इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को फर्रुखाबाद के पुलिस अधीक्षक (SP) को जांच अधिकारी (IO) के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने पाया कि आरोपी की गिरफ्तारी के कारणों वाले कॉलम में कुछ अतिरिक्त जानकारी बाद में जोड़ी गई थी।

कोर्ट ने आरोपी-याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी को गैर-कानूनी करार देते हुए उसे तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के कारणों और आधारों के बारे में आरोपी को कानून के अनुसार सूचित नहीं किया गया।

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने कहा कि जांच अधिकारी ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) के अध्याय XIV के तहत अपराध किया, जो "झूठे सबूत और सार्वजनिक न्याय के खिलाफ अपराध" से संबंधित है।

संक्षेप में मामला

बेंच याचिकाकर्ता मोहम्मद यासीन द्वारा दायर 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका पर सुनवाई कर रही थी। गिरफ्तारी मेमो के अनुसार, उसे 14 सितंबर 2026 को गिरफ्तार किया गया।

हालांकि, अपनी याचिका में उसने दावा किया कि उसे असल में 13 सितंबर को ही हिरासत में ले लिया गया। उस दिन वह शिकायतकर्ता की बेटी की मौत के मामले में जांच में शामिल होने के लिए अपने वकील के साथ पुलिस स्टेशन गया।

आरोप है कि याचिकाकर्ता द्वारा परेशान किए जाने के कारण शिकायतकर्ता की बेटी ने आत्महत्या कर ली थी। संबंधित कोर्ट ने उसकी जमानत अर्जी भी खारिज की थी।

हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता द्वारा पेश किए गए गिरफ्तारी मेमो में गिरफ्तारी के कारणों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां गायब थीं।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि गिरफ्तारी के कारण अलग से तैयार किए गए और 14 सितंबर 2026 को याचिकाकर्ता को दे दिए गए। साथ ही, यह भी दावा किया गया कि उस दस्तावेज पर याचिकाकर्ता के हस्ताक्षर मौजूद हैं।

कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों की स्कैन की गई प्रतियों की जांच की और उनकी तुलना 'हेबियस कॉर्पस' याचिका के साथ संलग्न दस्तावेजों से की।

कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार द्वारा पेश किया गया गिरफ्तारी मेमो और याचिकाकर्ता को दिया गया गिरफ्तारी मेमो एक जैसे ही थे। हालांकि, गिरफ्तारी के कारणों वाला दस्तावेज अलग था। अदालत ने गौर किया कि याचिकाकर्ता को गिरफ्तारी के कारणों की जो प्रति दी गई थी, उसमें केवल BNS की धारा 108 (आत्महत्या के लिए उकसाना) का ही जिक्र था।

दिलचस्प बात यह है कि, जैसा कि अदालत ने देखा, बाकी जानकारी - जैसे कि एक मामला दर्ज किया गया और ऐसे सबूत सामने आए, जिनसे पता चलता है कि मृतक ने याचिकाकर्ता द्वारा कथित तौर पर परेशान किए जाने के कारण आत्महत्या की - वह उसे दी गई प्रति से पूरी तरह गायब थी।

खंडपीठ ने माना कि इन हालात से केवल यही निष्कर्ष निकलता है कि याचिकाकर्ता को कभी भी गिरफ्तारी के कारण बताए ही नहीं गए।

अदालत ने कहा,

"इससे केवल यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि गिरफ्तारी के कारणों वाले हिस्से को बाद में जांच अधिकारी (IO) ने खुद जोड़ दिया। इसके अलावा, रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए गए दस्तावेज और जमानत अर्जी (जिसे खारिज कर दिया गया) पर सुनवाई के दौरान अदालत के सामने रखे गए कागजात से ऐसा लगता है कि जांच अधिकारी ने BNS के अध्याय XIV के तहत 'झूठे सबूत गढ़ने और सार्वजनिक न्याय के खिलाफ अपराध' जैसा अपराध किया।"

पुलिस की इस कार्रवाई की निंदा करते हुए अदालत ने कहा कि ऐसा लगता है कि जांच अधिकारी ने गिरफ्तारी के कारणों और अरेस्ट मेमो (गिरफ्तारी ज्ञापन) की जरूरतों को पूरा करने के लिए सबूत गढ़े हैं। ये दस्तावेज कभी याचिकाकर्ता को दिए ही नहीं गए, और इनका मकसद रिमांड और जमानत की कार्यवाही के दौरान उसे कोई राहत न मिलने देना था।

हाई कोर्ट ने फर्रुखाबाद के पुलिस अधीक्षक (SP) को निर्देश दिया कि वे जांच अधिकारी के खिलाफ BNS के अध्याय XIV की संबंधित धाराओं के तहत तुरंत FIR दर्ज करवाएं।

अदालत ने SP को यह भी निर्देश दिया कि वे 7 दिनों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) दाखिल करें। इस मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर को होगी।

Case Title : Mohd. Yaseen vs. State of U.P. and 3 others 2026 LiveLaw (AB) 927

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