यूपी क्रिकेट एसोसिएशन पर प्रतिबंध और CBI जांच से इलाहाबाद हाईकोर्ट का इनकार, कहा- यह निजी संपत्ति विवाद

Update: 2026-08-05 08:46 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन (UPCA) पर प्रतिबंध लगाने और उसकी संपत्तियों के हस्तांतरण की CBI जांच कराने की मांग वाली याचिका खारिज की।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (BCCI) को UPCA की संपत्तियां अपने नियंत्रण में लेने का निर्देश नहीं दिया जा सकता, क्योंकि UPCA कंपनी अधिनियम 1956 की धारा 25 के तहत पंजीकृत एक कंपनी है और उसका स्वतंत्र कानूनी अस्तित्व है।

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने कहा कि किसी पंजीकृत सोसायटी की संपत्तियों का विधि के अनुसार कंपनी को हस्तांतरित करने पर कोई रोक नहीं है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता की मांग पूरी तरह निराधार है।

अदालत ने कहा,

"UPCA पर प्रतिबंध लगाने या CBI जांच कराने की मांग पूरी तरह आधारहीन है। यह मूल रूप से भंग हो चुकी एक सोसायटी की संपत्ति के उत्तराधिकार से जुड़ा निजी विवाद है, जिसके लिए उचित वैधानिक मंच उपलब्ध थे लेकिन इसके बावजूद यह रिट याचिका दाखिल की गई।"

1955 में बनी सोसायटी, 2005 में बनी कंपनी

अदालत के समक्ष रिकॉर्ड के अनुसार उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन वर्ष 1955 में सोसायटी पंजीकरण अधिनियम 1860 के तहत एक सोसायटी के रूप में पंजीकृत हुई थी। बाद में वर्ष 2005 में इसी नाम से कंपनी अधिनियम 1956 की धारा 25 के तहत गैर-लाभकारी कंपनी का गठन किया गया। कंपनी का प्रमुख उद्देश्य सोसायटी की संपत्तियां, देनदारियां और कार्यभार अपने अधीन लेना था।

3 सितंबर 2005 को सोसायटी के तीन-पांचवें से अधिक सदस्यों ने सोसायटी को भंग कर उसकी संपत्तियां, दायित्व और कार्य कंपनी को हस्तांतरित करने का प्रस्ताव पारित किया। उसी दिन कंपनी के निदेशक मंडल ने भी संबंधित प्रस्ताव पारित किया और इसकी सूचना संबंधित पंजीयक को दे दी गई।

करीब 21 वर्ष बाद क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तर प्रदेश नामक एक अन्य संस्था ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर मांग की कि भंग हो चुकी सोसायटी की संपत्तियां, बैंक अकाउंट और संसाधन उसके पक्ष में हस्तांतरित किए जाएं। साथ ही BCCI को निर्देश देने UPCA पर प्रतिबंध लगाने, सीबीआई जांच कराने तथा BCCI द्वारा दी गई मान्यता और वित्तीय सहायता की जांच कराने की भी मांग की गई।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि सोसायटी का विधिवत विघटन नहीं हुआ था और उसकी संपत्तियां सरकार के पास जानी चाहिए थीं।

हाईकोर्ट ने सोसायटी पंजीकरण अधिनियम 1860 की धारा 13 का हवाला देते हुए कहा कि जब सोसायटी के तीन-पांचवें से अधिक सदस्य विघटन का प्रस्ताव पारित कर देते हैं तो सोसायटी तत्काल प्रभाव से भंग हो जाती है। यदि संपत्ति के बंटवारे को लेकर सदस्यों के बीच विवाद हो तभी मामला सिविल अदालत के समक्ष भेजा जाता है।

अदालत ने कहा कि इस मामले में ऐसा कोई विवाद नहीं था और न ही वर्ष 2005 में पारित प्रस्तावों को कभी चुनौती दी गई।

बता दें, पहले भी इलाहाबाद हाईकोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट में कंपनी के पंजीकरण को चुनौती दी गई, जिसे खारिज कर दिया गया था।

खंडपीठ ने कहा कि कंपनी ने सोसायटी की संपत्तियां, दायित्व और कार्यभार कानून के दायरे में रहते हुए प्राप्त किए और इसमें सोसायटी पंजीकरण अधिनियम 1860 का कोई प्रावधान बाधा नहीं बनता।

अदालत ने यह भी कहा कि कंपनी का पंजीकरण सक्षम प्राधिकारी द्वारा विधिसम्मत तरीके से किया गया और पंजीकरण प्रमाणपत्र जारी होने के बाद कंपनी का स्वतंत्र कानूनी अस्तित्व स्थापित हो गया।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी को कंपनी के प्रबंधन या उसके कार्यों को लेकर शिकायत है तो उसके लिए राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) में कंपनी अधिनियम, 2013 की धाराओं 241 और 245 के तहत उचित उपाय उपलब्ध हैं।

अंत में अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता यदि अपने सदस्यों के हितों या राज्य में क्रिकेट के विकास से जुड़ी किसी शिकायत को लेकर राज्य सरकार के समक्ष जाना चाहता है तो वह ऐसा कर सकता है लेकिन सोसायटी के विघटन या कंपनी को BCCI से मिली मान्यता को चुनौती देने का आधार इस याचिका में नहीं बनता।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की।

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