इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि शहरी भूमि (सीमा एवं विनियमन) अधिनियम, 1976 की धारा 33 के तहत अपील शहरी भूमि (सीमा एवं विनियमन) निरसन अधिनियम, 1999 लागू होने के बाद न तो दाखिल की जा सकती है और न ही जारी रखी जा सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सामान्य खंड अधिनियम, 1897 की धारा 6 के तहत अपील का अधिकार सुरक्षित नहीं रहता।

जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने कहा कि निरसन अधिनियम की धारा 4 में विधायिका की ऐसी स्पष्ट मंशा दिखाई देती है, जो सामान्य खंड अधिनियम की धारा 6 के विपरीत है। विधायिका का उद्देश्य 1976 के अधिनियम के तहत अदालतों, अधिकरणों और अन्य प्राधिकरणों के समक्ष लंबित सभी कार्यवाहियों को समाप्त करना था।

कानपुर विकास प्राधिकरण ने तीन रिट याचिकाएं दाखिल की थीं, जिनका हाईकोर्ट ने एक साझा फैसले में निपटारा किया। तीनों मामलों में 1976 के अधिनियम के तहत कार्यवाही कई वर्ष पहले पूरी हो चुकी थी।

सक्षम प्राधिकरण ने अधिनियम की धारा 8(4) के तहत आदेश पारित कर तीन मामलों में क्रमशः 6,632.61 वर्ग मीटर, 16,676.46 वर्ग मीटर और 9,242.50 वर्ग मीटर भूमि को अतिरिक्त खाली भूमि घोषित किया। इसके बाद धारा 9 के तहत अंतिम विवरण, धारा 10(1) और 10(3) के तहत अधिसूचनाएं तथा धारा 10(5) के तहत नोटिस जारी किए गए।

दो मामलों में 1991 में और तीसरे मामले में 1986 में भूमि का कब्जा ले लिया गया। इसके बाद भूमि कानपुर विकास प्राधिकरण को सौंप दी गई और राजस्व अभिलेखों में प्राधिकरण के नाम दर्ज कर दी गई। मूल भूमि धारकों ने इन कार्यवाहियों को कभी चुनौती नहीं दी।

उत्तर प्रदेश में निरसन अधिनियम 18 मार्च 1999 को लागू हुआ। इसके बाद मूल भूमि धारकों के उत्तराधिकारियों ने 2009, 2011 और 2013 में जिला जज, कानपुर के समक्ष धारा 33 के तहत अपीलें दाखिल कीं। ये अपीलें 1983, 1982 और 1979 में पारित धारा 8(4) के आदेशों के खिलाफ थीं।

जिला जज ने 24 दिसंबर 2024 के फैसलों में अपीलों का निपटारा करते हुए कहा कि रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि भूमि वास्तव में भूमि धारकों से राज्य को हस्तांतरित हुई थी। साथ ही अपीलों को समाप्त होने योग्य माना।

विकास प्राधिकरण की ओर से कहा गया कि 1976 का अधिनियम निरस्त होने के बाद धारा 4 के तहत सभी लंबित कार्यवाहियां, जिनमें धारा 33 की अपीलें भी शामिल हैं, समाप्त हो गईं। निरसन से कई वर्ष पहले पूरी हो चुकी कार्यवाही को ऐसे कानून के तहत दोबारा नहीं खोला जा सकता, जो अब अस्तित्व में ही नहीं है। इसलिए जिला जज के फैसले अधिकार क्षेत्र से बाहर थे। इस संबंध में उत्तर प्रदेश राज्य बनाम जगदीश चंद्र मामले के फैसले पर भरोसा किया गया।

दूसरी ओर, निजी प्रतिवादियों ने सामान्य खंड अधिनियम की धारा 6(e) का हवाला देते हुए कहा कि अपील का अधिकार एक मूल अधिकार है, जिसे स्पष्ट प्रावधान या विधायी मंशा के बिना समाप्त नहीं किया जा सकता।

उनका तर्क था कि भूमि का कब्जा पहले ही लिया जा चुका था, इसलिए विवाद पर 1976 का अधिनियम लागू रहना चाहिए। चूंकि अधिनियम के तहत विवादों पर दीवानी अदालत का अधिकार क्षेत्र नहीं है, इसलिए धारा 33 की अपील ही एकमात्र उपाय बचा था। उन्होंने उत्तर प्रदेश राज्य बनाम नेक सिंह मामले का हवाला देते हुए कहा कि जगदीश चंद्र का फैसला सही कानून नहीं बताता।

हाईकोर्ट ने कहा कि निरसन अधिनियम भूमि को दो श्रेणियों में बांटता है। पहली श्रेणी में धारा 10(3) के तहत राज्य में निहित वह भूमि है, जिसका कब्जा पहले ही लिया जा चुका है और जिसकी कार्यवाही पूरी हो चुकी है। दूसरी श्रेणी में वह भूमि आती है, जिसका कब्जा नहीं लिया गया था। ऐसी भूमि को भुगतान की गई राशि वापस करने पर संबंधित व्यक्ति को लौटाया जाना है।

कोर्ट ने कहा कि धारा 11 से 14 के तहत पहले से कब्जे में ली गई भूमि से संबंधित कार्यवाहियों को छोड़कर किसी अदालत, अधिकरण या प्राधिकरण के समक्ष कोई अन्य लंबित कार्यवाही निरसन के बाद जारी नहीं रह सकती।

खंडपीठ ने सामान्य खंड अधिनियम की धारा 6 पर विचार करते हुए कहा कि यह प्रावधान तभी लागू होता है, जब निरसन करने वाले कानून में कोई अलग मंशा दिखाई न दे।

निरसन अधिनियम के उद्देश्यों और कारणों के विवरण का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि 1976 का अधिनियम अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में विफल रहा था। इस विषय पर जनमत लगभग सर्वसम्मत था और संसदीय स्थायी समिति ने कार्यवाहियों को समाप्त करने का प्रावधान शामिल करने का सुझाव दिया था। इससे स्पष्ट है कि विधायिका की मंशा सामान्य खंड अधिनियम की धारा 6 से अलग थी।

गरिका पति वीरैया बनाम एन. सब्बैया चौधरी और ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन ऑफ आंध्र प्रदेश बनाम सी.एच. प्रभाकर मामलों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने माना कि अपील का निहित अधिकार बाद के कानून से तभी समाप्त किया जा सकता है, जब ऐसा स्पष्ट रूप से या आवश्यक विधायी मंशा से प्रावधानित हो। पीठ के अनुसार, निरसन अधिनियम की धारा 4 ऐसा ही प्रावधान है।

कोर्ट ने कहा कि धारा 33 के तहत अपील का निहित अधिकार निरसन अधिनियम की धारा 4 के तहत समाप्त हो गया और ऐसी सभी अपीलें समाप्त होनी चाहिए। 18 मार्च 1999 से निरसन अधिनियम लागू होने के बाद 1976 का अधिनियम पूरी तरह समाप्त हो गया। इसलिए उसके बाद अपील दाखिल करने का सवाल ही नहीं उठता।

भूमि धारकों की इस दलील को हाईकोर्ट ने खारिज किया कि निरसन के बाद उनके पास कोई उपाय नहीं बचता। कोर्ट ने कहा कि निरसन अधिनियम उन भूमि धारकों के कब्जे की रक्षा करता है, जिनकी भूमि का कब्जा राज्य ने नहीं लिया था। ऐसे लोग सामान्य कानून के तहत उपलब्ध उपायों के जरिए अपने कब्जे की रक्षा कर सकते हैं।

उत्तर प्रदेश राज्य बनाम एहसान मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि रिट कोर्ट भूमि धारक को दीवानी मुकदमा दाखिल करने के लिए कह सकती है। वहीं उत्तर प्रदेश राज्य बनाम बलबीर सिंह मामले में हाईकोर्ट ने पहले ही स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका मूल कार्यवाही की निरंतरता नहीं है, इसलिए धारा 4 के तहत समाप्त नहीं होती।

खंडपीठ ने कहा कि नेक सिंह मामले में हाईकोर्ट के पहले के दृष्टिकोण और सुप्रीम कोर्ट के संबंधित फैसलों पर विचार नहीं किया गया था। इसके विपरीत, जगदीश चंद्र मामले में सही कानून निर्धारित किया गया।

हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलें एक स्वतंत्र आधार पर भी टिकाऊ नहीं थीं। भूमि का कब्जा लिए जाने के लगभग 18, 20 और 27 वर्ष बाद अपीलें दाखिल की गई थीं, जबकि धारा 33 के तहत अपील दाखिल करने की समयसीमा केवल 30 दिन थी।

खंडपीठ ने यह भी ध्यान दिया कि अपीलें मूल कार्यवाही की व्यक्तिगत जानकारी नहीं रखने वाले उत्तराधिकारियों द्वारा दाखिल की गई थीं।

कोर्ट ने कहा कि भूमि धारकों ने इतने लंबे समय तक चुप रहकर विवादित भूमि पर अपने अधिकारों का अप्रत्यक्ष रूप से त्याग कर दिया था। अधिनियम के तहत हुई कार्यवाही को स्वीकार करने के कारण उनकी अपीलें सुनवाई योग्य नहीं थीं।

हाईकोर्ट ने जिला जज द्वारा मामले पर विचार करने के तरीके पर भी नाराजगी जताई।

खंडपीठ ने कहा कि जगदीश चंद्र का फैसला जिला जज के सामने रखा गया और उनके फैसले में उसका उल्लेख भी किया गया, लेकिन यह बताने का कोई कारण नहीं दिया गया कि वह इस मामले में लागू क्यों नहीं होता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि निजी प्रतिवादियों ने अपनी अपीलों में स्वयं स्वीकार किया कि 1976 का अधिनियम भूमि पर लागू नहीं होता। ऐसे में धारा 33 के तहत अपील दाखिल ही नहीं की जा सकती थी।

खंडपीठ ने जिला जज के फैसलों को विरोधाभासी बताया। कोर्ट के अनुसार, यदि धारा 4 लागू थी, तो अपीलें दाखिल किए जाने के समय ही सुनवाई योग्य नहीं थीं। वहीं, यदि प्रतिवादियों की दलील के अनुसार अपीलें सुनवाई योग्य थीं, तो उन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए था, न कि समाप्त किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने जिला जज के फैसलों को निरसन अधिनियम के विपरीत और आत्म-विरोधाभासी माना। इसके बाद रिट याचिकाएं स्वीकार करते हुए जिला जज, कानपुर के 24 दिसंबर 2024 के फैसलों और आदेशों को रद्द किया।

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