कोर्ट के पास आर्थिक अधिकार-क्षेत्र न हो तो सिर्फ़ मुकदमे की अर्ज़ी वापस करना ही उपाय नहीं, CPC की धारा 24(5) के तहत मुकदमा ट्रांसफर किया जा सकता है: इलाहाबाद हाई कोर्ट
Shahadat
29 July 2026 6:44 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अगर कोई मुकदमा ऐसी अदालत में दायर किया गया है जिसके पास आर्थिक अधिकार-क्षेत्र (Pecuniary Jurisdiction) नहीं है तो ज़िला कोर्ट उसे 'कोड ऑफ़ सिविल प्रोसीजर, 1908' (CPC) की धारा 24(5) के तहत किसी सक्षम अदालत में ट्रांसफर कर सकती है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी कमी सामने आने पर CPC के ऑर्डर VII नियम 10 के तहत 'प्लेन्ट' वापस करना ही एकमात्र विकल्प नहीं है।
कोर्ट ने आगे कहा कि जिस कोर्ट के पास अधिकार-क्षेत्र नहीं है, उसने जो सबूत पहले ही रिकॉर्ड कर लिए हैं, वे ट्रांसफर होने पर खत्म नहीं होते। यह तय करना ट्रांसफर पाने वाली अदालत का काम है कि वह मुकदमे की सुनवाई फिर से शुरू करे या उसी चरण से आगे बढ़ाए जहाँ से उसे ट्रांसफर किया गया।
'कोड ऑफ़ सिविल प्रोसीजर, 1908' की धारा 24 हाई कोर्ट और ज़िला कोर्ट को यह अधिकार देती है कि वे निचली अदालतों में लंबित मुकदमों, अपीलों और अन्य कार्यवाही को किसी भी चरण में वापस ले सकें और ट्रांसफर कर सकें। उप-धारा (5) में प्रावधान है कि किसी मुकदमे या कार्यवाही को ऐसी अदालत से ट्रांसफर किया जा सकता है, जिसके पास उसकी सुनवाई का अधिकार-क्षेत्र नहीं है। उप-धारा (2) ट्रांसफर पाने वाली अदालत को यह अनुमति देती है कि वह या तो मुकदमे की सुनवाई फिर से करे या उसी चरण से आगे बढ़े, जहां से उसे ट्रांसफर किया गया था, बशर्ते ट्रांसफर के आदेश में कोई विशेष निर्देश न दिया गया हो।
CPC का ऑर्डर VII नियम 10 'प्लेन्ट' को उस अदालत में पेश करने के लिए वापस करने का प्रावधान करता है जो उस मामले की सुनवाई करने में सक्षम हो।
डॉ. जस्टिस योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कहा,
"कानूनी स्थिति यह स्पष्ट करती है कि जब भी अधिकार-क्षेत्र की कोई कमी सामने आती है तो ऑर्डर VII नियम 10 के तहत 'प्लेन्ट' वापस करना ही एकमात्र या अनिवार्य परिणाम नहीं होता है। जब ज़िला अदालत धारा 24(5) के तहत अपनी वैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कार्यवाही को ऐसे कोर्ट में ट्रांसफर करती है, जो मामले की सुनवाई और फैसला करने में सक्षम है तो ऐसा ट्रांसफर अधिकार-क्षेत्र की कमी को दूर करने का एक वैध तरीका है। धारा 24(5) में इस्तेमाल की गई स्पष्ट भाषा के बावजूद, हर मामले में 'प्लेन्ट' वापस करने के लिए मजबूर करने वाली व्याख्या प्रक्रियात्मक रूप को वास्तविक न्याय से ऊपर रखेगी और इस प्रावधान के पीछे के विधायी उद्देश्य को विफल कर देगी।"
इसके अनुसार, कोर्ट ने याचिका खारिज की।
Case Title: Ramesh Chand Sachdeva v. Alok Prakash


