धोखाधड़ी न होने पर योग्यता की कमी के आधार पर 29 साल बाद शिक्षक की नियुक्ति रद्द नहीं की जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
10 Aug 2026 6:24 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐसे शिक्षक की अपील को मंज़ूरी दी, जिसकी योग्यता पर लगातार 29 साल की सेवा के बाद सवाल उठाया गया था। कोर्ट ने कहा कि इंटरमीडिएट एजुकेशन एक्ट की धारा 16-E(10) के तहत नियुक्ति रद्द करने की शक्ति का इस्तेमाल बहुत देर से नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि वह हाईकोर्ट की फुल बेंच के उस फ़ैसले से बंधा हुआ है, जो 'डॉ. आशा सक्सेना बनाम श्रीमती एस. के. चौधरी और अन्य' मामले में दिया गया। उस मामले में लगभग 17 साल बीत जाने के बाद इसी शक्ति का इस्तेमाल मनमाना माना गया।
उसी फ़ैसले का हवाला देते हुए जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की बेंच ने कहा,
"उसमें यह कहा गया कि एक्ट की धारा 16E(10) के तहत शक्ति का इस्तेमाल (उस मामले में) लगभग 17 साल बीत जाने के बाद बहुत देर से नहीं किया जा सकता। चूंकि यह एक बड़ी बेंच का फ़ैसला है, जिसने रिट याचिका पर निर्णय दिया था, इसलिए यह हम पर भी लागू होता है।"
अपीलकर्ता के पास बैचलर ऑफ़ आर्ट्स की डिग्री के साथ 'शिक्षा अलंकार' की अतिरिक्त योग्यता है। इसे B.Ed. डिग्री के बराबर मानते हुए उन्होंने अलीगढ़ ज़िले के श्री गांधी स्मारक इंटर कॉलेज, बाझेडा भरतपुर में एड-हॉक LT ग्रेड शिक्षक के पद के लिए आवेदन किया और 28 जुलाई 1992 को उनकी नियुक्ति हो गई।
जब उन्हें वेतन नहीं दिया गया तो वह हाईकोर्ट गए। कोर्ट ने उनके काम करने के अधिकार की रक्षा की और अंतरिम आदेश के ज़रिए वेतन भुगतान का निर्देश दिया। उस याचिका का निपटारा 2004 में हुआ और अलीगढ़ के संयुक्त शिक्षा निदेशक को उनके लंबित नियमितीकरण के दावे पर फ़ैसला करने का निर्देश दिया गया।
उन्हें सेवा में नियमित किया गया और 27 फरवरी 2013 को सेकेंडरी एजुकेशन सर्विसेज़ सिलेक्शन बोर्ड एक्ट, 1982 की धारा 33-C के तहत नियुक्त किया गया और 3 अप्रैल 2017 को लेक्चरर ग्रेड में प्रमोट किया गया। संस्थान में 29 साल तक सेवा देने के बाद 24 नवंबर 2021 को उनके खिलाफ इंटरमीडिएट एजुकेशन एक्ट की धारा 16-E(10) के तहत कार्रवाई शुरू की गई। यह कार्रवाई रेस्पॉन्डेंट नंबर 6 की शिकायत पर की गई कि मूल नियुक्ति के समय उनके पास B.Ed. की ज़रूरी योग्यता नहीं है।
सिंगल जज ने 'दिनेश कुमार सिंह बनाम यूपी राज्य व अन्य' मामले का हवाला देते हुए उनकी रिट याचिका का निपटारा किया। कोर्ट ने माना कि असिस्टेंट टीचर के तौर पर नियुक्ति के लिए 'शिक्षा अलंकार' कोई मान्य योग्यता नहीं थी और नियुक्ति नियमों के खिलाफ थी। उन्हें यह छूट दी गई कि अगर सैलरी की रिकवरी के लिए कोई कार्रवाई की जाती है तो वे कानूनी रूप से मान्य उपाय अपना सकते हैं। उस आदेश को इंट्रा-कोर्ट अपील में चुनौती दी गई।
अपीलकर्ता के वकील ने कहा कि भले ही 'सूर्य प्रकाश पांडे बनाम यूपी राज्य व अन्य' मामले में एक कोऑर्डिनेट बेंच ने उनके खिलाफ़ इक्विवेलेंस (योग्यता की समानता) का फैसला सुनाया, फिर भी उन्हें नौकरी के आखिरी समय में नौकरी से नहीं निकाला जा सकता और न ही लगभग तीन दशकों के काम के फायदों से वंचित किया जा सकता है। यह तर्क दिया गया कि धोखाधड़ी, जानकारी छिपाने या मिलीभगत का कोई आरोप नहीं है, और राज्य ने जान-बूझकर उनकी सैलरी के भुगतान के लिए वित्तीय मंज़ूरी दी थी, उन्हें रेगुलर किया था और प्रमोट किया।
स्टैंडिंग काउंसिल ने तर्क दिया कि इक्विवेलेंस का मुद्दा सुलझ चुका था और 'विनोद कुमार उपाध्याय बनाम यूपी राज्य व अन्य' मामले में उस डिग्री के आधार पर नियुक्त सभी शिक्षकों को हटाने का निर्देश अंतिम हो चुका था। यह तर्क दिया गया कि 'दिनेश कुमार सिंह' मामले में 30 साल बाद सेवाएँ समाप्त कर दी गईं।
कोर्ट ने देखा कि 'दिनेश कुमार सिंह' मामले में कोऑर्डिनेट बेंच ने इसी तरह के विवाद पर विचार किया, लेकिन वहां इस्तेमाल की गई शक्ति एक्ट की धारा 16-E(10) से संबंधित नहीं थी। कोर्ट ने माना कि अगर इस मुद्दे पर वही एकमात्र कानून होता तो वह उससे बंधा होता और बड़ी बेंच को रेफर करना ही एकमात्र रास्ता होता।
कोर्ट ने गौर किया कि जब 2013 में एक सकारात्मक आदेश के ज़रिए अपील करने वाले को रेगुलर किया गया, या जब चार साल बाद उन्हें प्रमोट किया गया था, तब उनकी योग्यता पर कोई आपत्ति नहीं उठाई गई। कोर्ट ने इस बात पर संदेह जताया कि क्या राज्य के अधिकारी इतनी देर बाद धारा 16-E(10) के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं।
आगे कहा गया,
“इसलिए मौजूदा तथ्यों को देखते हुए राज्य के अधिकारियों को न केवल जानकारी थी, बल्कि उनसे यह उम्मीद भी की जाती है कि उन्होंने उस समय मूल याचिकाकर्ता-अपीलकर्ता की योग्यताओं पर विचार किया होगा।”
इस दलील को खारिज करते हुए कि डॉ. आशा सक्सेना मामले में फुल बेंच एक अलग रेफरेंस पर विचार कर रही थी, कोर्ट ने कहा कि उसने खुद रिट याचिका का फैसला किया, न कि सिर्फ कानून के किसी रेफर किए गए सवाल का, और देरी के मुद्दे की साफ तौर पर जांच की थी।
कोर्ट ने कहा,
"एक बार जब बड़ी बेंच ने खुद रिट याचिका का फैसला किया तो उसमें दिया गया सिद्धांत इस कोर्ट द्वारा घोषित बाध्यकारी कानून है। ऐसे में दिनेश कुमार सिंह (ऊपर बताए गए) मामले में किसी समान बेंच द्वारा लिया गया विपरीत नजरिया - वह भी समान बेंचों के बाध्यकारी फैसलों की अनदेखी करके - हम पर बाध्यकारी नहीं हो सकता।"
कोर्ट ने माना कि फुल बेंच का नजरिया राधेश्याम यादव और अन्य बनाम यूपी राज्य और अन्य मामले के अनुरूप है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने अचानक वेतन रोकने को गलत बताया था और अपीलकर्ताओं को सेवा में माना है।
कोर्ट ने माना कि मौजूदा मामले में 29 साल की सेवा के दौरान कोई जांच नहीं हुई, और अपीलकर्ता को रेगुलराइजेशन और उसके बाद प्रमोशन के लिए योग्य पाया गया।
यह देखते हुए कि अपीलकर्ता ने न तो अधिकारियों को गुमराह किया और न ही कोई धोखा दिया, कोर्ट ने कहा,
"यह नजरिया अपनाते हुए हमें लगता है कि एक इंसान की जिंदगी में, जो एक सीधी समय-रेखा में चलती है, कोई भी घड़ी की सुई पीछे नहीं घुमा सकता। निश्चित रूप से दशकों पीछे तो बिल्कुल नहीं।
अगर किसी नागरिक ने अपनी आजीविका कमाने - जो जीवन की यात्रा जारी रखने के लिए जरूरी है - के लिए ऐसी नौकरी पाने की कोशिश करते समय अधिकारियों को गुमराह नहीं किया या धोखाधड़ी या धोखा नहीं किया है तो हम नियोक्ताओं, खासकर सरकारी एजेंसियों को जीवन के उस जरूरी पहलू से आंखें मूंदने की इजाजत नहीं दे सकते। ऐसे मामलों में कानूनी रूप से सही समाधान देने की कोशिश में भले ही हम कानून के अनुरूप होने की उम्मीद करें, लेकिन हम न्याय से मीलों दूर हो सकते हैं। ऐसा हम नहीं कर सकते।"
सिंगल जज के आदेश को सिद्धांत के तौर पर गलत और फुल बेंच द्वारा तय कानून के खिलाफ मानते हुए कोर्ट ने उसे रद्द कर दिया और अपील को मंजूर कर लिया।
Case Title: Devendra Kumar Agrawal v. State Of U.P. And 5 Others


