S. 125 CrPC | भरण-पोषण मामले में कथित व्यभिचारी को नोटिस भेजा जा सकता है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चीफ जस्टिस से विचार करने का आग्रह किया

  • S. 125 CrPC | भरण-पोषण मामले में कथित व्यभिचारी को नोटिस भेजा जा सकता है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चीफ जस्टिस से विचार करने का आग्रह किया

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को चीफ जस्टिस से आग्रह किया कि वह ऐसे व्यक्ति को नोटिस भेजने के लिए नियम बनाने पर विचार करें। कोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की कार्यवाही में, यदि किसी व्यक्ति का नाम लेकर उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया जाता है, तो उसके खिलाफ कोई भी प्रतिकूल फैसला सुनाने से पहले उसे अपनी बात रखने का मौका दिया जाना चाहिए।

    जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला की पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति को विशेष रूप से व्यभिचारी ठहराने वाले न्यायिक फैसले के परिणाम केवल भरण-पोषण के दावे तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इससे संबंधित व्यक्ति की प्रतिष्ठा और सम्मान पर भी बुरा असर पड़ सकता है।

    चूंकि CrPC की धारा 125 में किसी कथित व्यभिचारी को पक्ष बनाने या उसे नोटिस भेजने के लिए कोई विशेष प्रक्रिया नहीं दी गई, इसलिए कोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वह इस मामले को चीफ जस्टिस के समक्ष रखें ताकि इस पर उचित विचार किया जा सके और आवश्यक निर्देश दिए जा सकें।

    जस्टिस शुक्ला ने कहा कि इस बात पर विचार किया जा सकता है कि क्या इसके लिए अलग नियम बनाए जाएं, या फिर 'हिंदू विवाह और तलाक नियम, 1956' के नियम 6(a) में दिए गए सिद्धांत को कुछ जरूरी बदलावों के साथ भरण-पोषण की कार्यवाही में भी लागू किया जाए। नियम 6(a) के तहत वैवाहिक मामलों में किसी कथित व्यभिचारी को 'सह-प्रतिवादी' (Co-Respondent) के रूप में शामिल करने का प्रावधान है।

    इस तरह, पीठ ने एक पति की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision) को खारिज कर दिया। पति ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी पत्नी को ₹20,000 प्रति माह और अपने नाबालिग बेटे को ₹10,000 प्रति माह भरण-पोषण के रूप में देने का निर्देश दिया गया।

    मामले का संक्षिप्त विवरण

    पति (याचिकाकर्ता) ने फैमिली कोर्ट के मार्च 2025 के उस आदेश को चुनौती दी, जो उसकी पत्नी और नाबालिग बेटे द्वारा CrPC की धारा 125 के तहत दायर मामले में पारित किया गया।

    पति का आरोप है कि उसकी पत्नी एक व्यक्ति (जिसका नाम याचिका में दिया गया) के साथ व्यभिचारपूर्ण संबंध में रह रही है। उसने दावा किया कि चूंकि पत्नी बिना किसी ठोस कारण के अलग रह रही है, इसलिए वह भरण-पोषण पाने की हकदार नहीं है।

    इसके अलावा, पति ने फैमिली कोर्ट द्वारा उसकी आय के आकलन और तय की गई भरण-पोषण की राशि पर भी सवाल उठाए।

    हाईकोर्ट की टिप्पणियां

    शुरुआत में, हाईकोर्ट ने 'ऑडी ऑल्टेरम पार्टम' (Audi Alteram Partem - दूसरे पक्ष को सुनना) के सिद्धांत और 'कात्यायन स्मृति' के एक श्लोक का उल्लेख किया: "पूर्वपक्षश्रुतार्थस्तु प्रत्यर्थी तदनन्तरम्। पूर्वपक्षार्थसम्बन्धं प्रतिपक्षं निवेशयेत्॥"

    इस श्लोक की व्याख्या करते हुए बेंच ने कहा:

    "इसमें एक सरल लेकिन गहरा सिद्धांत निहित है; यानी, जब एक पक्ष का पक्ष सुन लिया जाए तो उसके बाद दूसरे पक्ष को भी यह मौका दिया जाना चाहिए कि वह जज या अधिकारी के सामने अपना पक्ष रख सके।"

    इस संदर्भ में, बेंच ने कहा कि किसी कथित व्यभिचारी संबंध (Adultery) को लेकर कोई प्रतिकूल निष्कर्ष (Adverse Finding) उस व्यक्ति के चरित्र, प्रतिष्ठा और सम्मान पर असर डाल सकता है, जिसके खिलाफ यह निष्कर्ष दर्ज किया गया।

    इसलिए कोर्ट का मानना ​​है कि अगर किसी व्यक्ति का नाम लेकर उसे कथित व्यभिचारी (Co-Adulterer) बताया गया, तो उसके खिलाफ कोई प्रतिकूल निष्कर्ष दर्ज करने से पहले उसे अपनी बात रखने का मौका दिया जाना चाहिए।

    हालांकि, कोर्ट ने यह नहीं कहा कि CrPC की धारा 125 के तहत होने वाली हर कार्यवाही में ऐसे कथित व्यक्ति को पक्षकार (Implead) बनाना अनिवार्य है। कोर्ट का ध्यान उस स्थिति पर था, जहां कोई अदालत किसी तीसरे व्यक्ति का नाम लेकर उसके खिलाफ उसे सुने बिना ही कोई "प्रतिकूल निष्कर्ष" दर्ज करने का विचार कर रही हो।

    कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले प्रतिष्ठा के अधिकार (Protection of Reputation) का भी जिक्र किया।

    हाईकोर्ट ने गौर किया कि CrPC की धारा 125 में किसी ऐसे कथित व्यक्ति को पक्षकार बनाने या उसे नोटिस भेजने के लिए कोई विशेष प्रक्रिया नहीं बताई गई।

    इस प्रक्रियात्मक कमी को दूर करने के लिए, कोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वे इस मामले को चीफ जस्टिस के सामने रखें, ताकि वे इस पर उचित विचार कर सकें और निर्देश दे सकें।

    कोर्ट ने संकेत दिया कि इस मुद्दे को दो तरह से सुलझाया जा सकता है: या तो ऐसे व्यक्ति को पक्षकार बनाने या नोटिस भेजने की प्रक्रिया तय करने वाले नियम बनाए जाएँ, या फिर 'हिंदू विवाह और तलाक नियम, 1956' (जिसे हाई कोर्ट ने ही बनाया है) के नियम 6(a) में दिए गए सिद्धांत को, कुछ जरूरी बदलावों के साथ, धारा 125 की कार्यवाही में भी लागू करने पर विचार किया जाए।

    नियम 6(a) व्यभिचार (Adultery) से जुड़े कुछ वैवाहिक मामलों में कथित व्यभिचारी व्यक्ति को सह-प्रतिवादी (Co-Respondent) के रूप में शामिल करने से संबंधित है। यह इस नियम में दी गई शर्तों और अपवादों के अधीन है।

    क्या बिना प्रमाणिकता (Authentication) के तस्वीरें व्यभिचार को साबित कर सकती हैं?

    अपने 24 पन्नों के आदेश में पीठ ने भरण-पोषण (Maintenance) के मामलों में व्यभिचार के सबूत के तौर पर तस्वीरों से जुड़े एक महत्वपूर्ण सवाल पर भी विचार किया।

    बता दें, पति ने अपनी पत्नी पर लगाए गए व्यभिचार के आरोपों को साबित करने के लिए कुछ तस्वीरों और इलेक्ट्रॉनिक सामग्री का सहारा लिया था। उसका तर्क था कि फैमिली कोर्ट ने इस सामग्री को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि उसने 'भारतीय साक्ष्य अधिनियम' (Indian Evidence Act) की धारा 65-B के तहत कोई प्रमाण-पत्र (Certificate) पेश नहीं किया।

    'फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984' की धारा 14 का हवाला देते हुए, उसने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट ऐसी सामग्री को स्वीकार कर सकता है जो किसी विवाद को प्रभावी ढंग से सुलझाने में मदद करे, भले ही साक्ष्य के सामान्य नियमों के तहत वह सामग्री स्वीकार्य (Admissible) न हो।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि सामग्री को स्वीकार करने की शक्ति, उसकी प्रमाणिकता, विश्वसनीयता और साक्ष्य के रूप में उसके मूल्य (Evidentiary Value) से बिल्कुल अलग बात है।

    पीठ ने बताया कि धारा 14 फैमिली कोर्ट को ऐसी रिपोर्ट, बयान, दस्तावेज़, जानकारी या अन्य सामग्री स्वीकार करने का अधिकार देती है, जो कोर्ट की राय में किसी विवाद को प्रभावी ढंग से सुलझाने में मददगार हो सकती है। ऐसा चाहे 'भारतीय साक्ष्य अधिनियम' के तहत वह सामग्री प्रासंगिक या स्वीकार्य हो या न हो।

    हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस प्रावधान का मतलब यह नहीं है कि फैमिली कोर्ट को मिली सामग्री अपने आप ही प्रमाणिक (Authentic) साबित हो जाती है।

    'हिमांशु चोरडिया बनाम राजस्थान राज्य व अन्य' (2026) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

    "यह फैसला यह नहीं कहता कि फैमिली कोर्ट के सामने पेश किए गए हर इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को उसमें बताए गए तथ्यों के सबूत के तौर पर स्वीकार कर लिया जाना चाहिए। साथ ही, यह फैसला ऐसी सामग्री की प्रमाणिकता और विश्वसनीयता की जांच करने की जरूरत को भी खत्म नहीं करता है।"

    इस मामले में पीठ ने गौर किया कि इन तस्वीरों का स्रोत क्या है और इन्हें किस तरह से बनाया गया, यह साबित नहीं हो सका। ऐसा कोई गवाह भी सामने नहीं आया, जो यह पुष्टि कर सके कि ये तस्वीरें असली हैं और इनमें कोई छेड़छाड़ नहीं की गई। पत्नी और राज्य के वकीलों ने भी इन तस्वीरों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया कि कुछ तस्वीरें एक जैसी या डुप्लिकेट थीं, और कुछ तस्वीरें ऐसी लग रही थीं जिन्हें आपस में जोड़कर बनाया गया हो या उनमें छेड़छाड़ की गई हो।

    हाईकोर्ट ने कहा कि उचित सत्यापन (Authentication) के बिना इन तस्वीरों को व्यभिचार (Adultery) का पक्का सबूत नहीं माना जा सकता।

    कोर्ट ने कहा,

    "ज्यादा-से-ज्यादा ये तस्वीरें इनमें दिखने वाले लोगों के बीच किसी तरह के संबंध या करीबीपन को दिखा सकती हैं। लेकिन, अन्य ठोस और कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूतों के अभाव में केवल इन तस्वीरों के आधार पर व्यभिचार के आरोप को साबित नहीं किया जा सकता।"

    कोर्ट ने CrPC की धारा 391 और 401 के तहत, रिवीजन के चरण में पति द्वारा और सबूत पेश करने की मांग को भी खारिज किया। कोर्ट ने कहा कि अतिरिक्त सबूत लेने की शक्ति अदालत के विवेक पर निर्भर करती है, और यह कोई ऐसा अधिकार नहीं है जिससे रिकॉर्ड में अपनी मर्जी से कुछ भी जोड़ा जा सके।

    इसके अनुसार, बेंच ने क्रिमिनल रिवीजन याचिका को खारिज कर दिया और पति को अपनी पत्नी को हर महीने ₹20,000 और अपने नाबालिग बेटे को हर महीने ₹10,000 देने का निर्देश बरकरार रखा। यह गुजारा-भत्ता (Maintenance) आवेदन दाखिल करने की तारीख से देय होगा।

    Case Title : XYZ vs. State of U.P. and 2 others 2026 LiveLaw (AB) 844

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