जब नियम डिग्री की समानता के बारे में कुछ न कहें तो रिट कोर्ट एकेडमिक एक्सपर्ट की तरह फैसला नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

  • जब नियम डिग्री की समानता के बारे में कुछ न कहें तो रिट कोर्ट एकेडमिक एक्सपर्ट की तरह फैसला नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जब किसी पद के लिए योग्यता तय करने वाले सर्विस नियमों में समकक्ष (बराबर) डिग्री पर विचार करने का कोई प्रावधान नहीं है तो रिट कोर्ट यह तय नहीं कर सकता कि नियमों में न बताई गई कोई डिग्री, तय की गई डिग्री के बराबर है या नहीं।

    कोर्ट ने कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कोर्ट ऐसी समानता तय करने के लिए एकेडमिक एक्सपर्ट की भूमिका नहीं निभा सकता।

    जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने कहा,

    “यह कोर्ट यह कहने को मजबूर है कि इस मामले को नियंत्रित करने वाला कानून, यानी नियम 2024, योग्यताएं तय कर चुका है। इसमें किसी समकक्ष विषय पर विचार करने की कोई शर्त नहीं है (जैसा कि मौजूदा रिट याचिका में याचिकाकर्ताओं ने चाहा है)। इसलिए अब भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यह कोर्ट शैक्षिक योग्यता की समानता तय करने के लिए एकेडमिक एक्सपर्ट के तौर पर काम नहीं कर सकता।”

    याचिकाकर्ताओं ने विज्ञापन संख्या A-5/E-1/2025 के तहत असिस्टेंट टीचर (पुरुष/महिला) (कंप्यूटर) के पद के लिए आवेदन किया और तय योग्यता न होने के कारण उनकी उम्मीदवारी खारिज कर दी गई। विज्ञापन के लिए B.Tech/B.E. (कंप्यूटर साइंस), या कंप्यूटर साइंस या कंप्यूटर एप्लीकेशन में ग्रेजुएशन, या NIELIT से 'A' लेवल कोर्स के साथ ग्रेजुएशन डिग्री, या MCA के साथ कंप्यूटर साइंस में B.Tech. की ज़रूरत है।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि B.Tech. (I.T.) को B.Tech. (कंप्यूटर साइंस) के बराबर माना जाना चाहिए, क्योंकि आई.टी. कोर्ट में कंप्यूटर एप्लीकेशन, प्रोग्रामिंग, डेटाबेस सिस्टम, सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग, ऑपरेटिंग सिस्टम, नेटवर्किंग और एल्गोरिदम की काफी और सीधी पढ़ाई शामिल है। 06.10.2021 के एक नोटिफिकेशन का हवाला दिया गया, जिसके बारे में कहा गया कि यह उन मुश्किलों को दूर करने के लिए था, जिनका सामना नौकरी चाहने वालों और सरकारी संगठनों को उन पदों पर भर्ती में करना पड़ता है, जिनके लिए इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी में योग्यता तय की गई।

    आयोग के वकील ने कहा कि वे तय की गई योग्यताओं को मानने के लिए बाध्य हैं और उनसे अलग नहीं हो सकते, क्योंकि ऐसा करने से पारदर्शिता पर असर पड़ेगा और उन उम्मीदवारों के साथ अन्याय होगा, जिन्होंने विज्ञापन पढ़ने के बाद आवेदन न करने का फैसला किया। यह भी कहा गया कि योग्यता की समानता तय करना आयोग का काम नहीं, बल्कि राज्य सरकार का है, जिसे हर मामले की खूबियों के आधार पर उपयुक्तता का आकलन करने के लिए विशेषज्ञों की एक समिति बनाकर अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए।

    अदालत ने तय योग्यता के बराबर डिग्री मानने की राज्य की नीति पर अतिरिक्त मुख्य सचिव (माध्यमिक शिक्षा) से हलफनामा मांगा और याचिकाकर्ताओं को मुख्य परीक्षा में अस्थायी रूप से शामिल होने की अनुमति दी।

    हलफनामे से पता चला कि 'श्री विकास और 80 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य' मामले में 17.09.2021 के आदेश के बाद, शैक्षिक योग्यताओं में समानता को स्पष्ट करने के लिए 26.04.2023 के सरकारी आदेश से एक अंतर-विभागीय समिति बनाई गई। इसकी सिफारिश पर संविधान के अनुच्छेद 309 के प्रावधान के तहत 30.01.2025 को 'उत्तर प्रदेश अधीनस्थ शिक्षा (प्रशिक्षित स्नातक ग्रेड) सेवा नियमावली, 1983' में छठा संशोधन अधिसूचित किया गया, जिसके तहत - जैसा कि हलफनामे में कहा गया - सभी विषयों में समानता की व्यवस्था खत्म की गई। संशोधित नियमों के तहत तय योग्यता वही है जो विज्ञापन में थी, और आयोग ने किसी भी समकक्ष कोर्स पर विचार करने की बात नहीं कही थी।

    कोई राहत न देते हुए अदालत ने कहा,

    “इस अदालत को इस मामले में आगे कुछ करने की ज़रूरत नहीं लगती, क्योंकि 2024 के नियमों में किसी भी समकक्ष विषय पर विचार करने का प्रावधान नहीं है, जैसा कि मौजूदा रिट याचिका में याचिकाकर्ताओं ने चाहा है; इसलिए याचिकाकर्ताओं के पास विज्ञापन संख्या A-5/E-1/2025 के तहत सहायक शिक्षक, प्रशिक्षित स्नातक ग्रेड (कंप्यूटर) के पद के लिए विज्ञापन में तय योग्यता नहीं है। इस प्रकार, कोई राहत नहीं दी जा सकती।”

    इसके बाद रिट याचिका को रिकॉर्ड में दर्ज कर लिया गया।

    Case Title : Kopal Bhartiya and 7 others v. State of U.P. and 3 others

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