निलंबन के दौरान गुजारा भत्ता नहीं मिलने से विभागीय जांच अपने आप रद्द नहीं होगी, कर्मचारी को नुकसान साबित करना होगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि निलंबित कर्मचारी को गुजारा भत्ता नहीं दिए जाने मात्र से उसके खिलाफ की गई विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही अपने आप अवैध नहीं हो जाती। कर्मचारी को यह साबित करना होगा कि गुजारा भत्ता नहीं मिलने के कारण उसे अपना बचाव करने में वास्तविक नुकसान हुआ है।
जस्टिस गरिमा प्रसाद ने कहा कि निलंबन के दौरान गुजारा भत्ता कर्मचारी के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा है। यदि इसका भुगतान नहीं होने के कारण कर्मचारी जांच में शामिल नहीं हो पाता या प्रभावी ढंग से अपना पक्ष नहीं रख पाता, तो इससे कार्यवाही प्रभावित हो सकती है। हालांकि, कर्मचारी को गुजारा भत्ता नहीं मिलने और अपने बचाव में हुए कथित नुकसान के बीच संबंध स्थापित करना होगा।
मामले में याचिकाकर्ता सुल्तानपुर जिले के जामो विकासखंड की सहकारी समितियों में केंद्रीकृत सेवा के सचिव के पद पर तैनात था। उसे वर्ष 1999 में निलंबित किया गया और 5 सितंबर 2001 को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। उत्तर प्रदेश प्राथमिक कृषि सहकारी ऋण समितियां केंद्रीकृत सेवा विनियमावली, 1978 के विनियम 60 के तहत वैधानिक अपील करने के बाद उसे नए सिरे से जांच कराने के लिए मामला वापस भेजे जाने की राहत मिली।
इसके बाद जिला प्रशासनिक समिति ने दोबारा जांच करते हुए पाया कि कर्मचारी ने 48,652.52 रुपये का गबन किया था, 3,768 रुपये की वित्तीय अनियमितताएं की थीं और अपना कार्यभार भी नहीं सौंपा था। इन निष्कर्षों के आधार पर उसे 21 फरवरी 2006 को फिर से बर्खास्त कर दिया गया। उसकी अपील 15 सितंबर 2006 को खारिज कर दी गई।
हाईकोर्ट में कर्मचारी ने दलील दी कि नए सिरे से की गई जांच कानून की नजर में वैध जांच नहीं थी। उसका कहना था कि जिन दस्तावेजों पर भरोसा किया गया, वे उसे उपलब्ध नहीं कराए गए जांच के लिए कोई प्रभावी तारीख तय नहीं की गई, उसकी मौजूदगी में किसी गवाह का परीक्षण नहीं हुआ और उसे गवाहों से जिरह करने का अवसर भी नहीं दिया गया।
उसने यह भी तर्क दिया कि आरोप अस्पष्ट थे, निलंबन की अवधि में उसे गुजारा भत्ता नहीं दिया गया और मामले को नए सिरे से जांच के लिए भेजे जाने के बावजूद समिति ने स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने के बजाय पुराने बर्खास्तगी आदेश को ही मंजूरी दी।
इसके जवाब में राज्य की ओर से कहा गया कि कर्मचारी को दोनों आरोपपत्र दिए गए और उसने उनके जवाब में विस्तृत प्रतिवेदन भी दाखिल किए थे। उसे जांच की निर्धारित तारीखों की जानकारी दी गई और मूल अभिलेखों का निरीक्षण करने का अवसर भी दिया गया। गुजारा भत्ते के भुगतान के संबंध में राज्य ने दलील दी कि कर्मचारी ने निर्धारित घोषणा-पत्र नहीं दिया, जिसमें यह बताना जरूरी था कि वह किसी अन्य रोजगार या कारोबार में संलग्न नहीं है।
हाईकोर्ट ने स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम एन. गंगाराज, रीजनल मैनेजर, यूको बैंक बनाम कृष्ण कुमार भारद्वाज और एस. जानकी अय्यर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि प्रक्रिया से जुड़ी हर आपत्ति के आधार पर विभागीय जांच को स्वतः रद्द नहीं किया जा सकता। कर्मचारी को यह दिखाना होगा कि कथित प्रक्रियागत कमी से उसका बचाव वास्तव में प्रभावित हुआ।
अदालत ने पाया कि कर्मचारी के खिलाफ लगाए गए आरोप अस्पष्ट नहीं थे। दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराने की शिकायत भी सामान्य रूप से की गई और कर्मचारी ने किसी खास दस्तावेज की पहचान नहीं की थी, जिसे उपलब्ध नहीं कराने से उसके बचाव पर असर पड़ा हो।
गुजारा भत्ता नहीं मिलने के मुद्दे पर अदालत ने कहा कि कर्मचारी ने यह दावा नहीं किया कि आर्थिक अभाव के कारण वह जांच की किसी तारीख पर उपस्थित नहीं हो सका, कोई दस्तावेज पेश नहीं कर पाया या किसी गवाह का परीक्षण नहीं करा सका। इसके विपरीत, उसने विस्तृत जवाब दाखिल किए, कारण बताओ नोटिस का उत्तर दिया, वैधानिक अपील की और हाईकोर्ट में भी कार्यवाही की।
इन परिस्थितियों में अदालत ने माना कि कर्मचारी अपने बचाव को हुए किसी वास्तविक नुकसान को साबित करने में विफल रहा।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अनुशासनात्मक जांच में दर्ज निष्कर्षों को चुनौती देने के लिए साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन करना उचित नहीं होगा। अदालत ने पाया कि कर्मचारी को सौंपी गई धनराशि के गबन को देखते हुए बर्खास्तगी की सजा इतनी असंगत भी नहीं थी कि उसमें न्यायिक हस्तक्षेप किया जाए।
इन आधारों पर हाईकोर्ट ने कर्मचारी की रिट याचिका खारिज की।