'जज का फ़ैसला कौन करता है?': चीफ जस्टिस-केंद्रित मॉडल में बदलाव की आवश्यकता- इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
1 Oct 2026 9:50 AM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाईकोर्ट प्रशासन के चीफ जस्टिस-केंद्रित मॉडल में 'बदलाव' (Recalibration) की ज़रूरत बताई। कोर्ट ने ज़्यादा सोच-समझकर लिए गए फ़ैसलों, संस्थागत रूप से संतुलित और सबकी भागीदारी वाले नज़रिए के साथ-साथ मज़बूत संस्थागत जवाबदेही पर ज़ोर दिया।
जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने चार मामलों से जुड़े एक फ़ैसले में यह बात कही। इन मामलों में निचली अदालतों में देरी, ज़मानत से जुड़े निर्देशों का पालन न होने और न्यायिक अनुशासन से जुड़े बड़े सवालों जैसे मुद्दों को उठाया गया।
इन मुद्दों पर विचार करते हुए कोर्ट ने खुद हाईकोर्ट के कामकाज पर चर्चा की और कुछ चिंताएं ज़ाहिर कीं। इनमें प्रशासनिक अधिकार का इस्तेमाल, संस्थागत प्रशासन में अन्य जजों (Puisne Judges) की सीमित भूमिका, कुछ सीनियर जजों के पास प्रशासनिक ज़िम्मेदारियों का जमा होना और व्यवस्थित आंतरिक जवाबदेही तंत्र का न होना शामिल है।
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा परिकल्पित चीफ जस्टिस-केंद्रित मॉडल में मज़बूत नेतृत्व के साथ-साथ "सहयोगी, भागीदारीपूर्ण और विचार-विमर्श वाला नज़रिया" शामिल है, जिसमें भाईचारे की भावना निहित है।
चीफ जस्टिस-केंद्रित प्रशासन में 'बदलाव' की ज़रूरत
कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट स्तर पर जजों के बीच न्यायिक कामकाज के बंटवारे से जुड़े मामलों पर "सोच-समझकर और भागीदारीपूर्ण बातचीत" की बहुत कम गुंजाइश है।
कोर्ट ने गौर किया कि काम का बंटवारा परफॉर्मेंस से जुड़ा नहीं है और अगले स्तर पर पदोन्नति (Elevation and Promotion) के लिए विचार करने के लिए "कोई तय, लिखित और अधिसूचित नियम" नहीं है।
कोर्ट ने आगे कहा:
"सबसे बड़ी बात यह है कि प्रशासनिक स्तर पर लिए गए फ़ैसलों के लिए कोई जवाबदेही तय नहीं होती और न ही किसी स्वतंत्र एजेंसी द्वारा उनका ऑडिट किया जाता है, जिससे पक्षपात, भेदभाव या बाहरी कारणों से लिए गए फ़ैसलों के मामलों में जवाबदेही तय की जा सके।"
कोर्ट ने कहा कि इन मुद्दों का कुल असर यह होता है कि "न्यायिक चरित्र के निर्माण की स्थितियां कमज़ोर होती हैं"।
कोर्ट ने यह भी कहा,
"बिना रोक-टोक और बिना मार्गदर्शन वाले अधिकार के इस्तेमाल का न्याय प्रशासन पर बहुत बुरा असर पड़ा है।"
इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला:
"हाईकोर्ट के प्रशासन का मौजूदा मॉडल चीफ जस्टिस पर केंद्रित है। इसे बदलकर एक ऐसे तरीके की ज़रूरत है जिसमें ज़्यादा विचार-विमर्श हो और संस्थागत रूप से संतुलन बना रहे।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि "प्रशासनिक मामलों में अन्य जजों की मामूली भूमिका" उन व्यापक प्रशासनिक सिद्धांतों के खिलाफ है, जो मिल-जुलकर फैसले लेने और संस्थागत जवाबदेही पर ज़ोर देते हैं।
84 कमेटियों के ज़रिए हाईकोर्ट का प्रशासन
कोर्ट ने उस कमेटी-आधारित ढांचे की भी समीक्षा की, जिसके ज़रिए अभी हाई कोर्ट का प्रशासनिक कामकाज होता है।
कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट का प्रशासनिक कामकाज अभी 84 कमेटियों के ज़रिए होता है और पिछले साढ़े तीन सालों में इनमें से ज़्यादातर कमेटियों की अध्यक्षता सिर्फ़ 2-3 सीनियर जजों ने की है, जो साथ ही साथ मुश्किल रोस्टर के तहत न्यायिक काम भी कर रहे थे।
कोर्ट की चिंता सिर्फ़ कमेटियों की संख्या को लेकर नहीं है, बल्कि प्रशासनिक ज़िम्मेदारियों के एक ही जगह केंद्रित होने को लेकर है।
कोर्ट ने देखा कि मौजूदा व्यवस्था से संस्था के प्रशासन में दूसरे जजों की असरदार भागीदारी पर सवाल उठते हैं।
कोर्ट ने ज़ोर दिया कि हाईकोर्ट सिर्फ़ पदानुक्रमित प्रशासनिक संगठन नहीं है। न्यायिक कामकाज करने में इसके सभी जज बराबर होते हैं, जबकि प्रशासनिक फैसले अलग-अलग जजों के कामकाज पर सीधा असर डाल सकते हैं। इसलिए कोर्ट ने हाईकोर्ट के प्रशासन में मिल-जुलकर फैसले लेने की प्रक्रिया के महत्व पर ज़ोर दिया।
कमेटी के फैसले और संस्थागत जवाबदेही
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि चीफ जस्टिस द्वारा बनाई गई कमेटियों की कार्यवाही का विवरण (मिनट्स) कभी भी 'फुल कोर्ट' (सभी जजों की बैठक) को नहीं बताया गया, जिससे ऐसा लगता है कि उनका कामकाज खुद हाई कोर्ट से स्वतंत्र है।
कोर्ट ने देखा कि इसके परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट में ऐसे मुद्दों को उठाने के लिए न्यायिक आदेशों के अलावा कोई संस्थागत मंच नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति जजों को एक ऐसे माहौल में "निराशाजनक पेशेवर जीवन जीने और उसे झेलने" पर मजबूर कर सकती है, जो न तो न्यायिक कामकाज के लिए अनुकूल है और न ही संस्था की गरिमा के अनुरूप है।
कोर्ट ने संस्थागत जांच-पड़ताल की ज़रूरत को न्यायपालिका की खुद को नियंत्रित करने वाली प्रकृति से भी जोड़ा।
कोर्ट ने कहा:
"न्यायपालिका, एक खुद को नियंत्रित करने वाली संस्था होने के नाते, अपने प्रशासनिक पक्ष पर प्रभावी जांच-पड़ताल और संतुलन बनाए रखे ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि प्रशासनिक विवेक का कभी भी दुरुपयोग न हो और इसका इस्तेमाल सख्ती से कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया और विधिवत अधिसूचित नियमों के अनुसार किया जाए।"
चीफ जस्टिस-केंद्रित प्रशासन पर कोर्ट की चिंता जवाबदेही के एक व्यापक सवाल से जुड़ी थी: जब कोई जज प्रशासनिक शक्ति का इस्तेमाल करता है तो क्या होता है। ऐसे फैसलों की जांच कौन करता है?
'जज का फैसला कौन करता है?'
फैसले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा जवाबदेही के सवाल की जांच करता है, जब जज न्यायिक शक्तियों के बजाय प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल करते हैं।
कोर्ट ने रोस्टर आवंटन, केस लिस्टिंग और समितियों के माध्यम से हाईकोर्ट के कामकाज के संचालन जैसे प्रशासनिक कार्यों का ज़िक्र किया और कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता को बनाए रखने के नाम पर ऐसी शक्तियां बाहरी या आंतरिक समीक्षा से अछूती रह सकती हैं।
कोर्ट ने कहा कि जहां न्यायिक फैसलों पर आमतौर पर अपील और समीक्षा हो सकती है, वहीं ऐसे प्रशासनिक फैसलों की उसी तरह से जांच नहीं हो सकती, भले ही निष्पक्षता, समानता और संस्थागत अखंडता पर उनके संभावित परिणाम हों।
इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने सवाल उठाया: जब कोई जज प्रशासनिक शक्ति का इस्तेमाल करता है तो "जज का फैसला कौन करता है"?
कोर्ट ने देखा कि औपचारिक समीक्षा संरचनाओं के अभाव में जज का फैसला करने का बोझ अनौपचारिक रूप से संस्था पर ही आ जाता है - "फुल-कोर्ट विचार-विमर्श, आंतरिक जांच-पड़ताल और तेज़ी से बढ़ती सार्वजनिक जांच-पड़ताल" के माध्यम से।
हालांकि, कोर्ट ने चेतावनी दी कि ऐसी बिखरी हुई जवाबदेही अक्सर अपर्याप्त होती है, और "स्पष्ट रूप से बताए गए प्रशासनिक मानकों, कारण बताने की बाध्यताओं और नियमों पर आधारित प्रक्रिया पर आधारित सीमित लेकिन सार्थक समीक्षा तंत्र" की मांग की। हालांकि, कोर्ट ने साफ़ किया कि उसकी टिप्पणियों का मकसद चीफ जस्टिस की "व्यक्तिगत संतुष्टि" की जांच करना या चीफ जस्टिस के ऑफिस के कामकाज पर कोई सवाल उठाना नहीं है।
कोर्ट ने कहा,
"इस कोर्ट की एकमात्र चिंता यह है कि हाईकोर्ट किस तरह से इलाहाबाद हाई कोर्ट नियम, 1952 के प्रावधानों की अनदेखी करते हुए अपने प्रशासनिक कामकाज करता है, और ज़्यादा पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ नियमों पर आधारित प्रक्रिया अपनाकर उन्हें बेहतर बनाने की ज़रूरत है।"
मामले की पृष्ठभूमि
यह व्यापक चर्चा तब शुरू हुई, जब कोर्ट निचली न्यायपालिका के कामकाज में समस्याओं को उजागर करने वाले चार मामलों पर सुनवाई कर रहा है।
एक अहम मुद्दा ज़मानत से जुड़े निर्देशों का लगातार पालन न करना है। फैसले में 1,65,930 ज़मानत आदेशों का ज़िक्र है जिनमें दो ज़मानतदारों (Sureties) की शर्त रखी गई, जबकि हाईकोर्ट ने 'श्रीमती बच्ची देवी बनाम यूपी राज्य' मामले में निर्देश जारी किए थे। कोर्ट ने ज़िला जजों द्वारा सौंपी गई अनुपालन रिपोर्ट में भी कमियां पाईं।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी समस्याओं को केवल अलग-अलग न्यायिक अधिकारियों के व्यक्तिगत आचरण के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि यह "सिर्फ़ किसी व्यक्ति की विशेषता नहीं है; यह संस्था के व्यवहार के तरीके को दर्शाता है"।
कोर्ट ने ज़ोर दिया कि न्यायिक चरित्र के लिए संस्थागत समर्थन की ज़रूरत होती है, जिसमें प्रशिक्षण और सीखने के लगातार कार्यक्रम, प्रशासनिक स्तर पर लिए गए फैसलों के लिए जवाबदेही तय करने की व्यवस्था, अनुशासन तोड़ने पर सुधारात्मक उपाय, और भाईचारे की भावना को बढ़ावा देने वाला पाठ्यक्रम शामिल है।
कोर्ट ने आगे कहा कि "हर प्रमोशन या पदोन्नति के बाद अनिवार्य प्रशिक्षण कार्यक्रम होना चाहिए" ताकि न्यायिक अधिकारी हर स्तर पर लिए गए फैसलों के नतीजों और समाज पर उनके असर को समझ सकें।
कोर्ट का रुख यह था कि खुद को नियंत्रित करने वाली न्यायपालिका को अपने प्रशासनिक पक्ष पर प्रभावी नियंत्रण और संतुलन बनाए रखना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि प्रशासनिक विवेक कानून और विधिवत अधिसूचित नियमों के अधीन रहे।
Case Title : Pappu Met @ Pappu vs. State of U.P. and Another 2026 LiveLaw (AB) 772

