बिना चुनौती वाले सैलरी पेमेंट के आदेश से जाली मंज़ूरी पर आधारित नियुक्ति सही नहीं ठहराई जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

  • बिना चुनौती वाले सैलरी पेमेंट के आदेश से जाली मंज़ूरी पर आधारित नियुक्ति सही नहीं ठहराई जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सैलरी पेमेंट का प्रशासनिक आदेश सरकारी खजाने से सैलरी पाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं देता, भले ही उस आदेश को कभी चुनौती न दी गई हो या रद्द न किया गया हो, अगर वह मंज़ूरी का आदेश जिस पर नियुक्ति आधारित है, बाद में जाली पाया जाता है।

    कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक आदेश की अंतिम प्रकृति (Finality) उस आधार की वैधता से अलग है जिस पर सरकारी खजाने के खिलाफ़ कोई आर्थिक दावा किया जाता है।

    जस्टिस मंजू रानी चौहान ने कहा,

    “किसी ऐसे दस्तावेज़ पर आधारित अधिकार को बनाए रखने के लिए अंतिम प्रकृति (Finality) का सहारा नहीं लिया जा सकता, जो इस कोर्ट के आदेश के बाद मूल रिकॉर्ड की जांच में जाली पाया गया हो। कोई प्रशासनिक आदेश उस चीज़ को सही नहीं ठहरा सकता जिसकी कानून इजाज़त नहीं देता, और न ही यह कोई मंज़ूरशुदा पद बना सकता है जो पहले से मौजूद नहीं था।”

    याचिकाकर्ता को संत कबीर नगर ज़िले के एक मान्यता प्राप्त और सहायता प्राप्त जूनियर हाईस्कूल की मैनेजमेंट कमेटी द्वारा 01.07.1977 को सीटी-ग्रेड में असिस्टेंट टीचर के तौर पर नियुक्त किया गया। साथ ही उनके चयन को ज़िला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने 29.07.1982 को मंज़ूरी दी। जब यह संस्थान 01.03.1991 से ग्रांट-इन-एड स्कीम के दायरे में आया तो मैनेजर की रिपोर्ट में उनका नाम छूट गया। उत्तर प्रदेश जूनियर हाई स्कूल (शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों की सैलरी का भुगतान) एक्ट, 1978 की धारा 10 के तहत सरकारी खजाने से सैलरी पेमेंट का आदेश (21.06.1997) भी उन्हें शामिल नहीं कर पाया।

    उनकी अर्जियों पर कोई फ़ैसला न होने पर याचिकाकर्ता ने 1998 में हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और उनके निपटारे के लिए आदेश हासिल किया। इसके बाद ज़िला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने सर्विस रिकॉर्ड मंगाए और दावे से संतुष्ट होकर 09.03.2000 को 01.03.1991 से सैलरी पेमेंट का आदेश जारी किया। फाइनेंस और अकाउंट्स ऑफिसर ने बिल को मंज़ूरी देने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि उनसे सलाह नहीं ली गई और चौदह मंज़ूर पदों के मुकाबले पहले ही पंद्रह लोगों के लिए मंज़ूरी दी जा चुकी थी।

    एक दूसरी रिट याचिका का निपटारा 25.02.2014 को किया गया। इसमें शिक्षा निदेशक (बेसिक) को निर्देश दिया गया कि वे याचिकाकर्ता की बात सुनने के बाद तर्कपूर्ण आदेश के ज़रिए दावे पर फ़ैसला करें। इस प्रक्रिया के बाद 02.06.2015 का विवादित आदेश जारी हुआ।

    याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उसी मंज़ूरी आदेश के दायरे में आने वाले उनसे जूनियर शिक्षकों ने संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करते हुए राज्य के खजाने से लगातार वेतन लिया। उन्होंने कहा कि विवादित आदेश में विरोधाभास था; एक तरफ़ तो मंज़ूरी आदेश के लिए डिस्पैच रजिस्टर की एंट्री को माना गया, लेकिन दूसरी तरफ़ उनका दावा खारिज कर दिया गया, क्योंकि रिकॉर्ड ही नहीं मिल रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि 09.03.2000 का आदेश कभी रद्द नहीं किया गया और वह अंतिम रूप ले चुका है।

    राज्य का तर्क था कि संस्थान में कभी कोई पद बनाया या मंज़ूर नहीं किया गया, जैसा कि मैनेजर ने खुद 01.04.2015 के अपने पत्र में लिखा था, और 29.07.1982 का मंज़ूरी आदेश जाली और मनगढ़ंत है। इसे कभी निदेशक के सामने पेश नहीं किया गया और यह केवल डिस्पैच रजिस्टर की एंट्री के रूप में ही मौजूद है।

    यह तर्क दिया गया कि मंज़ूरी आदेश में तेरह असिस्टेंट टीचर और तीन चपरासियों को मंज़ूरी देने की बात कही गई, जबकि उस समय केवल तीन चपरासियों के पद ही मंज़ूर थे। बाद में 30.12.1987 के आदेश से असल काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या के आधार पर तीन चपरासियों और नौ असिस्टेंट टीचरों को नए सिरे से मंज़ूरी दी गई। याचिकाकर्ता का नाम न तो 11.10.2010 की वर्किंग-स्ट्रेंथ स्टेटमेंट में था और न ही 07.03.2011 की इंस्पेक्शन रिपोर्ट में; साथ ही, मैनेजर के पत्र में यह दर्ज था कि उसने केवल 2005 तक ही काम किया।

    कोर्ट ने माना कि यह मामला किसी कानूनी नियुक्ति में मामूली कमी का नहीं, बल्कि नियुक्ति के मूल आधार के ही विफल होने का था। एक बार जब मूल दस्तावेज़ को जाली पाया गया तो उस पर खड़ी की गई पूरी व्यवस्था समय बीतने, वास्तव में काम करने या वेतन/भत्ते पाने से वैध नहीं हो सकती।

    कोर्ट ने आर. विश्वनाथ पिल्लई बनाम केरल राज्य, भारत संघ बनाम एम. भास्करन, अवतार सिंह बनाम भारत संघ और बिहार राज्य बनाम देवेंद्र शर्मा के मामलों का हवाला देते हुए कहा कि धोखाधड़ी या जाली दस्तावेज़ों से हासिल की गई नियुक्ति शुरुआत से ही अमान्य (Void) होती है। कोर्ट ने यह भी माना कि वेतन और सेवा लाभ का अधिकार एक वैध नियुक्ति पर निर्भर करता है। सेवा में बने रहने से नियोक्ता (Employer) के खिलाफ कोई इक्विटी या एस्टॉपेल (Estoppel) का अधिकार पैदा नहीं होता है।

    कोर्ट ने कहा,

    “सरकारी खजाने से मिलने वाली सैलरी किसी पद पर बैठने मात्र से मिलने वाला इनाम नहीं है; यह विधिवत स्वीकृत पद पर कानूनी नियुक्ति का एक वैधानिक परिणाम है।”

    अंतिम निर्णय (Finality) के आधार पर दी गई दलील पर कोर्ट ने कहा कि 09.03.2000 के आदेश से पहले न तो पद के सृजन से संबंधित रिकॉर्ड या 29.07.1982 की मंजूरी की असलियत की कोई जांच की गई, और न ही वित्त और लेखा अधिकारी से कोई सलाह ली गई थी; इसलिए इसे नियुक्ति को सही ठहराने वाला कोई न्यायिक निर्णय नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि डायरेक्टर की बाद की जांच, अंतिम हो चुके आदेश की कोई ऐसी समीक्षा नहीं थी, जिसकी इजाज़त न हो, बल्कि यह उस आदेश पर फिर से विचार करना था, जिसका निर्देश खुद हाईकोर्ट ने दिया।

    इस संबंध में कोर्ट ने कहा,

    “अंतिम निर्णय (Finality) किसी प्रशासनिक आदेश को मनमाने ढंग से नजरअंदाज करने या अपनी मर्जी से फिर से खोलने से रोकता है। हालांकि, यह न तो कोई स्वीकृत पद बनाता है, जहां कोई पद स्थापित ही न हो, न ही बाद में जाली पाए गए किसी दस्तावेज को सही ठहराता है, और न ही किसी अथॉरिटी को ऐसी जांच करने से रोकता है, जिसका निर्देश खुद इस कोर्ट ने स्पष्ट रूप से दिया हो।”

    इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि जब संस्थान 'ग्रांट-इन-एड' (सरकारी सहायता) व्यवस्था में शामिल हुआ, तब तैयार की गई सूची में याचिकाकर्ता का नाम नहीं था; मैनेजर ने कहा कि उसने 2005 के बाद काम करना बंद कर दिया। ऐसा कुछ भी पेश नहीं किया गया जिससे यह साबित हो सके कि उसने उसके बाद भी किसी स्वीकृत पद पर काम जारी रखा।

    चुनौती दिए गए आदेश में कोई मनमानी, अधिकार-क्षेत्र की गलती, प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन या स्पष्ट गैर-कानूनी बात न पाते हुए, कोर्ट ने रिट याचिका खारिज की।

    Case Title : Shitala Prasad v. State of U.P. and 3 others

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