इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बिना स्वीकृत पद और निर्धारित योग्यता के प्रबंधन समिति द्वारा नियुक्त शिक्षक राज्य से वेतन पाने का दावा नहीं कर सकता। ऐसे शिक्षक को अपने वेतन की मांग उसी प्रबंधन समिति से करनी होगी, जिसने उसकी नियुक्ति की थी।

जस्टिस पंकज भाटिया की पीठ ने यह फैसला उस याचिका पर सुनाया, जिसमें याचिकाकर्ता ने वेतन भुगतान और नियमितीकरण की मांग की थी।

अदालत ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि संबंधित शिक्षक की नियुक्ति शुरुआत से ही वैधानिक आवश्यकताओं के विपरीत थी। हालांकि उसे प्रबंधन समिति से वेतन का दावा करने की स्वतंत्रता दी गई।

याचिकाकर्ता की नियुक्ति प्रबंधन समिति ने 23 नवंबर 1999 को की थी। उस समय उसके पास शिक्षा अलंकार की डिग्री थी। नियुक्ति के बाद वेतन नहीं मिलने पर उसने वर्ष 2000 में हाईकोर्ट का रुख किया।

अदालत ने अंतरिम आदेश पारित किया, जिसके खिलाफ राज्य की विशेष अपील भी दाखिल हुई लेकिन वर्ष 2009 में वह खारिज हो गई।

30 जून 2010 को सहायक शिक्षक का एक पद रिक्त हुआ। इसके बाद प्रबंधन समिति ने हिंदी विषय के शिक्षक के लिए मांग भेजी, लेकिन कोई नियुक्ति नहीं हुई। बाद में एक आदेश के जरिए याचिकाकर्ता को जुलाई 2010 से नियमित हिंदी शिक्षक के कार्यभार संभालने तक वेतन देने का निर्देश दिया गया।

याचिकाकर्ता के अनुसार उसे 14 अगस्त 2013 तक वेतन मिला, जिसके बाद भुगतान रोक दिया गया।

वेतन और नियमितीकरण की उसकी मांग को 22 अक्टूबर 2020 को खारिज कर दिया गया। इसके पीछे दो प्रमुख कारण बताए गए। पहला, संबंधित पद सरकार की ओर से स्वीकृत नहीं था और दूसरा, याचिकाकर्ता के पास निर्धारित योग्यता नहीं थी। अधिकारियों ने कहा कि कानपुर स्थित राष्ट्रीय पत्राचार संस्थान की ओर से जारी 'शिक्षा अलंकार' प्रमाणपत्र निर्धारित डिग्री नहीं था और न ही उसे उसके समकक्ष माना जा सकता था।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि राज्य सरकार ने 6 सितंबर 2000 के एक पत्र में 'शिक्षा अलंकार' को बीएड के समकक्ष माना था। समाज कल्याण विभाग के 25 जून 2002 के पत्र का भी हवाला दिया गया। उसने यह भी कहा कि उसके पास गणित में बीएससी की डिग्री के साथ 'शिक्षा अलंकार' की योग्यता थी और वह वर्ष 1999 से सेवा कर रहा था। उसके अनुसार इतने लंबे अनुभव और पहले किए गए वेतन भुगतान के आधार पर उसे वेतन तथा नियमितीकरण का लाभ मिलना चाहिए।

राज्य सरकार की ओर से इसका विरोध करते हुए कहा गया कि याचिकाकर्ता के पास कभी भी निर्धारित योग्यता नहीं थी और संबंधित पद भी कभी स्वीकृत नहीं हुआ।

राज्य ने गुलाम रसूल वारसी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि 'शिक्षा अलंकार' मान्य योग्यता नहीं है और इसे बीएड के समकक्ष भी नहीं माना गया।

अदालत ने उत्तर प्रदेश हाईस्कूल एवं इंटरमीडिएट कॉलेजों में शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों के वेतन भुगतान अधिनियम, 1971 की धारा 9 का भी उल्लेख किया। इस प्रावधान के तहत किसी शिक्षण संस्थान को निदेशक या उनके द्वारा अधिकृत अधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना शिक्षक या अन्य कर्मचारी का नया पद सृजित करने की अनुमति नहीं है।

पीठ ने इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम 1921 की अनुसूची-ए में निर्धारित गणित शिक्षक की योग्यता का भी उल्लेख किया। इसके तहत संबंधित कक्षाओं के लिए गणित में निर्धारित शैक्षणिक योग्यता के साथ शिक्षक का प्रशिक्षित होना भी जरूरी है।

जस्टिस पंकज भाटिया ने कहा,

“इंटरमीडिएट कक्षाओं में पढ़ाने के लिए नियुक्त किए जाने वाले व्यक्ति के पास निर्धारित योग्यता होना जरूरी है। किसी संस्थान में शिक्षण के लिए पद का सृजन भी निदेशक या उनके द्वारा अधिकृत अधिकारी की मंजूरी से होना आवश्यक है।”

अदालत ने 'शिक्षा अलंकार' को बीएड के समकक्ष मानने की याचिकाकर्ता की दलील भी खारिज की। पीठ ने कहा कि जिन दोनों पत्रों पर याचिकाकर्ता ने भरोसा किया, उनमें कहीं भी 'शिक्षा अलंकार' को बीएड के समकक्ष नहीं माना गया।

अदालत ने स्पष्ट कहा,

“इसमें कोई संदेह नहीं है कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति पद की मंजूरी के बिना और आवश्यक योग्यता के अभाव में की गई।”

पीठ ने लंबे अनुभव के आधार पर नियमितीकरण और वेतन का अधिकार देने की दलील भी स्वीकार नहीं की।

अदालत ने हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ के फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट के शेष मणि शुक्ला बनाम जिला विद्यालय निरीक्षक, देवरिया मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया।

इन फैसलों के अनुसार वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करके की गई नियुक्ति शुरू से ही शून्य होती है और लंबे समय तक सेवा करने मात्र से वैधानिक मंजूरी की कमी पूरी नहीं हो सकती।

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति वैधानिक आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं थी, इसलिए उसके नियमितीकरण के दावे में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।

हालांकि, अदालत ने कहा कि वह अपने वेतन का दावा उस प्रबंधन समिति से कर सकता है जिसने उसकी नियुक्ति की थी।

याचिकाकर्ता ने एक अन्य याचिका भी दाखिल की थी, जिसमें नियमितीकरण के दावे पर फैसला होने तक सहायक शिक्षक, एलटी ग्रेड गणित के पद को भरने या उसके लिए किसी अन्य व्यक्ति की मांग भेजने से रोकने की मांग की गई। अदालत ने यह याचिका भी खारिज की।

पीठ ने कहा,

“जब याचिकाकर्ता को पहले दिन से ही नियुक्ति के लिए अयोग्य पाया गया तो उसके द्वारा मांगी गई ऐसी राहत प्रदान नहीं की जा सकती।”

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