पुस्तक समीक्षाः नेमलेस-फेसलेस, बट नाॅट वाॅइसलेस एनीमोर - नमिता सक्सेना

Update: 2017-06-17 09:57 GMT

पिछले दिनों दिल को झकझोर देने वाली उपहार सिनेमा हादसा पर नीलम व शेखर कृष्णामूर्ति द्वारा लिखी पुस्तक की समीक्षा करने का सौभाग्य मुझे मिला।

हमारी आपराधिक न्यायिक प्रणाली में पीड़ितों(दोनों,फर्स्ट हेंड व सैकेंड हेंड गार्जियन) की भूमिका बहुत की सीमित है और अधिकतर अप्रभावी है।

राईट टू अपील एंड दाॅ विक्टिम कंपेनसेशन स्कीम की धारा 301 के तहत सरकारी वकीलों को सहायता करने व धारा 2(डब्ल्यूए) के तहत दी गई परिभाषा के अलावा पीड़ितों की भूमिका दिन-प्रतिदिन की प्रताड़ना,परेशानी व निराशा से भरी होती है।

पीड़ितों को न्याय पाने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है और प्रभावी न्याय पाने के लिए एक बहुत बड़े दर्द भरे सफर से गुजरना पड़ता है।

’नेमलेस,फेसलेसःविक्टिम इन क्रिमनल जस्टिस सिस्टम’ किताब निर्मला आर उमानाथ ने लिखी है,(जिसका प्रकाशन यूनिवर्सल लाॅ पब्लिशिंग ने किया है जो लेक्सिस नेक्सिस का प्रकाशक है),जिसमें तमिलनाडु में यौन शोषण की शिकार महिलाओं की मिसाल दी गई है और दिल दहलाने वाली घटनाओं को जिक्र किया गया है। जिसमें बताया गया है कि किस तरह पहले आरोपी के हाथों जघन्य प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है और उसके बाद कानून को लागू करने वाली एजेंसी व तीसरी बार न्यायपालिका के हाथों।

इस किताब में 276 पेज है,जो आठ चैप्टर में बंटे है। इस किताब के टाईटल को शायद उत्कृष्ट केस ’प्याने बनाम टेनिस्सी(1991 यूएस) से लिया गया है।

स केस की एक प्रसिद्ध टिप्पणी है,जिसमें कहा गया है कि ’दाॅ क्राइम विक्टिम आर नाॅट नेशलेस/फेसलेस नाॅन-प्लेयर इन क्रिमनल जस्टिस सिस्टम’।

किताब की लेखिका एक वकील है और आॅल इंडिया डेमोक्रेटिक वूमन एसोसिएशन(एआईडीडब्ल्यूए) की प्रमुख सदस्य है। साथ ही इनको जस्टिस आरके अग्रवाल ने उस समय विचारपति के पद यानि जजशिप का आॅफर दिया था,जिस समय वह मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे।

इस किताब को पढ़ने से पहले पाठकों को अपने दिमाग में यह रखना होगा कि इस किताब में पीड़ित के लिए ’वह यानि महिला’ शब्द का प्रयोग किया गया है। क्राइम एक अपराध है,जो मानवीय शरीर के खिलाफ किया जाता है,जिसमें अधिकतर दुष्कर्म के मामले शामिल है और इसमें शामिल अधिकतर मामलों में घटना की जगह तमिलनाडु है,सिवाय निर्भया केस,मथुरा गैंग रेप केस,कटारा हत्या मामला(जिसमें लड़की ने मृतक के साथ किसी तरह के लव-अफेयर होने की बात से इंकार कर दिया था),सूर्यानेल्ली रेप केस व भंवरी देवी केस के(जिसमें निचली अदालत ने माना था कि एक उच्च जाति का व्यक्ति निची जाति के इंसान से दुष्कर्म नहीं कर सकता है)।

इस किताब में लेखिका ने प्रयास किया है कि प्रत्यक्ष केसों की मिसाल पेश की जाए और उनका विवरण इस तरह दिया गया है कि वह मानवीय आत्मा को हिला देते है। मेरे लिए जगह व लोगों के नाम को तमिलनाडु से जोड़ना इसलिए आसान रहा है क्योंकि मैं खुद एक साल से ज्यादा समय तक तमिलनाडु में रहा हूं। परंतु ऐसा करना उन लोगों के लिए मुश्किल है,जो क्षेत्रीय स्थानों व जाति आदि के बारे में ज्यादा नहीं जानते है। न ही जिनको इस बारे में पता है कि उन इलाकों में किस तरह कुछ जाति के लोग आपराधिक न्यायिक प्रशासन को प्रभावित करते है।

लेखिका ने किताब की योजना को इस तरह रचा है,जिसमें सबसे पहले उस ब्लैकस्टोन रेशो की आलोचना की है,जिसके तहत कहा गया है कि भले ही दस आरोपी बच निकले,परंतु किसी एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए। साथ ही एक आरोपी व पीड़ित के अधिकारों की भी तुलनात्मक सूची बनाई है। इस किताब का चैप्टर-4 इसका दिल व आत्मा है,जिसमें लेखक ने सहज तरीके से बताया है कि किस तरह पीड़ित कष्ट भुगतते है और किस तरह उनकी सुरक्षा के लिए राज्य सरकार द्वारा तैनात लोग ही उनको प्रताड़ित करते है। साथ ही बताया गया है कि कैसे उनको सहायता मिलती है,कैसे उनका हतोत्साहित किया जाता है और किस तरह कठिनाई से वह लड़ते है।

किताब में कई ऐसी घटनाएं है,जिनका जिक्र यहां नहीं करना चाहता हूं,परंतु वह इस किताब को पढ़ने के लिए उत्साहित करती है। एक ऐसी घटना से जिसने विशेषतौर पर मुझे छुआ है,जिसमें जस्टिस भानुमति(सुप्रीम कोर्ट),जब वह एडीशनल सेशन जज थी,उस समय उनको एक घटना की जांच करने के लिए ज्यूडिशियल कमीशन के तौर पर नियुक्त किया गया था। उनको इस मामले की जांच के लिए काफी दूर जाना पड़ा और लगभग दो किलोमीटर पैदल चलकर गांव तक पहुंचना पड़ा। यह घटना दर्शा रही है कि न्याय के लिए जस्टिस भानुमति कितनी पुरजोश या उत्साही थी। लेखिका ने इसी तरह के दूर-दराज के लाकों की घटनाओं को उल्लेख किया है। लेखिका ने इस बात का भी जिक्र किया है किस तरह वह एक फर्जी आध्यात्मिक गुरू परमानंदा को नियंत्रित करना चाहती थी,परंतु ऐसा नहीं कर पाई,जिस कारण अगले छह साल में यौन शोषण के और ज्यादा मामले सामने आए। जिसके बाद इस गुरू को पकड़ा गया और उसके खिलाफ केस चलाया गया। इस किताब में पीड़ितों के अधिकार के बारे में इंटरनेशनल इंस्ट्रमन्ट्स का भी जिक्र किया गया है और अन्य अधिकार क्षेत्र में दिए गए अधिकारों के बारे में भी बताया गया है। पीड़ितों की मदद करने के लिए दिखाए गए उत्साह के कारण लेखिका को एक फर्जी एससी/एसटी एट्रोसिटी एक्ट केस को भी झेलना पड़ा था। इतना ही नहीं लेखिका को विचारपति पद यानि जजशिप के लिए दिए गए आॅफर को भी कई प्रभावशाली लोगों ने दबाने की कोशिश की। हालांकि उसने इसके लिए संघर्ष किया और न्याय पाने के लिए प्रयास किया। लेखिका भारत में पीड़ितों के लिए अधिकारों के लिए एक रोल माॅडल है। इस किताब को प्रोफेशन,विक्टिमलोजी के छात्रों व शिक्षकों को जरूर पढ़ना चाहिए।

हमें उसे भी याद रखना चाहिए,जो मार्क्स ने लिखा था-’विक्टिम आॅफ दाॅ वर्ल्ड यूनाईट,यू हेव नथिंग टू लूज एक्सेप्ट योर फीयर’। जब तक हमारे पास लेखिका जैसे व्यक्ति और इस तरह की प्रकृति की किताबें है,नाम व चेहरों को भले ही भुला दिया जाए,परंतु पीड़ितों की आवाज धुंधली नहीं हो पाएगी। किताब व लेखिका प्रशंसा की हकदार है।