S.21 NIA Act | चार्ज तय करने का आदेश अंतरिम नहीं, इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की जा सकती है: दिल्ली हाई कोर्ट से अलग इलाहाबाद हाईकोर्ट की राय

Shahadat

19 Aug 2026 10:23 AM IST

  • S.21 NIA Act | चार्ज तय करने का आदेश अंतरिम नहीं, इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की जा सकती है: दिल्ली हाई कोर्ट से अलग इलाहाबाद हाईकोर्ट की राय

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी एक्ट, 2008 (NIA Act) के तहत स्पेशल कोर्ट द्वारा चार्ज तय करने का आदेश इंटरलोक्यूटरी (अंतरिम) आदेश नहीं है। इसलिए 2008 के एक्ट की धारा 21 के तहत हाई कोर्ट में अपील के ज़रिए इसे चुनौती दी जा सकती है।

    इस तरह जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने शाहिद यूसुफ बनाम NIA मामले में दिल्ली हाईकोर्ट की राय से असहमति जताई। उस मामले में कहा गया कि चार्ज तय करने का आदेश प्रकृति में इंटरलोक्यूटरी होता है और 2008 के एक्ट की धारा 21 के तहत अपील में इसे चुनौती नहीं दी जा सकती।

    बता दें, 2008 के एक्ट की धारा 21 में प्रावधान है कि स्पेशल कोर्ट के किसी भी फैसले, सज़ा या आदेश (जो इंटरलोक्यूटरी आदेश न हो) के खिलाफ अपील की जा सकती है। ऐसी अपील की सुनवाई हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच द्वारा की जाएगी।

    इसमें यह भी प्रावधान है कि इस धारा के तहत बताए गए मामलों को छोड़कर स्पेशल कोर्ट के किसी भी आदेश (जिसमें इंटरलोक्यूटरी आदेश भी शामिल है) के खिलाफ कोई अपील या रिविज़न नहीं किया जा सकता।

    मामले का संक्षिप्त विवरण

    हाईकोर्ट संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। यह याचिका स्पेशल जज, NIA, लखनऊ द्वारा पारित आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की गई। यह आदेश IPC की धारा 121-A और ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 की धारा 3/5/9 के तहत दर्ज मामले से संबंधित था। याचिकाकर्ता ने विशेष रूप से IPC की धारा 121-A के तहत चार्ज तय किए जाने को चुनौती दी थी।

    शुरुआत में ही, राज्य ने याचिका की स्वीकार्यता (मेंटेनेबिलिटी) पर प्रारंभिक आपत्ति जताई।

    राज्य ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता के पास NIA Act की धारा 21 के तहत अपील का कानूनी उपाय उपलब्ध था, इसलिए वह अनुच्छेद 227 के तहत हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं कर सकता।

    राज्य की आपत्ति का विरोध करते हुए याचिकाकर्ता के वकील ने वीसी शुक्ला बनाम राज्य (1979) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि चार्ज तय करने का आदेश एक इंटरलोक्यूटरी आदेश है। इसलिए NIA एक्ट की धारा 21 के तहत ऐसे आदेश के खिलाफ कोई अपील नहीं की जा सकती। याचिकाकर्ता के वकील ने सैयद शाहिद यूसुफ मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के 2025 के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें आरोप तय करने के आदेश को एक 'इंटरलॉक्यूटरी ऑर्डर' (मामले के बीच का आदेश) माना गया और यह कहा गया कि इसके खिलाफ NIA Act की धारा 21 के तहत अपील नहीं की जा सकती।

    इन दलीलों को देखते हुए यह तर्क दिया गया कि यह याचिका भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर की जानी चाहिए थी।

    अब इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने सवाल यह था: क्या NIA स्पेशल कोर्ट द्वारा IPC की धारा 121-A के तहत आरोप तय करने का आदेश NIA Act की धारा 21 के अर्थ में "इंटरलॉक्यूटरी ऑर्डर" है?

    हाईकोर्ट की टिप्पणियां

    हाईकोर्ट ने वीसी शुक्ला मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समीक्षा की, जिसमें चार जजों की बेंच ने 3:1 के बहुमत से यह माना था कि स्पेशल कोर्ट्स एक्ट, 1979 के तहत आरोप तय करने का आदेश असल में एक इंटरलॉक्यूटरी ऑर्डर था।

    जस्टिस विद्यार्थी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि वीसी शुक्ला का फैसला एक अलग कानून के संदर्भ में दिया गया और उसका NIA एक्ट की धारा 21 से कोई लेना-देना नहीं था।

    सिंगल जज ने गौर किया कि स्पेशल कोर्ट्स एक्ट, 1979, जिस पर वीसी शुक्ला का फैसला आधारित था, उसे इमरजेंसी के दौरान ऊँचे सार्वजनिक या राजनीतिक पदों पर बैठे लोगों द्वारा कथित तौर पर किए गए अपराधों से निपटने के लिए बनाया गया।

    इसमें हाईकोर्ट के मौजूदा जजों की अध्यक्षता वाली स्पेशल कोर्ट का प्रावधान था। इनके फैसलों के खिलाफ अपील सुप्रीम कोर्ट में की जा सकती थी। बाद में 1982 में इस कानून को रद्द कर दिया गया।

    जस्टिस विद्यार्थी ने इसकी तुलना NIA एक्ट से की, जिसके तहत स्पेशल कोर्ट की अध्यक्षता सेशन जज करते हैं और फैसलों के खिलाफ अपील हाई कोर्ट की डिवीज़न बेंच के सामने की जाती है।

    अब रद्द हो चुके स्पेशल कोर्ट्स एक्ट, 1979 और NIA एक्ट के प्रावधानों में काफी अंतर पाते हुए कोर्ट ने यह बात कही:

    "...रद्द हो चुके स्पेशल कोर्ट्स एक्ट, 1979 की धारा 11 में इस्तेमाल किए गए 'इंटरलोक्यूटरी ऑर्डर' (अंतरिम आदेश) शब्द का अर्थ, NIA Act की धारा 21 में इस्तेमाल किए गए उसी शब्द के अर्थ पर लागू नहीं होगा, क्योंकि NIA Act की धारा 21 की भाषा रद्द हो चुके स्पेशल कोर्ट्स एक्ट, 1979 की धारा 11 से अलग है।"

    इसके बाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की 3-जजों की बेंच के उस फैसले का ज़िक्र किया, जो 'एशियन रिसर्फेसिंग ऑफ़ रोड एजेंसी (P) लिमिटेड बनाम CBI' मामले में आया, जिसमें यह कहा गया कि "चार्ज तय करने का आदेश न तो पूरी तरह से इंटरलोक्यूटरी ऑर्डर है और न ही फाइनल ऑर्डर"।

    अब यह तय करने के लिए कि दोनों में से किस फैसले को माना जाए, कोर्ट ने 'इवेको मैगिरस ब्रांडशुट्ज़टेक्निक GMBH बनाम निर्मल किशोर भारतीय' मामले में कॉन्स्टिट्यूशन बेंच के फैसले का सहारा लिया।

    कोर्ट ने कहा कि चूंकि 'एशियन रिसर्फेसिंग' मामले में पहले आए 'वीसी शुक्ला' फैसले पर "ध्यान दिया गया, उस पर विचार किया गया और उसे समझाया गया", इसलिए 'एशियन रिसर्फेसिंग' मामले में बाद में आया 3-जजों की बेंच का फैसला ही मान्य होगा।

    कोर्ट ने 'संजय कुमार राय बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट की 3-जजों की बेंच के एक और फैसले का भी सहारा लिया, जिसमें 'एशियन रिसर्फेसिंग' मामले के फैसले को ही माना गया और फिर से कहा गया कि चार्ज तय करने या डिस्चार्ज (आरोप से बरी करने) से इनकार करने के आदेश न तो इंटरलोक्यूटरी होते हैं और न ही फाइनल।

    ऊपर हुई चर्चा के आधार पर कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला:

    "कानूनी स्थिति बिल्कुल साफ है कि चार्ज तय करने का आदेश इंटरलोक्यूटरी ऑर्डर नहीं होता है।"

    मामले के तथ्यों पर वापस आते हुए कोर्ट ने कहा कि उसे यह जांचने की ज़रूरत नहीं है कि विवादित आदेश फाइनल ऑर्डर था या नहीं। अदालत ने यह टिप्पणी की:

    "यह जांचना ज़रूरी नहीं है कि यह अंतिम आदेश है या नहीं, क्योंकि NIA Act की धारा 21 केवल अंतरिम आदेशों (Interlocutory Orders) के ख़िलाफ़ अपील दायर करने पर रोक लगाती है; इसमें यह नहीं कहा गया कि अपील केवल अंतिम आदेशों के ख़िलाफ़ ही की जा सकती है।"

    इन बातों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने अनुच्छेद 227 के तहत याचिका पर विचार करने से इनकार किया। अदालत ने कहा कि डिवीज़न बेंच के सामने कानूनी अपील का विकल्प मौजूद होने के बावजूद सिंगल जज के सामने इस याचिका पर विचार करना "न्यायिक अनुशासन का उल्लंघन" होगा।

    इसके बाद याचिका खारिज कर दी गई। हालांकि, बेंच ने याचिकाकर्ता के लिए यह विकल्प खुला रखा कि वह आरोप तय करने वाले आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच के सामने NIA Act की धारा 21 के तहत अपील दायर करके चुनौती दे सकता है।

    Case title - Satendra Siwal vs State of U.P. Thru. Prin. Secy. Home Lko. and 2 others 2026 LiveLaw (AB) 597

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