हाईकोर्ट का यूपी बार काउंसिल को निर्देश- AIBE पास करने के बाद 4 सप्ताह में दिया जाए एनरोलमेंट नंबर
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वकीलों के एनरोलमेंट नंबर जारी करने में होने वाली देरी पर महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश को आदेश दिया कि ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) पास करने वाले वकीलों को परिणाम कार्ड प्राप्त होने के चार सप्ताह के भीतर एनरोलमेंट नंबर जारी किए जाएं। अदालत ने कहा कि वकीलों का "कीमती समय बर्बाद नहीं होना चाहिए।"
जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने एक जमानत मामले की सुनवाई के दौरान ये निर्देश जारी किए। अदालत ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को भी निर्देश दिया कि वे सभी जिला पुलिस प्रमुखों को आवश्यक निर्देश जारी करें, ताकि वकील के रूप में एनरोल होने के इच्छुक कानून स्नातकों का पुलिस सत्यापन राज्य बार काउंसिल से सत्यापन फॉर्म प्राप्त होने की तारीख से दो सप्ताह के भीतर पूरा किया जा सके।
मामले में मुख्य सवाल यह उठा था कि 2009-10 शैक्षणिक सत्र के बाद कानून की डिग्री हासिल करने वाला ऐसा वकील, जिसने अस्थायी एनरोलमेंट के दो साल के भीतर AIBE पास नहीं किया हो क्या अदालत में प्रैक्टिस जारी रख सकता है।
यह सवाल तब सामने आया, जब जमानत आवेदक की ओर से पेश जय हिंद गौंड अदालत में उपस्थित हुए, जबकि उन्होंने अस्थायी एनरोलमेंट के दो साल के भीतर AIBE पास नहीं किया।
हालांकि, जमानत याचिका का निपटारा 6 जुलाई 2026 को हो चुका था, लेकिन उस दिन हाईकोर्ट ने वकील को एडवोकेट एक्ट, 1961 की धारा 32 के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए "एक बार के अपवाद" के रूप में मामले में बहस करने की अनुमति दी थी।
चूंकि उनके प्रैक्टिस करने के अधिकार का प्रश्न अभी तय नहीं हुआ था, इसलिए अदालत ने मामले को लंबित रखते हुए हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, एडवोकेट एसोसिएशन, बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश और बार काउंसिल ऑफ इंडिया से सहायता मांगी।
21 जुलाई को मामले की आंशिक सुनवाई के दौरान अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया प्रमाणपत्र एवं स्थान-प्रैक्टिस सत्यापन नियम, 2015 के नियम 5 के तहत प्रैक्टिस प्रमाणपत्र की आवश्यकता उन लॉ ग्रेजुएट पर भी लागू होती है, जिन्होंने 2009-10 शैक्षणिक सत्र में कानून की पढ़ाई पूरी की थी और दो साल के भीतर AIBE पास नहीं किया।
इस बीच जय हिंद गौंड ने अदालत को बताया कि उन्होंने 18 जुलाई 2026 को AIBE पास किया और अपना परिणाम अदालत में पेश किया। उन्होंने AIBE नियम, 2010 के नियम 11.1 का हवाला देते हुए कहा कि अब उन्हें वकील के रूप में प्रैक्टिस करने का अधिकार है।
उन्होंने यह भी बताया कि बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश को AIBE का परिणाम प्राप्त होने के बाद स्थायी एनरोलमेंट नंबर जारी करने में समय लगता है। इसलिए उन्होंने अदालत से परिणाम कार्ड प्राप्त होने के एक सप्ताह के भीतर एनरोलमेंट नंबर जारी करने का निर्देश देने का अनुरोध किया था।
मामले पर विचार करते हुए जस्टिस देशवाल ने कहा कि ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन नियम, 2010 के नियम 9 के अनुसार, एडवोकेट एक्ट की धारा 24 के तहत एनरोल व्यक्ति तब तक प्रैक्टिस करने का हकदार नहीं है जब तक वह AIBE सफलतापूर्वक पास नहीं कर लेता।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था 2009-10 शैक्षणिक सत्र से कानून की पढ़ाई करने वाले ग्रेजुएट पर लागू होती है।
अदालत ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के 12 अप्रैल 2013 के प्रस्ताव का भी उल्लेख किया, जिसके तहत राज्य बार काउंसिलों को ऐसे कानून स्नातकों का दो साल के लिए अस्थायी एनरोलमेंट करने की अनुमति दी गई। इस अवधि के दौरान वे प्रैक्टिस कर सकते थे लेकिन उन्हें दो साल के भीतर AIBE पास करना आवश्यक था।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि 2009-10 या उसके बाद कानून की डिग्री हासिल करने वाले और बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश में अस्थायी रूप से एनरोल वकील, यदि दो साल के भीतर एआईबीई पास नहीं करते हैं, तो वे प्रैक्टिस जारी नहीं रख सकते।
ऐसे वकील सिविल, आपराधिक या राजस्व अदालतों में प्रैक्टिस नहीं कर सकते। यदि वे किसी अदालत या न्यायाधिकरण के समक्ष पेश होते हैं, तो पीठासीन अधिकारी उन्हें सुनने से इनकार कर सकता है या उनके वकालतनामे को स्वीकार नहीं कर सकता। ऐसे व्यक्ति एडवोकेट एक्ट की धारा 45 के तहत अभियोजन के लिए भी उत्तरदायी हो सकते हैं।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट या उसकी लखनऊ पीठ के समक्ष प्रैक्टिस करने के लिए संबंधित हाईकोर्ट की वकील रोल में अस्थायी प्रविष्टि होना आवश्यक है। हालांकि, बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश में अस्थायी एनरोलमेंट वाला वकील, जिसके पास हाईकोर्ट की वकील रोल में नाम दर्ज नहीं है, दो वर्ष की अवधि के दौरान इलाहाबाद या लखनऊ हाईकोर्ट की वकील रोल में दर्ज अधिवक्ता के साथ अदालत में पेश हो सकता है।
प्रैक्टिस प्रमाणपत्र के संबंध में भी हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया। अदालत ने कहा कि AIBE नियम, 2010 के नियम 11 के तहत AIBE पास करने वाला उम्मीदवार प्रैक्टिस प्रमाणपत्र पाने का हकदार है, जिसके आधार पर वह उसकी वैधता अवधि के दौरान भारत की किसी भी अदालत में वकील के रूप में प्रैक्टिस कर सकता है। इसकी सामान्य वैधता अवधि पांच वर्ष है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल प्रैक्टिस प्रमाणपत्र जारी होने के पांच वर्ष पूरे हो जाने से वकील प्रैक्टिस करने का अधिकार नहीं खोता। प्रैक्टिस प्रमाणपत्र एवं स्थान-प्रैक्टिस सत्यापन नियम, 2015 के नियम 5 का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि वास्तविक अयोग्यता तब आएगी जब बार काउंसिल द्वारा नियम 20.4 के तहत वकील का नाम गैर-प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता के रूप में प्रकाशित किया जाए।
इसका अर्थ है कि यदि सत्यापित या नवीनीकृत प्रैक्टिस प्रमाणपत्र जारी नहीं हुआ, लेकिन बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश ने वकील का नाम गैर-प्रैक्टिस करने वाले वकील के रूप में प्रकाशित नहीं किया है, तो वह पांच वर्ष की अवधि समाप्त होने के बाद भी प्रैक्टिस जारी रख सकता है।
हाईकोर्ट ने अपने वकील रोल अनुभाग को यह भी निर्देश दिया कि AIBE नियमों के तहत अस्थायी रूप से एनरोल ऐसे वकीलों के नाम, जिन्होंने दो वर्ष के भीतर AIBE पास नहीं किया, नोटिस प्रकाशित करने के बाद रोल से हटाए जाएं या निलंबित किए जाएं। हालांकि, यदि ऐसे वकील बाद में AIBE पास कर लेते हैं तो उनके नाम के संबंध में यह कार्रवाई लागू नहीं होगी।
अंत में, वकीलों को AIBE पास करने के बाद एनरोलमेंट नंबर मिलने में होने वाली देरी को देखते हुए अदालत ने बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष और सचिव को निर्देश दिया कि परिणाम कार्ड प्राप्त होने के चार सप्ताह के भीतर सफल उम्मीदवारों को एनरोलमेंट नंबर जारी किए जाएं। अदालत ने इस दिशा-निर्देश का उद्देश्य अधिवक्ताओं का कीमती समय बचाना बताया।