अर्ध-न्यायिक आदेश रद्द करने से ही उस अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हो सकती, जिसने उसे पारित किया था: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Shahadat

25 Aug 2026 8:30 PM IST

  • अर्ध-न्यायिक आदेश रद्द करने से ही उस अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हो सकती, जिसने उसे पारित किया था: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि रिट कोर्ट द्वारा किसी अर्ध-न्यायिक आदेश रद्द करने से ही उस अधिकारी के खिलाफ 'ऑल इंडिया सर्विसेज (कंडक्ट) रूल्स, 1968' के तहत अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने का आधार नहीं बनता, जिसने वह आदेश पारित किया। ऐसी कार्यवाही का निर्देश तभी दिया जा सकता है जब स्पष्ट, ठोस और सत्यापन योग्य तथ्य कदाचार को साबित करें।

    जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की बेंच ने कहा,

    "हम पाते हैं कि किसी सफल रिट याचिका के मामले में, जहां निचली अथॉरिटी का आदेश रद्द कर दिया जाता है तो केवल इसलिए अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती कि संबंधित अथॉरिटी ने कानून के विपरीत, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए या किसी अन्य कानूनी खामी के साथ कोई आदेश पारित किया था।"

    याचिकाकर्ता ने यूपी ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 229B के तहत एक मुकदमा दायर किया, जिसका फैसला 15 नवंबर 2021 को हुआ था। महाबोधि सोसाइटी ऑफ़ इंडिया ने अधिनियम की धारा 331 के तहत कमिश्नर, देवी पाटन डिवीजन, गोंडा के समक्ष अपील दायर की, जिसे देरी की माफ़ी (Condonation of Delay) के बिना स्वीकार कर लिया गया और 26 जून 2024 को एक अंतरिम आदेश पारित किया गया।

    उस आदेश को हाईकोर्ट ने पिछली रिट याचिका में रद्द कर दिया, जिसमें यह दर्ज किया गया कि अपील को बिना नोटिस के सुना गया और कमिश्नर के पिता अपीलकर्ता सोसाइटी के अध्यक्ष थे। अपील को अतिरिक्त कमिश्नर (प्रशासन), गोंडा को स्थानांतरित कर दिया गया।

    इसके बाद याचिकाकर्ता ने राज्य से कमिश्नर के खिलाफ 1968 के नियमों के तहत विभागीय जांच शुरू करने का निर्देश देने की मांग की, इस आधार पर कि आदेश उसे सुने बिना पारित किया गया और यह सेवा के हर सदस्य के लिए ईमानदारी बनाए रखने और सेवा के अनुरूप न होने वाला कोई भी काम न करने के दायित्व का उल्लंघन था।

    प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि आदेश अधिनियम की धारा 331 के तहत न्यायिक या अर्ध-न्यायिक शक्ति का प्रयोग करते हुए पारित किया गया और अनुच्छेद 226 के तहत रिट कोर्ट द्वारा हस्तक्षेप से स्वतः ही अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हो सकती। यह तर्क दिया गया कि यदि किसी उच्च फोरम द्वारा रद्द किए गए हर आदेश से ऐसी कार्यवाही शुरू होती तो कोई भी अथॉरिटी किसी विवाद का फैसला नहीं कर पाती।

    कोर्ट ने कहा कि जब याचिकाकर्ता ने 26 जून 2024 के आदेश को चुनौती दी थी तो वह यह तर्क दे सकता था कि यह आदेश दुर्भावनापूर्ण था या बाहरी कारणों से पारित किया गया, और रिट कोर्ट ने कमिश्नर के खिलाफ कोई टिप्पणी नहीं की। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि बाद की एक याचिका में याचिकाकर्ता ने खुद ही पार्टियों की सूची से कमिश्नर का नाम हटाने का अनुरोध किया।

    यह मानते हुए कि ऐसे निर्देश हल्के-फुल्के ढंग से नहीं दिए जा सकते, कोर्ट को कदाचार के आरोप का समर्थन करने के लिए रिकॉर्ड पर कोई सबूत नहीं मिला।

    कोर्ट ने कहा,

    “हम यह भी पाते हैं कि जब तक कदाचार के आरोप को साबित करने वाले स्पष्ट, ठोस और सत्यापित तथ्य मौजूद न हों, तब तक 1968 के नियमों के तहत अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने का कोई निर्देश नहीं दिया जा सकता।”

    इसके अनुसार, रिट याचिका खारिज कर दी गई।

    Case Title: Meisheng Chiang @ Chiang Mei Sheng v. U.O.I. Thru. Secy. Ministry Of Home Affairs Deptt. Of Personnel And Training New Delhi And 3 Others

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