इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि संयुक्त डिक्रीधारकों में से किसी एक की मृत्यु निष्पादन की अर्जी दाखिल होने से पहले हो गई हो, लेकिन जीवित संयुक्त डिक्रीधारक पूरी डिक्री के निष्पादन का कानूनी अधिकार रखता हो, तो केवल मृत व्यक्ति का नाम अर्जी में बने रहने से पूरी निष्पादन कार्यवाही शून्य नहीं हो जाती। ऐसी स्थिति में मृत डिक्रीधारक का नाम हटाना या पक्षकारों के विवरण को दुरुस्त करना प्रक्रियात्मक सुधार माना जा सकता है।

जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने स्पष्ट किया कि इस सवाल का फैसला केवल यह देखकर नहीं किया जा सकता कि निष्पादन अर्जी दाखिल किए जाने की तारीख को मृत डिक्रीधारक जीवित था या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या उसका नाम जीवित संयुक्त डिक्रीधारक के साथ दर्ज होने मात्र से पूरी कार्यवाही अमान्य हो जाएगी, जबकि जीवित डिक्रीधारक को अपने स्तर पर पूरी डिक्री के निष्पादन का अधिकार प्राप्त है।

विवाद की शुरुआत वर्ष 2003 में दाखिल एससीसी वाद संख्या 19/2003 से हुई थी। विनोद कुमार और अनिल कुमार ने जयपाल सहित चार लोगों के खिलाफ बेदखली का मुकदमा दायर किया।

अदालत ने 5 जुलाई 2014 को उनके पक्ष में डिक्री पारित की। इस डिक्री को चुनौती देने वाली पुनरीक्षण याचिकाओं के लंबित रहने के दौरान विनोद कुमार की मृत्यु हो गई। इसके बाद उनकी पत्नी और बेटे को मामले में पक्षकार बनाया गया। अंततः 9 मई 2023 को पुनरीक्षण याचिकाएं खारिज की गईं।

इसके बाद 20 अक्टूबर 2023 को निष्पादन वाद संख्या 01/2023 दाखिल किया गया। हालांकि, निष्पादन अर्जी में दोनों मूल डिक्रीधारकों के नाम बने रहे, जबकि विनोद कुमार की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी। निर्णय-ऋणियों ने इसी आधार पर निष्पादन कार्यवाही की वैधता पर आपत्ति जताई। उन्होंने यह दावा भी किया कि संबंधित संपत्ति में हित संजय कुमार वर्मा को हस्तांतरित कर दिया गया।

निष्पादन अदालत ने 4 जनवरी 2025 को निर्देश दिया कि संपत्ति का हस्तांतरण प्राप्त करने वाले व्यक्ति को पक्षकार बनाया जाए। इसके बाद पक्षकारों के विवरण में सुधार के लिए दाखिल संशोधन अर्जी 26 मई 2025 को स्वीकार कर ली गई। इस आदेश के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका 22 अगस्त 2026 को खारिज की गई। इसके बाद याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट का रुख किया।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि किसी मृत व्यक्ति के नाम पर शुरू की गई कार्यवाही कानूनी रूप से शून्य होती है और बाद में संशोधन करके ऐसी खामी दूर नहीं की जा सकती। यह भी कहा गया कि संपत्ति में हित हस्तांतरित होने के बाद मूल डिक्रीधारकों के पास निष्पादन का कोई लागू करने योग्य अधिकार नहीं बचा था। इसके अलावा, संशोधन आदेश को 4 जनवरी 2025 के निर्देश से आगे बढ़कर किया गया कदम बताया गया, क्योंकि उस समय हस्तांतरण प्राप्त करने वाले व्यक्ति को पक्षकार नहीं बनाया गया।

हाईकोर्ट ने दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 21 नियम 15 का उल्लेख किया। इस प्रावधान के तहत संयुक्त रूप से डिक्री प्राप्त करने वाले एक या अधिक व्यक्ति पूरी डिक्री के निष्पादन के लिए आवेदन कर सकते हैं। यदि संयुक्त डिक्रीधारकों में से किसी की मृत्यु हो जाती है, तो जीवित डिक्रीधारक और मृत व्यक्ति के कानूनी प्रतिनिधियों के लाभ के लिए भी निष्पादन की मांग की जा सकती है।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले जगदीश दत्त बनाम धरम पाल का हवाला देते हुए कहा कि संयुक्त डिक्रीधारक को पूरी डिक्री के निष्पादन का अधिकार हो सकता है। इसलिए किसी डिक्रीधारक की मृत्यु से दूसरे जीवित डिक्रीधारक का निष्पादन का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता।

अदालत के अनुसार, इस मामले में मृत डिक्रीधारक का नाम अर्जी में बने रहना अधिक से अधिक पक्षकारों के विवरण में हुई गलती थी, जिसे सुधारा जा सकता था।

संपत्ति के कथित हस्तांतरण के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा कि डिक्रीधारक से अधिकार प्राप्त करने वाले व्यक्ति द्वारा निष्पादन की मांग किस तरह की जा सकती है, यह दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 21 नियम 16 और धारा 146 के तहत तय होगा।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले वैष्णो देवी कंस्ट्रक्शन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया कि किसी अधिकार के हस्तांतरण की वैधता का फैसला निष्पादन अदालत को करना है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कथित हस्तांतरण की प्रकृति और उसके कानूनी प्रभाव का निर्धारण निष्पादन कार्यवाही के दौरान ही किया जाना चाहिए। केवल हस्तांतरण का दावा कर देने से पहले से सक्षम निष्पादन कार्यवाही पिछली तारीख से अमान्य नहीं हो जाती।

हाईकोर्ट ने माना कि पक्षकारों के विवरण में किया गया संशोधन प्रक्रियात्मक प्रकृति का था और इसे नई निष्पादन कार्यवाही शुरू करने के समान नहीं माना जा सकता।

इसी आधार पर अदालत ने याचिका खारिज कर दी और निर्देश दिया कि निष्पादन की कार्यवाही कानून के अनुसार आगे बढ़ाई जाए।

हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने संपत्ति के कथित हस्तांतरण की वैधता, प्रकृति या कानूनी प्रभाव पर कोई अंतिम राय नहीं दी है। निष्पादन अदालत इन मुद्दों पर उपलब्ध सामग्री और लागू कानून के आधार पर स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकती है।

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