वर्चुअल सुनवाई कोई मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि कोर्ट की मर्ज़ी पर निर्भर सुविधा का मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Shahadat

10 Aug 2026 11:00 AM IST

  • वर्चुअल सुनवाई कोई मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि कोर्ट की मर्ज़ी पर निर्भर सुविधा का मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए पेश होना कोई मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह सिर्फ़ सुविधा का एक तरीका है जो कोर्ट की मर्ज़ी पर निर्भर करता है।

    जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी की बेंच ने यह बात तब कही, जब वे एक ऐसे याचिकाकर्ता (जो खुद अपना केस लड़ रहा था) के मामले की सुनवाई कर रहे थे, जो कोर्ट के पहले के आदेश के बावजूद कि उसे व्यक्तिगत रूप से पेश होना है, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए पेश हुआ था।

    कोर्ट ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए पेश होने के पूर्ण अधिकार के याचिकाकर्ता के दावे को खारिज किया और कहा कि इस तरह पेश होने का मकसद सिर्फ़ मुक़दमेबाज़ या वकील की सुविधा और मामले के निपटारे में तेज़ी लाना है।

    कोर्ट ने कहा,

    "वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए पेश होना सिर्फ़ मुक़दमेबाज़ या वकील की सुविधा और मामले के निपटारे में तेज़ी लाने के लिए है। इसे अधिकार के तौर पर नहीं मांगा जा सकता। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की इजाज़त देना या न देना कोर्ट की मर्ज़ी पर निर्भर करता है।"

    बेंच ने आगे साफ़ किया कि अगर कोर्ट व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश देती है तो बिना किसी बेतुके बहाने के उसका पालन करना होगा।

    यह टिप्पणी वेमुला वेंकटा विनय बाबू उर्फ़ विनय वेमुला द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई, जिन्होंने उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

    यह रिट याचिका शुरू में 5 जनवरी, 2024 को एक वकील के ज़रिए दायर की गई। बाद में याचिकाकर्ता ने व्यक्तिगत रूप से पेश होने की इजाज़त मांगी और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए पेश होने की भी गुज़ारिश की।

    कोर्ट ने गौर किया कि हालांकि 8 मई, 2025 को अर्ज़ी का निपटारा कर दिया गया, लेकिन याचिकाकर्ता के वकील को कार्यमुक्त नहीं किया गया और न ही याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत रूप से या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए पेश होने की कोई इजाज़त दी गई।

    24 जुलाई, 2026 को कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि जब मामले की अंतिम सुनवाई हो तो वह व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में मौजूद रहे। हालांकि, जब मामले की सुनवाई हुई तो वह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए पेश हुआ, जिसे कोर्ट ने अपने पिछले आदेश का उल्लंघन माना।

    याचिकाकर्ता ने ज़ोर देकर कहा कि वह व्यक्तिगत रूप से पेश नहीं होगा, क्योंकि उसे लगभग 2,000 किलोमीटर की यात्रा करनी थी और उसे लॉजिस्टिक्स (आवागमन/व्यवस्था) संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। हालांकि, कोर्ट ने देखा कि याचिकाकर्ता को पता था कि वह 'स्टेट लीगल सर्विसेज़ अथॉरिटी' की मदद ले सकता है और उसके मामले की सुनवाई एक तय तारीख और समय पर हो सकती है।

    कोर्ट ने पाया,

    "बिना किसी ठोस वजह के वह बस कोर्ट में पेश होने से बचना चाहता है।"

    बेंच ने यह भी देखा कि याचिकाकर्ता पहले भी लगभग 4-5 बार इलाहाबाद आ चुका है। कोर्ट ने कहा कि अगर वह खुद पेश होता है तो कोर्ट उसकी तरफ से केस की पैरवी के लिए एक वकील नियुक्त कर सकता है।

    हालांकि, जस्टिस शमशेरी ने देखा कि याचिकाकर्ता अपनी बात पर अड़ा रहा और "लॉजिस्टिक्स (आने-जाने/व्यवस्था) से जुड़ी दिक्कतों का हवाला देते हुए इस कोर्ट के सामने पेश होने से साफ इनकार कर दिया"।

    कोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा रिकॉर्ड पर रखे गए एक ईमेल पर भी ध्यान दिया, जिसका शीर्षक था "विरोध का औपचारिक लिखित घोषणापत्र" (Formal Written Declaration of Protest)।

    कोर्ट ने पाया कि इस दस्तावेज़ के साथ ओथ कमिश्नर या नोटरी से कोई वेरिफिकेशन नहीं था और इसके शीर्षक को "न केवल अस्पष्ट, बल्कि कोर्ट की अवमानना ​​करने वाला" भी पाया।

    कोर्ट ने देखा कि याचिकाकर्ता ने दस्तावेज़ में दावा किया कि वर्चुअल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग उसका मौलिक अधिकार है।

    कोर्ट ने फिर से कहा,

    "जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है, यह कोई मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि कोर्ट की मर्जी पर निर्भर एक सुविधा है"।

    कोर्ट की ये टिप्पणियां ऐसे समय में आईं जब याचिकाकर्ता उसी मामले की कोर्ट कार्यवाही के संबंध में 'सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005' (RTI Act) के तहत बार-बार आवेदन दाखिल कर रहा था।

    कोर्ट ने पहले भी देखा था कि याचिकाकर्ता ने कोर्ट की कार्यवाही से जुड़ी जानकारी मांगने के लिए कई RTI आवेदन दाखिल किए और पाया कि ऐसे आवेदनों से "न्याय प्रशासन में बाधा आएगी"।

    कोर्ट ने निर्देश दिया कि ऐसी कोई भी लंबित RTI कार्यवाही रोक दी जाए और याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि जब तक मामले का अंतिम फैसला न हो जाए, वह RTI Act के तहत ऐसा कोई आवेदन दाखिल न करे।

    हालांकि, डिप्टी रजिस्ट्रार (RTI) द्वारा सौंपी गई एक रिपोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ता ने बाद में 4 जून और 17 जुलाई, 2026 के बीच 24 RTI आवेदन दाखिल किए, जिनमें ऐसी मांगें की गई थीं जिन्हें कोर्ट ने अस्पष्ट बताया।

    इन आवेदनों में अन्य चीज़ों के अलावा, ऑफिस के अंदर की नोट शीट, रूटिंग शीट, की गई कार्रवाई की रिपोर्ट (Action Taken Reports), फ़ाइल मूवमेंट रजिस्टर, कोर्टरूम में हाज़िरी के रजिस्टर, बेंच सेक्रेटरी की लॉग एंट्री, सिस्को वेबएक्स सेशन लॉग, बैकएंड सर्वर रिकॉर्ड, अस्थायी रोस्टर व्यवस्था, सप्लीमेंट्री कॉज़ लिस्ट (अतिरिक्त मामलों की सूची) के कारण और मामलों को "पास ओवर" (बाद के लिए टालने) के कारण जैसी जानकारी मांगी गई।

    कोर्ट ने कहा कि ऐसे आवेदन "न केवल कोर्ट के कर्मचारियों का समय बर्बाद करते हैं, बल्कि न्याय प्रशासन में भी बाधा डालते हैं"।

    यह पाते हुए कि याचिकाकर्ता "सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act) के प्रावधानों का गलत इस्तेमाल कर रहा था", कोर्ट ने सभी आवेदनों को रिकॉर्ड में रखने का निर्देश दिया और 24 आवेदनों में से प्रत्येक पर ₹5,000 का जुर्माना लगाया, जो कुल मिलाकर ₹1.20 लाख होता है।

    बेंच ने सुप्रीम कोर्ट, विभिन्न हाईकोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट की हालिया घटनाओं पर भी ध्यान दिया, जहां याचिकाकर्ता (जो खुद अपनी पैरवी कर रहा था) ने, कोर्ट के अनुसार, कोर्ट की मर्यादा का पालन नहीं किया और "जल्दबाजी और अनियंत्रित तरीके" से व्यवहार किया।

    कोर्ट ने यह भी देखा कि वीडियो रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल "कोर्ट की छवि खराब करने" के लिए किया गया।

    कोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा दायर एक आवेदन को भी ₹50,000 के जुर्माने के साथ खारिज किया, जिसमें प्रतिवादियों को कथित तौर पर जवाबी हलफनामा (Counter Affidavit) दाखिल न करने के लिए दंडित करने की मांग की गई। कोर्ट ने पाया कि यह आवेदन न केवल गलत सोच पर आधारित था, बल्कि गलत बयान पर आधारित था और रिकॉर्ड के भी खिलाफ था।

    मुख्य रिट याचिका के संबंध में कोर्ट ने पाया कि RTI Act के तहत मांगी गई जानकारी याचिकाकर्ता को पहले ही रजिस्टर्ड पोस्ट के माध्यम से दी जा चुकी थी और उसने न तो इसे प्राप्त करने से इनकार किया और न ही दी गई जानकारी को रिकॉर्ड पर रखा था।

    कोर्ट ने कहा कि एक बार जब ज़रूरी जानकारी दी जा चुकी है तो याचिकाकर्ता ऐसी जानकारी देने पर ज़ोर नहीं दे सकता जो संबंधित अधिकारियों के पास उपलब्ध ही नहीं है।

    इसलिए उसे राज्य सूचना आयोग के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं मिला और रिट याचिका खारिज की।

    इसके बाद कोर्ट ने "याचिकाकर्ता जैसे लोगों को कोर्ट की कार्यवाही और न्याय प्रशासन में बाधा डालने से रोकने" के लिए ₹5 लाख का अतिरिक्त जुर्माना लगाया।

    इस प्रकार, कुल जुर्माना ₹6.70 लाख हो गया, जिसमें ₹50,000, ₹1.20 लाख और ₹5 लाख शामिल हैं। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को चार हफ़्ते के अंदर हाईकोर्ट लीगल सर्विस कमिटी के बैंक अकाउंट में रकम जमा करने का निर्देश दिया; ऐसा न करने पर रजिस्ट्रार जनरल को उचित कदम उठाने का निर्देश दिया गया।

    Case Title - Vemula Venkata Vinay Babu Alias Vinay Vemula vs. State of U.P. and 3 others 2026 LiveLaw (AB) 542

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