जब वर्ष 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने असंल को सजा देते हुए उनको कैद की सजा देने की बजाय तीस-तीस करोड़ रूपए जुर्माने की सजा दी तो मैंने इस फैसले की आलोचना करते हुए इसे केंद्रित व अनैतिक बताया था। तब मुझे अहसास भी नहीं था कि एक पीड़ित परिवार इस मामले में एक किताब लिख देगा। वो भी ऐसी हृदय को छूने वाली किताब जिसमें सिर्फ इस आदेश का ही जिक्र नहीं होगा बल्कि उस पूरी ट्रायल का जिक्र होगा,जिसमें पीड़ित परिवार के लोग एक आग में झुलसते रहे और अंत में न्याय की ही अग्नि प्रज्वलन की गई। अब उनके पास एक न्याय की एक आखिरी उम्मीद सुप्रीम कोर्ट में लंबित रिव्यू पैटिशन है।
लेखक नीलम कृष्णामूर्ति व शेखर कृष्णामूर्ति ने उपहार सिनेमा अग्निकांड में अपने दो नाबालिग बच्चे उन्नति व उज्जवल को खो दिया था। इस किताब में पूरी घटना को विस्तार से बताया गया है। किसी का नाम लिए बिना पूरी सच्चाई को बताया है। उपहार सिनेमा में 13 जून 1997 को आग लगी थी। जिसमें 59 लोग मारे गए थे। यह केस एक अच्छा उदाहरण है कि किस तरह अमीर लोग हमारे सहनशील न्यायिक सिस्टम से 19 साल से खेल रहे है। किताब में बताया गया है कि लेखक 19 साल तक न्याय के लिए लड़े। इस दौरान भारत में चार चुनी हुई सरकार बनी,17 मुख्य न्यायाधीश बने और देश को चार प्रधानमंत्री मिले। परंतु किसी ने पीड़ित परिजनों को उचित न्याय दिलाने व आरोपियों को उचित सजा दिलाने में मदद नहीं की। किताब में कई विडम्बनाओं को जिक्र किया है,किताब में बताया गया है कि दंपत्ति ने इस सिनेमा में पहले भी एक फिल्म देखी थी,जिसके एक साल बाद उनकी बेटी का जन्म हुआ था,जो इस घटना में मारी गई। इतना ही नहीं इस दंपत्ति को अपने बच्चों की डेड बाॅडी उसी अस्पताल से लेनी पड़ी,जिसमें उनका जन्म हुआ था। इतना ही नहीं अंग्रेजी के शब्दकोष में उन माता-पिता के लिए कोई शब्द नहीं है,जिन्होंने अपने बच्चों को खो दिया हो। बच्चों के शव जिस हालत में जले हुए मिले थे,उसके बारे में पढ़कर पाठकों की रूह कांप जाएगी। साथ ही यह भी बताया गया है कि किस तरह इस घटना में मानवता शर्मसार हुई है,कैसे बच्चों द्वारा पहने हुए गहनों व अन्य सामान को उनके शव से उतार लिया गया था। लेखकों ने इस इमारत के ढ़ाचे के बारे में भी विस्तार से बताया है। किस तरह आग लगी और किसकी गलती के कारण ऐसा हुआ,किस तरह इस घटना से बचा जा सकता था,कौन-कौन इससे पीड़ित हुआ,किस-किस पर केस चला और किस धारा के तहत केस चला,किस तरह उन्होेंने कानूनी लड़ाई के लिए तैयारी की,किस तरह उन्होंने न्याय पाने के लिए एसोसिएशन का गठन किया,किस तरह लेखकों ने विभिन्न कानूनी प्रावधानों के बारे में जानकारी हासिल की,किस तरह उन्होंने केस की हर तारीख अटेंड की,विभिन्न तारीखों पर जाते समय किस-किस तरह की परेशानियों को झेलना पड़ा, किस तरह उन्होंने गिरती सेहत के तालमेल बिठाया,किस तरह पीड़ितों की याद के लिए एसोसिएशन के सदस्यों ने एक स्मृति उपवन बनाई,कैसे सिर्फ चयनात्मक कार्रवाई की गई,किस तरह गिरफ्तारी से बचा गया,किस तरह ट्रायल में देरी की गई,किस तरह कोर्टरूम में अंसल बंधुओं को विशेष ट्रीटमेंट दिया गया,किस तरह फैंसी फिगर साठ करोड़ रूपए की बात सामने आई,किस तरह पीड़ित परिवार न्याय के लिए खड़ा रहा और आग पर हुए न्याय के गवाह बने।
जार्ज ओरवैल ने कुशलतापूर्वक एनीमल फार्म में लिखा है-’आॅल मैन आर इक्वल बट सम मैन मोर इक्वल दैन दाॅ अदर्स’। उपहार सिनेमा त्रासदी और लेखकों का न्याय पाने के लिए पूरा किया सफर विक्टोर फ्राक्ल द्वारा कही गई बात का एक अच्छा उदाहरण है। विक्टोर ने ’ट्रेजिक आप्टिमिज्म’ शब्द का प्रयोग किया था,जिसके अनुसार दुखद अनुभव के बाद भी कोई आशावादी रह सकता है।
ट्रायल बाई फायर,लेखकों की एक कथा है,जो अनगिनत समस्याओं के बाद भी हर बार उठे,धुल हटाई और दुगने जोश के साथ आगे बढ़े। क्लासिक केस आरवी सुस्सेक्स जस्टिस,एक्स पारटे मैक्कर्थी(1923) में हेवर्ट के चीफ जस्टिस ने लिखा था कि यह सिर्फ महत्वपूर्ण नहीं है,बल्कि मूलभूत महत्वपूर्ण है कि सिर्फ न्याय किया नहीं जाना चाहिए,बल्कि न्याय हुआ भी दिखना चाहिए।
परंतु इस मामले में ऐसा कुछ नहीं है,जिससे कहा जा सके कि न्याय हुआ दिख रहा है। न्यायपालिका को हर कदम पर ध्यान देना चाहिए,जैसा कि थाॅमस फुल्लर ने कहा है-’बी यू एवर सो हाई,द लाॅ इज एबव यू’। रिव्यू पैटिशन में शायद न्याय हुआ दिखे और अमीरों को बता दिया जाए कि वह न्याय से नीचे ही है। लेखक प्रशंसा के हकदार है।