'चयन सूची में नाम होने से नियुक्ति का पक्का अधिकार नहीं मिलता': इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
29 Oct 2026 5:03 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यह स्थापित सिद्धांत कि 'चयन सूची में नाम होने से नियुक्ति का कोई पक्का (अपरिहार्य) अधिकार नहीं मिलता', किसी ऐसे चयनित उम्मीदवार का दावा खारिज करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जो उपलब्ध रिक्तियों और न्यायालय के उस पुराने निर्देश का हवाला देता है जिसमें उसके मामले पर फिर से विचार करने को कहा गया।
न्यायालय ने कहा कि भर्ती करने वाले प्राधिकरण का यह कर्तव्य है कि वह रिक्तियों की वास्तविक स्थिति का पता लगाए, चयन से जुड़े भर्ती नियमों को लागू करे और अपने फैसले के पीछे कानूनी रूप से मान्य कारण दे।
जस्टिस इरशाद अली ने कहा,
"यह न्यायालय इस स्थापित सिद्धांत को समझता है कि चयन सूची में नाम होने मात्र से किसी उम्मीदवार को नियुक्ति का पक्का अधिकार नहीं मिल जाता। साथ ही यह सिद्धांत भर्ती करने वाले प्राधिकरण को अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं करता—उसे निष्पक्ष रूप से काम करना चाहिए, संबंधित दस्तावेजों पर विचार करना चाहिए और भर्ती नियमों को सही ढंग से लागू करना चाहिए।"
उत्तर प्रदेश के परिवहन आयुक्त ने 10.08.2004 को एक विज्ञापन जारी किया (जो 12.08.2004 को 'दैनिक जागरण' में छपा था), जिसमें 'एनफोर्समेंट कांस्टेबल' (प्रवर्तन कांस्टेबल) के पदों के लिए आवेदन मांगे गए। याचिकाकर्ता का साक्षात्कार 18.01.2005 को हुआ। 24.03.2005 को तैयार की गई और 28.03.2005 को जारी की गई OBC उम्मीदवारों की चयन सूची में उनका नाम 54वें नंबर पर था। हालांकि OBC के लिए 50 पदों का विज्ञापन दिया गया, लेकिन चयन सूची में 55 नाम शामिल थे। 52वें नंबर तक के उम्मीदवारों को नियुक्तियां दी गईं।
याचिकाकर्ता ने कई बार आवेदन और रिमाइंडर भेजे, लेकिन उसे नियुक्ति नहीं मिली। उसी चयन प्रक्रिया में शामिल दो अन्य उम्मीदवारों को इस न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के बाद नियुक्तियां मिलीं—इमामउद्दीन को 03.05.2006 के आदेश के तहत (मुनीश कुमार पांडे की मृत्यु से खाली हुए पद पर) और बाल गोविंद उपाध्याय को 20.08.2009 को नियुक्ति दी गई। 26.08.2011 को याचिकाकर्ता द्वारा दायर रिट याचिका संख्या 6515 (S/S) 2008 में कोर्ट ने निर्देश दिया कि इमामुद्दीन के मामले में आए फैसले के आलोक में याचिकाकर्ता के मामले पर फिर से विचार किया जाए। 04.04.2012 को दिए गए उनके अभ्यावेदन (Representation) को 26.11.2012 के आदेश द्वारा खारिज कर दिया गया, जिसे उन्होंने इस वर्तमान याचिका में चुनौती दी।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि OBC की 30 रिक्तियों के लिए विज्ञापन निकाला गया, लेकिन उन्हें कभी भरा नहीं गया। विज्ञापन में यह शर्त थी कि चयन वर्ष के दौरान आने वाली रिक्तियों के लिए 25% कोटा होगा। याचिकाकर्ता का कहना था कि प्रतिवादियों (Respondents) ने इन्हीं रिक्तियों का उपयोग इमामुद्दीन और बाल गोविंद की नियुक्ति के लिए किया, इसलिए अब वे अपनी बात से पलट नहीं सकते (यानी वे एक ही मामले में अलग-अलग रुख नहीं अपना सकते)।
स्टैंडिंग काउंसिल ने बताया कि सभी चयनित उम्मीदवारों ने मार्च और अप्रैल 2005 में कार्यभार संभाल लिया। 30.06.2005 के बाद OBC की कोई भी रिक्ति नहीं बची थी। 'यूपी परिवहन विभाग प्रवर्तन कर्मचारी संवर्ग (समूह 'D') सेवा नियमावली, 1979' के नियम 30(j) के तहत भर्ती वर्ष 1 जुलाई से शुरू होकर बारह महीनों तक चलता है। इसलिए याचिकाकर्ता भर्ती वर्ष 2004-05 के अपने दावे को अगले भर्ती वर्ष की रिक्तियों पर लागू नहीं कर सकता। इमामुद्दीन का मामला अपने आप में अलग तथ्यों पर आधारित था; वह सामान्य श्रेणी (General Category) के उम्मीदवार थे, जिन्हें एक मृत्यु के कारण खाली हुई रिक्ति पर नियुक्त किया गया।
कोर्ट ने गौर किया कि प्रतिवादियों का अपना ही स्पष्टीकरण — कि आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए मेरिट सूची में कुछ अतिरिक्त नाम रखे गए थे, और कुल 52 उम्मीदवारों को नियुक्त किया गया (जिनमें से दो को उस अवधि के दौरान खाली हुई रिक्तियों पर रखा गया) — यह दिखाता है कि विज्ञापित संख्या से अधिक रिक्तियों का उपयोग किया गया। OBC की 30 रिक्तियों के न भरे जाने का दावा एक ऐसा तथ्यात्मक सवाल खड़ा करता है, जिसका जवाब केवल वही प्राधिकरण (Authority) दे सकता है जिसके पास भर्ती के रिकॉर्ड मौजूद हैं।
कोर्ट ने कहा,
“केवल यह कह देना कि सभी चयनित उम्मीदवार कार्यभार संभाल चुके हैं, OBC की रिक्तियों के न भरे जाने से जुड़े अलग दावे को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त नहीं है।”
पुनर्विचार करने के पिछले निर्देश पर कोर्ट ने कहा,
“ऐसे निर्देश का पालन केवल पहले निकाले गए निष्कर्ष को औपचारिक रूप से दोहराने तक सीमित नहीं रखा जा सकता; इसमें उन मुद्दों पर भी विचार करना आवश्यक है, जिनकी जांच करने के लिए कोर्ट ने संबंधित प्राधिकरण को कहा था।”
कोर्ट ने आगे कहा कि कोई भी राहत वैधानिक भर्ती ढांचे के दायरे में ही होनी चाहिए और इससे मेरिट सूची में ऊपर मौजूद उम्मीदवारों के स्थान पर किसी अन्य को नहीं रखा जा सकता।
फिर भी कोर्ट ने यह स्पष्ट किया,
“यह सिद्धांत कि 'चयन सूची से कोई पक्का या अटल अधिकार नहीं बनता', उस दावे की जांच करने के विकल्प के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जो कथित तौर पर उपलब्ध रिक्ति और पुनर्विचार के विशेष निर्देश पर आधारित हो।”
इसके अनुसार, 26.11.2012 का आदेश रद्द कर दिया गया और रिट याचिका स्वीकार कर ली गई। प्रतिवादियों को निर्देश दिया गया कि वे याचिकाकर्ता को भी उसी सिद्धांत का लाभ दें, जिसके आधार पर इमामुद्दीन और बाल गोविंद को राहत दी गई। यह लाभ याचिकाकर्ता की OBC श्रेणी, मेरिट स्थिति और लागू भर्ती नियमों के अधीन होगा। केवल इस आधार पर उसके दावे को खारिज नहीं किया जा सकता कि उसका नाम सीरियल नंबर 54 पर था। इस मामले में निर्णय, फैसले की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने के तीन महीने के भीतर, एक तर्कपूर्ण आदेश के माध्यम से लिया जाना चाहिए।
Case Title : Bihari Lal Rastogi v. State of U.P. Through Secy. Transport Deptt. Lko. and Ors

