S.106 BNS | अगर लापरवाही साबित न हो तो किराये के घर में हुई एक्सीडेंटल मौत के लिए मकान मालिक ज़िम्मेदार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
8 Sept 2026 3:17 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी जगह का मालिक होने मात्र से मकान मालिक पर एक्सीडेंटल मौत के लिए आपराधिक ज़िम्मेदारी (Vicarious Criminal Liability) नहीं डाली जा सकती, जब तक कि अभियोजन पक्ष के सबूतों से मालिक की ओर से कोई कानूनी रूप से साबित होने वाली लापरवाही या चूक का पता न चले।
जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की बेंच ने यह टिप्पणी तब की, जब वह एक मकान मालिक के खिलाफ़ चार्जशीट, संज्ञान/समन आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर रहे थे। यह मामला जनवरी 2025 में एक युवा छात्र (IIT एस्पिरेंट) की मौत से जुड़ा था, जो उस मकान में किराये पर रहता था और जिसके बाथरूम में गैस गीज़र लगा हुआ था।
यह मामला जनवरी 2025 में कानपुर नगर के एक पुलिस स्टेशन में मकान मालिक (आवेदक) के खिलाफ़ BNS की धारा 106 (लापरवाही से मौत का कारण बनना) के तहत दर्ज किया गया।
आवेदक ने 7 सितंबर 2025 की चार्जशीट और 15 नवंबर 2025 के संज्ञान/समन आदेश को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
मामले का संक्षिप्त विवरण
FIR के अनुसार, मृतक IIT परीक्षा की तैयारी के दौरान लगभग आठ महीनों से आवेदक के घर में किरायेदार के तौर पर रह रहा था।
9 जनवरी, 2025 को कथित तौर पर उसके पिता को बेटे की मौत की सूचना मिली और वे घटना स्थल पर पहुंचे, जहां उन्हें बताया गया कि शव बाथरूम के अंदर संदिग्ध परिस्थितियों में मिला।
FIR में आरोप लगाया गया कि बाथरूम में गैस गीज़र लगा था और उससे कार्बन मोनोऑक्साइड गैस निकली होगी। यह भी आरोप लगाया गया कि बाथरूम में हवा आने-जाने का कोई खास इंतज़ाम (वेंटिलेशन) नहीं था और गैस अंदर लेने के कारण मृतक की मौत हो गई।
जांच के बाद पुलिस ने मकान मालिक के खिलाफ़ BNS की धारा 106 के तहत चार्जशीट दाखिल की, जिसके बाद मजिस्ट्रेट ने मामले का संज्ञान लिया।
हाईकोर्ट के सामने मकान मालिक के वकील ने तर्क दिया कि आवेदक की ओर से कोई घोर लापरवाही या असावधानीपूर्ण कार्य नहीं किया गया और अभियोजन पक्ष के सबूतों से कथित अपराध में उसकी कोई विशिष्ट भागीदारी साबित नहीं होती।
राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर के बयान का हवाला दिया कि मौत कार्बन मोनोऑक्साइड गैस निकलने के कारण हुई।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
शुरुआत में, हाईकोर्ट ने कहा कि आवेदक की प्रॉपर्टी में मौत होने का मतलब यह नहीं है कि उस पर BNS की धारा 106 के तहत आपराधिक ज़िम्मेदारी तय की जा सके।
कोर्ट ने कहा कि एक युवा छात्र की मौत दुखद है, लेकिन इस प्रावधान के तहत आपराधिक ज़िम्मेदारी तय करने के लिए, सिर्फ़ आवेदक की प्रॉपर्टी में मौत होना काफ़ी नहीं है।
बेंच ने आगे कहा:
"प्रथम दृष्टया ऐसे सबूत होने चाहिए, जिनसे पता चले कि आरोपी ने कोई लापरवाही या जल्दबाज़ी वाला काम किया, जिसका मौत से सीधा और करीबी संबंध हो।"
कोर्ट ने देखा कि आवेदक के प्रॉपर्टी का मालिक/मकान-मालिक होने के अलावा, उस पर घोर लापरवाही का कोई खास आरोप नहीं लगाया गया।
ऐसा कोई सबूत नहीं था, जिससे पता चले कि गीज़र तय सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करके लगाया गया, या आवेदक को पता था कि वह खराब है, या लीकेज या खराबी के बारे में उसे पहले कोई शिकायत की गई।
ऐसा भी कोई सबूत नहीं था, जिससे पता चले कि किसी खराबी या खतरे के बारे में पता होने के बावजूद, मकान-मालिक ने जानबूझकर सुधार के उपाय नहीं किए।
कोर्ट ने यह भी देखा कि मृतक उस प्रॉपर्टी में लगभग 8 महीने से रह रहा था और उस दौरान गीज़र, बाथरूम में वेंटिलेशन या किसी अन्य खतरनाक स्थिति के बारे में मकान-मालिक को कोई शिकायत नहीं की गई।
कोर्ट ने माना कि सिर्फ़ इसलिए आपराधिक लापरवाही का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि घटना आवेदक के घर के बाथरूम में हुई।
कोर्ट ने कहा:
"सिर्फ़ इस अंदाज़े के आधार पर आपराधिक कानून की प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती कि चूंकि बाथरूम में गैस गीज़र लगा था, जहां वेंटिलेशन ठीक नहीं था, इसलिए हुई मौत के लिए मकान-मालिक को आपराधिक रूप से ज़िम्मेदार ठहराया ही जाना चाहिए।"
कोर्ट ने यह भी पाया कि इस मामले में कथित लापरवाही वाली स्थिति और आवेदक की ओर से किसी खास लापरवाही या जल्दबाज़ी वाले काम के बीच ज़रूरी कड़ी गायब थी।
कोर्ट ने कहा,
"प्रॉपर्टी का मालिक होने मात्र से किसी दुर्घटना में हुई मौत के लिए आपराधिक ज़िम्मेदारी तय नहीं की जा सकती, जब तक कि अभियोजन पक्ष के सबूतों से मालिक की ओर से कानूनी रूप से मानी जाने वाली लापरवाही या काम न करने (Omission) का पता न चले।"
यह मानते हुए कि प्रथम दृष्टया BNS की धारा 106 के तहत अपराध के तत्व नहीं बनते हैं, कोर्ट ने कानपुर नगर की जुडिशियल मजिस्ट्रेट कोर्ट नंबर 1 के समक्ष लंबित चार्जशीट, संज्ञान/समन आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द की।
इसके अनुसार आवेदन स्वीकार कर लिया गया।
Case Title - Avdhesh Singh vs. State of U.P. and Another 2026 LiveLaw (AB) 673

