वकीलों के हंगामे के दौरान कथित तौर पर कोई कार्रवाई न करने पर हाईकोर्ट का लखनऊ पुलिस से सवाल: पुलिस 'मूक दर्शक' क्यों बनी रही?

Shahadat

23 July 2026 10:30 AM IST

  • वकीलों के हंगामे के दौरान कथित तौर पर कोई कार्रवाई न करने पर हाईकोर्ट का लखनऊ पुलिस से सवाल: पुलिस मूक दर्शक क्यों बनी रही?

    इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने बुधवार को लखनऊ की एक घटना से जुड़ी जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए पुलिसकर्मियों के व्यवहार पर कड़ी नाराजगी जताई। इस घटना में वकील के भेष में आए लोगों पर पुलिस की मौजूदगी में जबरन घुसने, तोड़-फोड़ और गुंडागर्दी करने का आरोप है।

    मौके पर मौजूद लखनऊ पुलिसकर्मियों की कथित निष्क्रियता पर सवाल उठाते हुए जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की बेंच ने पूछा:

    "जब ऐसी घटना हो रही थी तो पुलिस मूक दर्शक क्यों बनी रही? अतिरिक्त बल क्यों नहीं बुलाया गया और उन लोगों को पकड़ा क्यों नहीं गया..."

    बेंच ने यह भी देखा कि पुलिसकर्मी कथित तौर पर गलत काम करने वालों के साथ "काफी दोस्ताना व्यवहार" कर रहे थे और टिप्पणी की कि "इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि स्थानीय पुलिसकर्मियों ने इन गैर-कानूनी कामों में मदद की हो"।

    इसे देखते हुए बेंच ने लखनऊ के पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया कि वे मामले की जांच करें कि मौके पर पुलिसकर्मियों की मौजूदगी के बावजूद उचित कार्रवाई क्यों नहीं की गई, और गुरुवार को अगली सुनवाई में शामिल हों।

    बता दें, बेंच लखनऊ हाई कोर्ट के एक वकील द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। वकील का आरोप है कि 7 जुलाई को वकील के भेष में कुछ गुंडे क्रिकेट नेट प्रैक्टिस और शादी समारोहों के लिए इस्तेमाल होने वाली जगह पर घुस आए और अंदर मौजूद लोगों को गाली देने और धमकाने लगे।

    याचिका के अनुसार, इन लोगों ने कर्मचारियों और मजदूरों के साथ मारपीट की, ईंटें फेंकीं, CCTV कैमरे तोड़े और उस जगह पर जबरन कब्जा करने की कोशिश की।

    आरोपों की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने शुरुआत में ही निर्देश दिया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया और उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को कार्यवाही में पक्षकार बनाया जाए।

    बेंच ने यह भी गौर किया कि घटना के संबंध में पहले ही FIR दर्ज की जा चुकी है, जिसमें कई वकीलों के नाम हैं। उसने राज्य की स्टेटस रिपोर्ट पर भी ध्यान दिया, जिसमें कथित तौर पर शामिल कई वकीलों के नामों का जिक्र है, जिनमें सेंट्रल बार एसोसिएशन के महासचिव के भाई का नाम भी शामिल है।

    बार के एक पदाधिकारी के खिलाफ आरोपों से जुड़े एक अन्य मामले का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि यह चिंताजनक स्थिति है। कोर्ट ने वीडियो फुटेज देखने के बाद कहा कि इसमें एक परेशान करने वाली तस्वीर दिखी, जिसमें कई वकील कथित तौर पर परिसर में घुस गए, स्टाफ़ और मज़दूरों को भगा दिया और कब्ज़ा करने के लिए परिसर में बेरोकटोक घूमते रहे।

    बेंच ने बार के सदस्यों की बातें भी दर्ज कीं कि वकीलों का ऐसा समूह, जो खुद कानून हाथ में लेकर काम करता है, ऐसे विवादों को गैर-कानूनी तरीके से सुलझाने का वादा करता है। इससे न सिर्फ़ वकालत के पेशे की बदनामी होती है, बल्कि कानून की प्रक्रिया को भी दरकिनार किया जाता है और उसे कमज़ोर किया जाता है।

    इस मामले में पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर चिंता जताते हुए कोर्ट ने कहा कि वीडियो में घटना के दौरान बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी मौजूद दिखे, जबकि वकील की पोशाक पहने लोग लगभग चार घंटे तक परिसर के अंदर रहे।

    बेंच ने सवाल किया:

    "...जब FIR और स्टेटस रिपोर्ट में बताई गई घटना हो रही थी, तो पुलिस मूकदर्शक क्यों बनी रही? वे पुलिस अधिकारी कौन थे? घटना कितने समय तक चली? क्या कार्रवाई की गई? अतिरिक्त बल क्यों नहीं बुलाया गया और उन लोगों को क्यों नहीं पकड़ा गया, जिन्होंने बिना किसी अधिकार या मालिकाना हक के विवादित परिसर में घुसपैठ की थी (जैसा कि FIR दर्ज कराने वाले ने दावा किया है)? और ACP लखनऊ के आने से पहले, जब घुसपैठिए चार घंटे तक परिसर के अंदर थे, तब पुलिसकर्मियों ने क्या कार्रवाई की? क्योंकि वीडियो क्लिप में कम से कम 10-15 पुलिसकर्मी लगातार मौजूद दिख रहे हैं।"

    पुलिस के आचरण पर अपनी शुरुआती चिंता ज़ाहिर करते हुए कोर्ट ने कहा:

    "असल में, हमें लगा कि पुलिसकर्मी घुसपैठियों के साथ काफी दोस्ताना व्यवहार कर रहे थे और साफ़ तौर पर निष्क्रिय थे। हम बस इतना ही कहना चाहते हैं कि इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि स्थानीय पुलिसकर्मियों ने इन गैर-कानूनी कामों में मदद की हो।"

    कोर्ट ने निर्देश दिया कि वीडियो फुटेज वाली पेन ड्राइव को सीलबंद लिफ़ाफ़े में रखा जाए और केस रिकॉर्ड के साथ सुरक्षित रखा जाए।

    कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर को यह भी निर्देश दिया कि वे उस याचिकाकर्ता की सुरक्षा सुनिश्चित करें जिसने यह मामला कोर्ट के सामने रखा था।

    Case title - Saksham Singh (Advocate) vs. State Of U.P. Thru. Addl. Chief Secy. Deptt. Of Home Govt. Of U.P. And 3 Others

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