राज्य के आकार और जनसंख्या को देखते हुए यूपी की फोरेंसिक लैब का बुनियादी ढांचा अपर्याप्त: हाईकोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा
Shahadat
28 Oct 2026 8:28 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ्ते कहा कि राज्य में केवल 1 स्टेट फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) और 12 रीजनल FSL हैं। कोर्ट ने माना कि उत्तर प्रदेश के आकार और जनसंख्या को देखते हुए यहां का मौजूदा फोरेंसिक लैब इंफ्रास्ट्रक्चर 'अपर्याप्त' है।
जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्र की बेंच ने उत्तर प्रदेश की फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी के निदेशक को निर्देश दिया कि वे 4 सप्ताह के भीतर इस मुद्दे पर एक विस्तृत जवाब (काउंटर-एफिडेविट) दाखिल करें।
यह आदेश वकील पीयूष गुप्ता द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर दिया गया। अपनी याचिका में उन्होंने फोरेंसिक जांच के लिए समय-सीमा तय करने और और अधिक लैब स्थापित करने की मांग की।
उत्तर प्रदेश में फोरेंसिक लैब की संख्या का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा,
"राज्य के मौजूदा आकार और जनसंख्या को देखते हुए यह संख्या अपर्याप्त है।"
याचिका में राज्य के अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई कि वे फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी में आने वाले नमूनों (सैंपल्स) की जांच और रिपोर्ट भेजने के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) बनाएं और उसे अधिसूचित करें। इसमें अलग-अलग श्रेणियों के हिसाब से समय-सीमा (डेडलाइन) भी तय होनी चाहिए।
याचिकाकर्ता ने फोरेंसिक जांच के लिए श्रेणी-वार समय-सीमा तय करने की मांग की है, जिसकी गणना लैब में सैंपल मिलने की तारीख से की जाएगी।
याचिका में यह भी मांग की गई कि जिन मामलों में आरोपी हिरासत में हैं, या जो मामले BNSS की धारा 193(2) के अंतर्गत आते हैं, उनमें नमूनों की जांच के लिए कम समय-सीमा तय की जाए या उन्हें प्राथमिकता के आधार पर प्रोसेस किया जाए।
इसके अलावा, यह भी मांग की गई कि यदि तय समय-सीमा के भीतर काम पूरा नहीं होता है, तो निदेशक को लिखित रूप में इसका कारण दर्ज करना चाहिए। साथ ही ऐसे मामलों को समय-समय पर किसी नामित अधिकारी के सामने पेश करने की व्यवस्था भी होनी चाहिए।
याचिका में राज्य सरकार को और अधिक फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी स्थापित करने का निर्देश देने की भी मांग की गई, ताकि "आपराधिक न्याय प्रणाली (क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम) कुशलतापूर्वक और आसानी से काम कर सके।"
कोर्ट ने गौर किया कि याचिकाकर्ता ने फोरेंसिक रिपोर्ट में देरी को लेकर चिंता जताई। इस देरी का असर उन लोगों पर पड़ता है जो हिरासत में हैं और मुकदमे का इंतजार कर रहे हैं। साथ ही गंभीर अपराधों के पीड़ितों और उनके परिवारों पर भी इसका बुरा असर पड़ता है।
कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि यह याचिका उन मामलों से जुड़ी है, जहां आरोपी हिरासत में हैं, और जब तक फोरेंसिक रिपोर्ट नहीं आ जाती, तब तक उनके मामले में आगे की कार्यवाही नहीं हो पाती। इसमें बलात्कार, हत्या और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े उन मामलों की ओर भी इशारा किया गया, जिनमें ठोस वैज्ञानिक सबूतों की कमी के कारण मुकदमा विफल हो सकता है।
याचिकाकर्ता के वकील ने 17 दिसंबर, 2024 को लोकसभा में 'अनस्टार्टेड' (बिना तारांकित) प्रश्न के जवाब में गृह मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी का हवाला दिया, जिसमें राज्य-वार फोरेंसिक प्रयोगशालाओं का विवरण शामिल था।
मामले पर विचार करने की आवश्यकता को देखते हुए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश (लखनऊ) की FSL (फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी) के निदेशक को चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।
यह मामला 30 नवंबर से शुरू होने वाले सप्ताह के लिए सूचीबद्ध किया गया।

