूर करने की कथित घटना, जब वह व्यक्तिगत मुलाकात के लिए आई थी, विनियम 32, 34 या 47 के तहत कदाचार नहीं कही जा सकती।"
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विनियम 32 और 34 के तहत कदाचार तभी बन सकता है, जब कर्मचारी ने भारतीय रिजर्व बैंक या अपने वरिष्ठ अधिकारी के आदेश का उल्लंघन किया हो अथवा किसी बैंकिंग या आधिकारिक कार्य के संबंध में बेईमानी, अविश्वसनीयता, अशिष्टता या लापरवाही दिखाई हो।
हालांकि, अदालत ने माना कि कर्मचारी का बिना अनुमति कार्यालय छोड़ना विनियम 47 के तहत कदाचार हो सकता है। लेकिन अदालत ने कहा कि शाम करीब चार बजे किसी निजी आगंतुक के साथ हुए व्यक्तिगत विवाद के बाद बिना अनुमति कार्यालय से चले जाने की एक अकेली घटना अपने आप में बर्खास्तगी जैसे कठोर दंड का आधार नहीं बन सकती।
फर्जी हलफनामे के आरोप पर भी हाईकोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक की कार्रवाई पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि विभागीय जांच में साक्ष्य के कठोर नियम लागू नहीं होते, लेकिन आरोपों को विश्वसनीय सामग्री के आधार पर सिद्ध करना नियोक्ता की जिम्मेदारी है।
अदालत ने पाया कि कथित फर्जी हलफनामे का निष्कर्ष मुख्य रूप से महिला द्वारा उसके हस्ताक्षर से इनकार करने पर आधारित था। भारतीय रिजर्व बैंक ने न तो विवादित हस्ताक्षर की जांच कराने का प्रयास किया और न ही नोटरी को गवाही के लिए बुलाया।
अदालत ने कहा कि कर्मचारी द्वारा अपने बचाव में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जाने का हवाला देकर आरोप साबित करने का भार कर्मचारी पर नहीं डाला जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के सुरेखा डोमाजी बेले बनाम कार्यकारी इंजीनियर, टेस्टिंग डिवीजन, MSEDCL मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि बर्खास्तगी सेवा कानून में सबसे कठोर दंड है और इसे केवल गंभीर कदाचार के मामलों में ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा,
"हम किसी व्यक्ति को थप्पड़ मारने की घटना को मामूली नहीं मान सकते और न ही कार्यालय में अनुशासन के महत्व को कम कर सकते हैं। लेकिन अनुशासन प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत सामग्री से यह स्थापित नहीं हुआ कि कर्मचारी की कार्रवाई का भारतीय रिजर्व बैंक से कोई ऐसा संबंध था जिससे बैंक को आर्थिक नुकसान हुआ हो या उसकी सार्वजनिक प्रतिष्ठा प्रभावित हुई हो।"
अदालत ने मामले को दोबारा विभागीय जांच के लिए भेजने से भी इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के महेंद्र प्रसाद अग्रवाल बनाम अरविंद कुमार सिंह मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जब अदालत मामले के गुण-दोष पर संतुष्ट हो, तो राहत को अनिश्चितकाल के लिए टालने के बजाय स्पष्ट आदेश देना चाहिए।
अदालत ने कहा,
"अब मामले को वापस भेजना केवल उन पुराने घावों को फिर से खोल देगा, जो अब तक कम से कम कुछ हद तक भर चुके होंगे।"
इस आधार पर हाईकोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक की विशेष अपील खारिज की और सिंगल बेंच का फैसला बरकरार रखा।
चूंकि संबंधित कर्मचारी अब रिटायरमेंट की आयु पार कर चुका है, इसलिए अदालत ने बहाली का निर्देश नहीं दिया। हालांकि, सक्षम प्राधिकारी को बर्खास्तगी से रिटायरमेंट तक की अवधि के बकाया वेतन के उसके दावे पर तीन महीने के भीतर निर्णय लेने तथा परिणामी सेवानिवृत्ति लाभों पर भी विचार करने का निर्देश दिया गया।