नेचुरल जस्टिस के उल्लंघन का आरोप लगाने वाली रिट याचिका वैकल्पिक उपाय के आधार पर शुरुआती चरण में खारिज नहीं की जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
8 Oct 2026 9:20 AM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जिस रिट याचिका में नेचुरल जस्टिस (प्राकृतिक न्याय) के उल्लंघन का खास तौर पर ज़िक्र किया गया हो, उसे केवल इस आधार पर शुरुआती चरण में खारिज नहीं किया जा सकता कि कोई वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध है। इसके लिए पहले काउंटर-एफिडेविट (जवाब-हलफनामा) मंगाना ज़रूरी है और दोनों पक्षों के तर्कों के आधार पर याचिका की जांच होनी चाहिए।
जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने कहा,
"यह निष्कर्ष निकालना कि कोई मामला नेचुरल जस्टिस के अपवाद के दायरे में नहीं आता, अपने आप में तथ्य का निष्कर्ष है, क्योंकि इसके लिए पहले यह तय करना होता है कि क्या वास्तव में उल्लंघन हुआ है। ऐसा निष्कर्ष केवल रिट याचिका में दी गई दलीलों के आधार पर नहीं निकाला जा सकता, और न ही इसे याचिका को खारिज करने का आधार बनाया जा सकता है... इस मुद्दे पर फैसला दूसरे पक्ष की बात सुनने के बाद ही किया जाना चाहिए।
याचिका की स्वीकार्यता (मेंटेनेबिलिटी) कभी भी असल मुद्दा नहीं थी; एकमात्र सवाल यह था कि क्या बताई गई तथ्यों के आधार पर कोर्ट को उस अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने से इनकार करना चाहिए, जो उसके पास निर्विवाद रूप से है। खारिज करने के फैसले को स्वीकार्यता का मुद्दा बताना यह संकेत देता है कि रिट याचिका गलत है। यह बात किसी भी ऐसे कानूनी आधार से समर्थित नहीं है जिसका हवाला दिया गया हो।"
अपीलकर्ता को 28.08.1991 में लेक्चरर नियुक्त किया गया था। उन्हें 30.06.2023 की सीनियरिटी लिस्ट में सबसे सीनियर टीचर होने के नाते 01.07.2023 को लखनऊ यूनिवर्सिटी से जुड़े कॉलेज, श्री जय नारायण मिश्रा पी.जी. कॉलेज, लखनऊ का प्रिंसिपल नियुक्त किया गया। प्राइवेट रेस्पोंडेंट नंबर 4, जो 21.06.1990 को लेक्चरर नियुक्त हुए और 14.06.1992 को रेगुलर हुए, उन्होंने 10.06.2020 की पिछली सीनियरिटी लिस्ट के खिलाफ तय समय सीमा के भीतर कोई अपील दायर नहीं की थी, जिसमें अपीलकर्ता को उनसे ऊपर रखा गया। 2023 में उन्होंने दावा किया कि अपील करने वाले ने 1995 और 2014 के बीच जो छुट्टी ली थी, वह बिना मंज़ूरी के थी और उससे उनकी सर्विस में रुकावट आई। उन्होंने इस नियुक्ति के ख़िलाफ़ वाइस चांसलर से अपील की।
अपील पर फ़ैसला करने के लिए वाइस चांसलर ने जो कमिटी बनाई, उसे भंग करके दोबारा बनाया गया। 03.11.2025 की उसकी रिपोर्ट में अपील करने वाले की सर्विस की अवधि 40 दिन कम पाई गई और 14.11.2025 के आदेश से वाइस चांसलर ने रेस्पॉन्डेंट नंबर 4 को सीनियर घोषित किया। सीनियरिटी लिस्ट में बदलाव किया गया और 30.11.2025 के एक प्रस्ताव के ज़रिए कॉलेज की मैनेजिंग कमिटी ने रेस्पॉन्डेंट नंबर 4 को प्रिंसिपल का पद सौंप दिया।
इन आदेशों के ख़िलाफ़ अपील करने वाले की रिट याचिका को 17.12.2025 को एक सिंगल जज ने बिना कोई काउंटर-एफ़िडेविट मंगाए ही खारिज किया। इसकी वजह यह बताई गई कि उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 की धारा 68 के तहत एक वैकल्पिक उपाय मौजूद था।
डिविजन बेंच के सामने रेस्पॉन्डेंट नंबर 4 के वकील ने 'बिहार इंडस्ट्रियल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी और अन्य बनाम SCOPE सेल्स लिमिटेड और अन्य' मामले का हवाला देते हुए कहा कि सिर्फ़ इसलिए इंट्रा-कोर्ट अपील पर विचार नहीं किया जा सकता कि कोई दूसरा नज़रिया भी हो सकता है। कोर्ट ने इस फ़ैसले से अलग राय रखते हुए कहा कि यह सिद्धांत तब लागू होता है, जब रिट कोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड के आधार पर दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार किया हो। अगर किसी शुरुआती निष्कर्ष को बिना दूसरे पक्ष के सबूत के चुनौती दी जाती है तो यह दूसरी राय मांगने जैसा नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि वैकल्पिक उपाय का नियम कोर्ट के विवेक और खुद पर लगाई गई रोक पर आधारित है, न कि किसी कानूनी या संवैधानिक रोक पर, और यह संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को खत्म नहीं करता है। कोर्ट ने माना कि सिंगल जज ने चार मान्यता प्राप्त अपवादों का सही ज़िक्र किया, लेकिन उन्होंने 'व्हर्लपूल कॉर्पोरेशन' और 'राधा कृष्ण इंडस्ट्रीज़' मामलों में बताए गए क्रम को उलट दिया—जबकि विवादित आदेश इन्हीं फ़ैसलों पर आधारित है।
कोर्ट ने माना कि अपील करने वाले ने वैकल्पिक उपाय से बचने के लिए सिर्फ़ दिखावे के तौर पर 'नैचुरल जस्टिस' (प्राकृतिक न्याय) का तर्क नहीं दिया। उसने तर्क दिया कि उसे बिना सूचना दिए कमेटी का पुनर्गठन किया गया; कमेटी ने उसकी सर्विस की अवधि की फिर से गणना की, लेकिन राज्य सरकार की 13.03.2012 की उस मंज़ूरी पर ध्यान नहीं दिया, जिसके तहत उस छुट्टी को सर्विस में रुकावट माना गया; वाइस चांसलर ने रिपोर्ट पर कार्रवाई की, जबकि उसे रिपोर्ट के बदले हुए आधार का जवाब देने का मौका नहीं दिया गया; और कमेटी के सदस्यों की ईमानदारी पर भी सवाल। इनमें से किसी भी बात की जाँच नहीं की गई, क्योंकि कोई जवाबी हलफ़नामा (Counter-Affidavit) नहीं मांगा गया।
कोर्ट ने कहा,
“यह निष्कर्ष कि कोई मामला 'नैचुरल जस्टिस' के अपवाद के दायरे में नहीं आता, अपने आप में तथ्यों पर आधारित निष्कर्ष है, क्योंकि इसके लिए पहले यह तय करना होता है कि क्या वास्तव में नियमों का उल्लंघन हुआ। ऐसा निष्कर्ष केवल रिट याचिका में दिए गए तर्कों के आधार पर नहीं निकाला जा सकता।”
इस सवाल पर किस क्रम में विचार किया जाना चाहिए, इस बारे में कोर्ट ने कहा,
“सही क्रम यह होगा: जवाबी हलफ़नामे मंगवाएं, फिर दोनों पक्षों के तर्कों के आधार पर दलील की जांच करें, फिर तय करें कि क्या अपवाद लागू होता है या नहीं, और अंत में यह तय करें कि क्या याचिकाकर्ता को वैकल्पिक उपाय के लिए भेजने का अधिकार (Discretion) इस्तेमाल किया जाना चाहिए।”
ये तर्क कि कमेटी की रिपोर्ट केवल सिफ़ारिशी थी। यह कि अपील करने वाला मूल कमेटी के सामने पेश हो चुका है, इसलिए वह पुनर्गठित कमेटी की प्रक्रिया पर सवाल नहीं उठा सकता, ऐसे मामले हैं, जिनके लिए तथ्यों की जाँच ज़रूरी है; कोर्ट ने कहा कि जवाबी हलफ़नामा इन्हीं मुद्दों को सुलझाने के लिए होता है।
यह मानते हुए कि मामले के तथ्य 'व्हर्लपूल कॉर्पोरेशन' मामले में बताए गए अपवादों में से कम से कम दो के दायरे में आते हैं - 'नैचुरल जस्टिस' के सिद्धांतों का उल्लंघन और मौलिक अधिकारों का प्रवर्तन - कोर्ट ने 17.12.2025 का आदेश रद्द किया और रिट याचिका को उसके मूल नंबर पर बहाल किया ताकि मामले के गुण-दोष (Merits) पर नए सिरे से विचार किया जा सके। कोर्ट ने पक्षों को हलफ़नामे का आदान-प्रदान करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने दर्ज किया कि अपील करने वाले की सर्विस का केवल एक साल बचा है। मामले के गुण-दोष से जुड़े सभी तर्कों पर विचार करने का रास्ता खुला रखा गया।
इसके अनुसार, इंट्रा-कोर्ट अपील मंज़ूर कर ली गई।
Case Title : Vinod Chandra v. State Of U.P. Thru. Prin. Secy. Deptt. Higher Education Govt. Lko. And

