क्या शादीशुदा ज़िंदगी के झगड़ों को POSH कार्यवाही में शामिल किया जा सकता है? इलाहाबाद हाईकोर्ट करेगा जांच, पति को दी राहत

Shahadat

13 Aug 2026 9:33 AM IST

  • क्या शादीशुदा ज़िंदगी के झगड़ों को POSH कार्यवाही में शामिल किया जा सकता है? इलाहाबाद हाईकोर्ट करेगा जांच, पति को दी राहत

    इलाहाबाद हाईकोर्ट इस बात की जांच करेगा कि क्या एक ही ऑफिस में काम करने वाले शादीशुदा जोड़े के बीच के झगड़े से जुड़ी कार्यवाही को 'कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013' (POSH Act) के दायरे में लाया जा सकता है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि इस कानून का मकसद कुछ और है।

    जस्टिस पंकज भाटिया की बेंच ने एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। इस व्यक्ति ने अपनी पत्नी की POSH Act के तहत की गई शिकायत के बाद जारी फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट और चार्ज-शीट को चुनौती दी थी।

    कोर्ट ने अगले आदेश तक उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही पर भी रोक लगाई।

    मामले का संक्षिप्त विवरण

    याचिकाकर्ता (पति) और प्रतिवादी नंबर 7 (पत्नी) शादीशुदा थे और एक ही ऑफिस में काम करते थे। आदेश के अनुसार, वे शुरू में पति-पत्नी के तौर पर साथ रहते थे।

    हालांकि, हेमकुंड साहिब की यात्रा के दौरान उनके बीच अनबन हो गई, जिसके बाद महिला ने POSH Act के तहत शिकायत दर्ज कराई।

    अपनी शिकायत में उसने आरोप लगाया कि 9 अक्टूबर, 2024 को याचिकाकर्ता, जो उसका सहकर्मी था, ने ऑफिस में दूसरों के सामने उसके खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया और अपमानजनक टिप्पणी की। हालांकि, शिकायत में उनके वैवाहिक स्थिति का खुलासा नहीं किया गया।

    कोर्ट ने यह भी गौर किया कि महिला ने साथ ही 28 दिसंबर, 2024 को एक FIR भी दर्ज कराई, जिसमें जाति-आधारित दुर्व्यवहार, दहेज की मांग, शारीरिक शोषण और मौखिक दुर्व्यवहार का आरोप लगाया गया। FIR में कहा गया कि जोड़े की शादी 11 मार्च, 2023 को हुई।

    POSH कमेटी की टिप्पणियां

    POSH कमेटी ने सबूतों पर विचार किया और दर्ज किया कि 9 अक्टूबर, 2024 की घटना से पहले ही जोड़े के बीच वैवाहिक कलह थी और उनके सहकर्मियों को उनकी शादी के बारे में पता चल गया।

    इसमें आगे कहा गया कि मैनेजमेंट "स्वतः संज्ञान लेकर उन्हें अलग-अलग ऑफिस में तैनात करने की कार्रवाई कर सकता था"। इसमें यह भी कहा गया कि वैवाहिक विवाद के कारण कार्यस्थल पर अपमानजनक व्यवहार नहीं होना चाहिए।

    समिति ने अपनी रिपोर्ट में दर्ज किया,

    "वैवाहिक झगड़े से इंसान अपनी निजी ज़िंदगी में तनाव या निराशा महसूस कर सकता है, लेकिन किसी को भी कार्यस्थल पर एक-दूसरे का अनादर करने का अधिकार नहीं है। यह समझना ज़रूरी है कि कार्यस्थल की गरिमा और मर्यादा बनाए रखी जानी चाहिए। अगर कोई महिला कर्मचारी उसी जगह पर किसी की पत्नी है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि पति उसे वैसे ही व्यवहार कर सकता है जैसा वह घर पर करता है (चाहे प्यार से या नफ़रत से)।"

    समिति ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता की लगातार बड़बड़ाहट और आपत्तिजनक टिप्पणियाँ POSH Act की धारा 2(n)(v) के दायरे में आती हैं। उसने यह भी दर्ज किया कि याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता का वॉलेट ले लिया था, यह मानते हुए कि पत्नी होने के नाते उसे उसकी मर्ज़ी के बिना उसका बैग खंगालने का अधिकार है।

    नतीजतन, समिति ने लागू आचरण, अनुशासन और अपील नियमों के तहत याचिकाकर्ता-पति के ख़िलाफ़ कार्रवाई की सिफारिश की।

    इसने पति और पत्नी दोनों के ख़िलाफ़ एक साल से ज़्यादा समय तक अपनी वैवाहिक स्थिति का खुलासा न करने के लिए भी कार्रवाई की सिफारिश की, जिसे लागू नियमों का उल्लंघन माना गया।

    पति ने हाईकोर्ट में इस कार्रवाई को चुनौती दी और तर्क दिया कि वैवाहिक कलह को POSH Act के दायरे में "घसीटा" गया और शिकायत तथा उसके बाद की कार्रवाई POSH Act और BNS प्रावधानों का दुरुपयोग है ताकि उससे "बदला लिया जा सके"।

    उसने तर्क दिया कि उसके ख़िलाफ़ प्रथम दृष्टया भी कोई मामला नहीं बनता।

    हालांकि, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि कार्यालय में याचिकाकर्ता के आचरण और जांच समिति द्वारा दर्ज निष्कर्षों को देखते हुए कार्रवाई उचित थी।

    पत्नी के वकील ने कहा कि भले ही POSH शिकायत में वैवाहिक स्थिति का खुलासा नहीं किया गया, लेकिन इसका POSH Act के तहत कार्रवाई पर "कोई बुरा असर" नहीं पड़ेगा।

    हाईकोर्ट की टिप्पणियां

    तर्कों पर विचार करने के बाद, हाई कोर्ट ने पाया कि यह मामला विचार करने योग्य सवाल उठाता है:

    "...प्रथम दृष्टया, इस मामले पर विचार करने की आवश्यकता है कि क्या वैवाहिक कलह से शुरू हुई और मुख्य रूप से उसी से जुड़ी कार्रवाई को POSH Act के प्रावधानों के तहत लाया जा सकता है, जो एक अलग उद्देश्य के लिए बनाया गया।"

    इसलिए कोर्ट ने प्रतिवादियों से 4 हफ़्ते के भीतर जवाबी हलफ़नामा और उसके बाद 2 हफ़्ते के भीतर प्रत्युत्तर (Rejoinder) मांगा। अगले आदेश तक कोर्ट ने निर्देश दिया कि पति-याचिकाकर्ता के खिलाफ चार्जशीट के आधार पर चल रही अनुशासनात्मक कार्यवाही पर रोक लगी रहेगी।

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